कश्मीर में बादाम के बदले बंदूक भेज रहा है पाक!

सीमा पर पाकिस्तान के साथ भारी तनाव के बीच एक बड़ा खुलासा हुआ है। इसके मुताबिक कश्मीर सीमा पर पाकिस्तान के साथ होने वाले कारोबार के जरिए हथियार और गोला-बारूद भी भारत पहुंचाया जा रहा है। यहां पर पाकिस्तान के साथ बार्टर सिस्टम यानी अदला-बदली के जरिए कारोबार की इजाज़त मिली हुई है। पाकिस्तान से जो सामान भारत आता है उनके कंटेनरों की ठीक से जांच नहीं हो रही है। इसके लिए स्कैनर खरीदे जाने थे, लेकिन इसे लेकर रक्षा, वित्त और गृह मंत्रालयों के बीच फाइलें यहां से वहां घूम रही है। इन तीनों मंत्रालयों में देश की सुरक्षा के लिए इतने अहम सामान की खरीद को लेकर लंबे समय से सहमति नहीं बन सकी है। अखबार इकोनॉमिक टाइम्स ने इस बारे में रिपोर्ट छापी है। इसके मुताबिक एनआईए को इस कारोबार के जरिए अवैध हथियार भेजे जाने के कुछ इनपुट्स मिले थे, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसी ने यहां कड़ाई बरतना शुरू किया है। NIA जांच कर रही है कि कहीं इस रास्ते का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए सीमापार से हथियार और नकली नोट भेजने के लिए तो नहीं किया जा रहा है। इसके अलावा आइटम्स का गलत डेक्लरेशन देने, तीसरे देशों के गुड्स के इंपोर्ट और गलत कीमत बताने की शिकायतों की भी जांच की जा रही है। सूत्रों ने बताया कि हाल के समय में कश्मीर में हिंसा बढ़ने के मद्देनजर ये मामला ध्यान में आया है।

कारोबार के नाम पर विश्वासघात!

आपसी विश्वास बहाल करने की नीयत से भारत और पाकिस्तान ने 2008 में जम्मू और कश्मीर में लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) पर चुनिंदा सामान के ड्यूटी-फ्री ट्रेड की अनुमति दी थी। इसके लिए सलामाबाद और चक्कन-दा-बाग में दो ट्रेड फसिलिटेशन सेंटर बनाए गए थे। यह ट्रेड कश्मीर क्षेत्र में बनने वाली वस्तुओं और उत्पादों और बार्टर (अदला-बदली) तक सीमित होता है। शुरुआत में इन सामान में टेक्सटाइल, फल, शॉल और दुपट्टे जैसी चीजें शामिल थीं। बाद में इनमें मेवों और कुछ अन्य वस्तुओं को भी शामिल किया गया। बताया जा रहा है कि वजन तौलने वाले सिस्टम में खामियां हैं, जिसका फायदा उठाकर हथियार और गोला-बारूद सरहद पार कराए जा रहे हैं। बार्टर सिस्टम के भी गलत इस्तेमाल का मामला सामने आया है। उदाहरण के लिए, बादाम से भरे एक ट्रक को जीरे, संतरे या केले से भरे एक ट्रक के बराबर माना जा सकता है, जबकि बादाम की कीमत अधिक होती है। भारत से बादाम से भरा ट्रक पाकिस्तान जाए और उधर से जीरे के नाम पर बंदूकें और गोला-बारूद भेजा जाए। ऐसा शक है कि कीमत में अंतर का इस्तेमाल आतंकवादी या अन्य अवैध गतिविधियों की फंडिंग के लिए किया जा रहा है। यह पूरा कारोबार करीब 600 फर्मों के जरिए होता है। लेकिन वास्तव में ज्यादातर फर्म सिर्फ नाम की हैं। वास्तव में दो-चार लोग ही फर्जी फर्म के नाम पर सारा कारोबार कर रहे हैं। इससे इस पूरे इंतजाम के औचित्य पर ही सवाल खड़ा हो गया है।

2008 में खुला आतंक का रास्ता!

दरअसल ये मामला 2008 से ही लटका हुआ है। जब से यहां कारोबार शुरू हुआ तभी यह तय हुआ था कि रक्षा मंत्रालय पाकिस्तान से आने वाले कंटेनरों की जांच के लिए स्कैनर मुहैया कराएगा। कुल 2 स्कैनरों की जरूरत है, लेकिन मंत्रालयों की आपसी खींचतान में यह काम अभी तक लटका हुआ है। पिछले दिनों यहां से ले जाए जा रहे एक ट्रक में सुरक्षा बलों ने हथियारों की खेप पकड़ी भी थी। इसके बाद ही मामला सामने आया। 2008 में कारोबार शुरू होने के बाद मनमोहन सरकार छह साल में स्कैनर नहीं खरीद पाई। जबकि मोदी सरकार आने के बाद भी तीन साल हो चुके हैं और मंत्रालयों की आपसी-खींचतान में ये जरूरी काम अटका पड़ा है। मौजूदा वक्त में वित्त और रक्षा मंत्रालयों के मंत्री अरुण जेटली हैं और राजनाथ गृहमंत्री हैं। इन दोनों को आपस में मिलकर स्कैनिंग मशीन का फैसला करना है। लेकिन हैरानी की बात है कि इतने अहम मामले में ये दोनों मंत्री सुस्ती बरत रहे हैं। यह देखने वाली बात है कि इस खुलासे के बाद भी क्या नरेंद्र मोदी की सरकार इस कारोबार को जस का तस चलने देती है।

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