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नक्सली आतंकवाद के खिलाफ कुछ बड़ा होने वाला है!

देश भर में नक्सली आतंकवाद के खिलाफ आखिरी लड़ाई की तैयारी चल रही है। सूत्रों की मानें तो अंदर ही अंदर कुछ बहुत बड़ा हो रहा है। सुकमा हमले के बाद बीते कुछ दिनों में जो गतिविधियां चल रही हैं वो इसी तरफ इशारा कर रही हैं। केंद्र सरकार ने सुकमा हत्याकांड के बाद से संभावित कार्रवाई को लेकर कोई बयान नहीं दिया है। लेकिन अंदर ही अंदर ऑपरेशन की तैयारी चल रही है। 28 अप्रैल की शाम को गृह मंत्री राजनाथ सिंह इस बारे में एक टॉप सीक्रेट प्लान लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले थे। इसी दिन सीआरपीएफ के नए डीजी राजीव राय ने पद संभाला। सीआरपीएफ, केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच बैठकों के कई राउंड हो चुके हैं। इन सबके बीच कोऑर्डिनेशन का काम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कर रहे हैं। जो खबर हमें मिल रही है उसके मुताबिक नक्सली आतंकवाद पर अब तक के सबसे बड़े हमले की तैयारी चल रही है। ये हमला चौतफा होगा और नक्सलियों के भागने की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी। सुकमा हमले के बाद से ही बस्तर रीजन और आसपास के जंगलों में सुरक्षा बलों ने घेरेबंदी कर रखी है। आंध्र प्रदेश, झारखंड, ओडिशा वगैरह से लगने वाली जंगली क्षेत्र की सीमाओं को सील किया गया है। साथ ही खुफिया नेटवर्क के जरिए बड़े नक्सली नेताओं के मूवमेंट को ट्रैक किया जा रहा है। हमारी जानकारी के मुताबिक सारा काम बारिश के सीजन से पहले-पहले खत्म कर लेने का टारगेट है।

नक्सली समस्या पर नीति बदली

हमारी जानकारी के मुताबिक मंगलवार को एक हाईलेवल मीटिंग होनी है, जिसमें टेलीकॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अजीत डोभाल भी मौजूद रहेंगे। ऑपरेशन का खाका तैयार हो चुका है, अब इस पर अमल को लेकर आखिरी सलाह-मशविरा किया जाना है। इस बैठक में नक्सली ऑपरेशन से जुड़ी एजेंसियों के बड़े अफसर मौजूद रहेंगे। न्यूज़लूज़ को मिली जानकारी के मुताबिक सरकार नक्सली समस्या के हल के तरीके को लेकर अब तक बहुत आक्रामक नहीं दिखना चाहती थी। नक्सली इलाकों में ऑपरेशन तेज़ किया गया था और केंद्र को उम्मीद थी कि मौजूदा रफ्तार से अगले 4 से 5 साल में इस समस्या पर काबू पा लिया जाएगा। लेकिन ताजा हमले ने उसकी इस सोच को झकझोर कर रख दिया है। सूत्रों के मुताबिक सभी एजेंसियों से कह दिया गया है कि वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ आखिरी लड़ाई का समय आ चुका है। इसी के तहत बस्तर में तैनात सुरक्षा बलों को सड़क बनाने के काम से हटा दिया गया है। इन्हें अब उन नक्सल इलाकों में भेजा जा रहा है जहां पर आमने-सामने की सीधी लड़ाई होगी। जवानों ने यहां अंदरूनी इलाकों में गश्त तेज़ भी कर दी है। इसे नाम दिया गया है ऑपरेशन क्लीन। इस ऑपरेशन के दौरान किसी भी नक्सली या उसके मददगार के लिए ज़ीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाएगी। यानी सुरक्षा बल जरूरत के हिसाब से अधिकतम बल के इस्तेमाल को आजाद होंगे।

वीरप्पन को मारने वाले को कमान

आखिरी ऑपरेशन पर निगरानी का काम कर्नाटक के जंगलों में चंदन तस्कर वीरप्पन को मार गिराने वाले विजय कुमार को सौंपी गई है। वो आंतरिक सुरक्षा के मामलों में सरकार के सलाहकार भी हैं। विजय कुमार फिलहाल बस्तर पहुंच चुके हैं। उनकी मदद के वन क्षेत्र के सभी जिला मुख्यालयों को सूचित कर दिया गया है। ताकि ऑपरेशन शुरू होने से पहले और बाद में सीआरपीएफ और राज्य की पुलिस आपस में बेहतर सहयोग कर सके। कुल 7 जिलों के डीएम और एसपी भी इस उच्चस्तरीय बैठक के लिए बुलाए गए हैं। ऑपरेशन के दौरान जो सबसे बड़ा डर है वो ये कि पुलिस के कुछ अधिकारी नक्सलियों की मदद कर सकते हैं। ये वो भ्रष्ट अधिकारी होते हैं जो नक्सलियों की मदद करते हैं और इसके बदले उनसे मोटी रकम रिश्वत के तौर पर लेते हैं। लिहाजा सारे कमांड टॉप लेवल पर बेहद खुफिया तरीके से जारी किए जा रहे हैं, ताकि किसी भी चूक की स्थिति में ये पहचान हो सके कि गड़बड़ी कहां से हुई। सीआरपीएफ के अलावा भारत तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के अफसर भी बैठक में शामिल होंगे। अधिकारियों को लग रहा है कि सुकमा हमले के बाद से सीआरपीएफ के जवानों में बहुत गुस्सा है। वो नक्सलियों से अपने साथियों की जान का बदला लेने को बेताब हैं। उनके मनोबल को ऊंचा रखने का काम किया जा रहा है। साथ ही बुलेटप्रूफ हेलमेट और कुछ जरूरी हथियार और साजो-सामान भी अगले एक हफ्ते में सप्लाई कर दिए जाएंगे। इस ऑपरेशन का इशारा तभी मिल गया था जब हमले वाले दिन पीएम मोदी ने ट्वीट किया था। इस ट्वीट की भाषा भी बिल्कुल वही थी जो उरी हमले के बाद थी।

नक्सलियों का सफाया किस तरह?

नक्सली गांव वालों को ढाल बनाकर सुरक्षाबलों पर हमले करते हैं। इस चक्कर में आए दिन जवानों की जान जा रही है। हमारी जानकारी के मुताबिक नई रणनीति इससे एक कदम आगे की है। इसके मुताबिक हमले के लिए आने से पहले ही नक्सलियों के कैंपों पर हमले किए जाएंगे। इसके लिए हेलीकॉप्टर और ड्रोन विमानों से मदद ली जा रही है। साथ ही कार्टोसेट सैटेलाइट से भी पूरे इलाके की मैपिंग कराई जा रही है। इसका इस्तेमाल आम तौर पर सेना ही करती है। हमारे सूत्र ने बताया कि सरकार अब भी यही चाहती है कि गेहूं के साथ घुन न पिसे, लेकिन अगर ऐसी कोई जरूरत पड़ती है तो क्या किया जाए ये जवानों के विवेक पर होगा। इस तरह से नक्सली खतरे से निपटने के लिए केंद्र सरकार की नीति में इसे बड़ा बदलाव माना जा सकता है।

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