Loose Gyan Loose Top

अंग्रेजों की औलादों को आज भी क्यों ढो रहा है देश?

ये जानकर शायद आपको हैरानी होगी कि आजादी के 70 साल बाद भी भारत अंग्रेजों की पैदा की औलादों को विशेष सुविधाएं दे रहा है। ये लोग एंग्लो-इंडियन समुदाय के तौर पर जाने जाते हैं। दरअसल गुलामी के दौर में बड़ी संख्या में अंग्रेजी अफसर भारत में रहा करते थे। इनमें से ज्यादातर अपने परिवारों को ब्रिटेन में छोड़कर आते थे। यहां आकर वो गरीब भारतीय महिलाओं को रखैल बनाकर रहा करते थे। इन महिलाओं की कोख से अंग्रेजों की जो संतानें हुईं उन्हें एंग्लो-इंडियन कहा जाता है। इसके अलावा उन्हें भी एंग्लो-इंडियन का दर्जा दिया जाता है जो अंग्रेज मां-बाप की ही संतान हैं, लेकिन आजादी के बाद भारत में ही रुक गए। आजादी के वक्त देश भर में इनकी संख्या 5 लाख के आसपास हुआ करती थी। इन्हें संसद और कुछ विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व देने के नाम पर इनके एक सदस्य को मनोनीत करने का संवैधानिक इंतजाम किया गया है। संविधान के तहत शुरू में यह व्यवस्था 1960 तक के लिए थी, लेकिन इसे बढ़ाकर 2020 तक कर दिया गया। अब यह सवाल उठ रहा है कि आखिर किसी बिना चुने हुए व्यक्ति को इस तरह से मनोनीत करने का क्या मतलब है? क्योंकि यह समुदाय आर्थिक रूप से काफी समृद्ध है। इनको बिना चुनाव लड़े सांसद बनाने से देश के खजाने पर अच्छा खासा बोझ पड़ता है। क्योंकि इन्हें भी वही तमाम सुविधाएं मिलती हैं जो किसी आम सांसद को। बस इन्हें वोटिंग का अधिकार नहीं दिया गया है।

एंग्लो-इंडियन सदस्य पर सवाल क्यों?

दरअसल यह सवाल यूपी असेंबली के मनोनीत एंग्लो-इंडियन विधायक के कारण उठना शुरू हुआ है। तीन बार से पीटर पैंथम नाम के व्यक्ति को मनोनीत किया जाता रहा है। ये सज्जन बिना चुनाव लड़े हर पांच साल पर फिर से विधायक बन जाते थे। पीटर पैथम आज तक कभी भी विधानसभा में नहीं गए, न ही किसी बहस में हिस्सा लिया। फिर भी वो घर बैठे लाखों रुपये की सैलरी और भत्ते उठा रहे थे। इस बार योगी आदित्यनाथ की सरकार ने एंग्लो-इंडियन समुदाय से किसी को विधायक नहीं बनाया तो मसला मीडिया के जरिए उठाया जाने लगा। यूपी के अलावा उत्तराखंड, बिहार, बंगाल, झारखंड जैसे राज्यों में भी एंग्लो-इंडियन विधायक चुना जाता है। इनमें से ज्यादातर की यही कहानी है। हालांकि उत्तराखंड सरकार ने जॉर्ज आइवान ग्रेगरी मैन को एंग्लो इंडियन विधायक के तौर पर शपथ दिलाई है। यह विवाद लोकसभा चुनाव के बाद भी हुआ था, जब मोदी सरकार ने किसी एंग्लो-इंडियन सदस्य को मनोनीत नहीं किया। करीब सवा साल के बाद 2015 में केरल के रिचर्ड हे और बंगाल के जॉर्ज बेकर को नॉमिनेट किया गया। बाद में इन दोनों ने ही बीजेपी की औपचारिक सदस्यता ले ली।

एंग्लो-इंडियन विधायकों के अधिकार

दरअसल एंग्लो-इंडियन कोटे से बनने वाले विधायकों को आम विधायकों की तरह तनख्वाह के अलावा विधायक निधि की रकम भी मिलती है। ये कहीं से चुनाव नहीं लड़ते, लेकिन विधायक निधि के पैसे को मनमर्जी से जहां चाहें खर्च कर सकते हैं। कुछ विधायक थोड़ा बहुत खर्च भी कर दें तो ज्यादातर की विधायक निधि का पैसा जस का तस बेकार चला जाता है। बाकी राज्यों में भी एंग्लो-इंडियन विधायक सरकारी सुविधाएं उठा रहे हैं। एंग्लो-इंडियन सांसद और विधायक की व्यवस्था खत्म करने की मांग पुरानी है। संविधान के जानकारों के मुताबिक “ये राज्यों की मर्जी पर है, किसी तरह की बाध्यता नहीं है। राज्यपाल को लगता है कि एंग्लो इंडियंस का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है, तो वो किसी एक व्यक्ति को मनोनीत कर सकता है। कोई राज्य सरकार अगर चाहे तो प्रस्ताव पास करके व्यवस्था को ख़त्म भी कर सकती है। फिलहाल सबकी नजर 2020 पर है, जब उम्मीद की जा रही है कि अगर बीजेपी की सरकार रही तो गुलामी की इस अजीबोगरीब निशानी को औपचारिक तौर पर खत्म कर दिया जाएगा।

जिम कारबेट से कटरीना कैफ तक!

एंग्लो-इंडियन समुदाय के लोग यूं तो पूरे देश में फैले हुए हैं। लेकिन इनकी कुल आबादी आज 1 लाख के आसपास ही बची है। कारण ये कि ज्यादातर परिवार यूरोपीय कॉमनवेल्थ देशों में बस चुके हैं। क्योंकि वहां उन्हें आसानी से नागरिकता मिल जाती है। जो बचे उनमें भी ज्यादातर की नई पीढ़ी धीरे-धीरे हिंदू समुदाय में शादी करके हिंदू हो चुकी है। मशहूर शिकारी जिम कारबेट से लेकर अभिनेत्री कटरीना कैफ तक इसी समुदाय से आती हैं। क्रिकेटर रोजर बिन्नी भी एंग्लो-इंडियन हैं। रुडयर्ड किपलिंग, जॉर्ज ऑरवेल, रस्किन बांड ऐसे एंग्लो-इंडियन हैं जो पूरी तरह अंग्रेजों की ही संतान हैं। जबकि भारतीय मां वाले एंग्लो-इंडियन में क्लिफ रिचर्ड, फुटबाल खिलाड़ी माइकेल चोपड़ा, बेन किंग्सले, एयरवाइस मार्शल मौरिस बरकार, लारा दत्ता, महेश भूपति, रोजर बिन्नी, फ्रैंक एंथनी, पूर्व वायुसेनाध्यक्ष अनिल कुमार ब्राउनी, कैटरीना कैफ जैसे जाने-माने नाम हैं। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस सांसद डेरेक ओ ब्रायन भी एंग्लो-इंडियन हैं। एंग्लो-इंडियन लोग अंग्रेजों जैसे नाम रखते हैं और ईसाई धर्म को मानते हैं। इनके रहन-सहन भी अंग्रेजों जैसे ही होते हैं। गोवा में इनकी संख्या सबसे ज्यादा है।

यहां हम आपको बता दें कि एंग्लो-इंडियन समुदाय के लोग देश पर बोझ कतई नहीं हैं। ये लोग आम तौर पर कारोबार या अच्छी नौकरियों में हैं। ये लोग बेहद शांत स्वभाव और मिलनसार किस्म के होते हैं। इनके कारण कहीं पर भी आजतक किसी सामाजिक समस्या की घटना सुनाई नहीं देती है। आपत्ति सिर्फ उन्हें संसद और विधानसभा में बिना वजह सदस्यता देने के चलन पर है। क्योंकि देश में पारसी जैसे कई और भी समुदाय हैं जिन्हें लोकसभा और विधानसभाओं में नुमाइंदगी नहीं मिल पाती। ऐसे में एंग्लो-इंडियन को ही क्यों इतना वीआईपी दर्जा दिया जा रहा है?

कृपया लेख कॉपी-पेस्ट न करें। कई लोग पोस्ट कॉपी करके फेसबुक और व्हाट्सएप पर शेयर कर देते हैं, जिससे वेबसाइट की आमदनी काफी कम हो गई है। राष्ट्रवाद की विचारधारा पर आधारित यह वेबसाइट बंद हो जाएगी तो क्या आपको खुशी होगी? कृपया खबरों का लिंक शेयर करें।
एक अपील: न्यूज़लूज़ के जरिए हम राष्ट्रवादी पत्रकारिता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इस वेबसाइट पर होने वाला खर्च बहुत ज्यादा है और हमारी आमदनी काफी कम। हम अपने काम को जारी रख सकें इसके लिए हमें आर्थिक मदद की जरूरत है। ये हमारे लिए ऑक्सीजन का काम करेगी। डोनेट करने के लिए क्लिक करें:
Donate with

comments

Polls

क्या कांग्रेस का घोषणापत्र देश विरोधी है?

View Results

Loading ... Loading ...