मोदी जी, चुनाव छोड़िए हिमालय के उस पार देखिए!

राम मंदिर भी बनना चाहिए और गाय की रक्षा भी होनी चाहिए। देश की अस्मिता, संस्कृति और स्वाभिमान से समझौता करके कोई राष्ट्र आज तक महाशक्ति नहीं बना है। लेकिन सिर्फ सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक परिवर्तन से ही कोई देश महाशक्ति नहीं बनता है। नये युग का इतिहास साक्षी है कि किसी देश को महाशक्ति बनने के लिए उत्पादन और निर्यात के नये कीर्तिमान भी स्थापित करने पड़ते हैं। ब्रिटेन, अमेरिका और चीन ने ऐसा ही किया था। भारत को महाशक्ति बनने के लिए भी वही करना होगा जो बीस साल पहले हमसे भी गरीब देश चीन ने दुनिया को कर दिखाया है और एक हम है जो रोजगार या उत्पादन बढ़ाने की जगह मुफ्त ‘अम्मा कैंटीन’ और मुफ्त चावल बाँट कर एक समूची पीढ़ी को आलस्य की अफीम में डुबोते जा रहे हैं। हम कब तक 2 रुपए और 3 रुपए किलो चावल और गेहूं का लंगर देश में चलाते रहेंगे? हम कब तक इन ‘फ्रीबी’ योजनाओं में सारी राष्ट्रीय ऊर्जा खर्च करते रहेंगे? हमें अब हर कीमत पर चीन की तरह दुनिया का प्रोडक्शन सेंटर बनना हैं। हमारे हाथ से निर्णायक अवसर निकल रहा है। हम ये सच गाँठ बाँध कर समझना होगा कि यदि प्रोडक्शन बढ़ेगा तो निर्यात बढ़ेगा। निर्यात बढ़ेगा तो देश कमाई करेगा और कमाई जमकर हो तो गरीबों को फ्रीबी देने में कोई हर्ज़ नहीं है। लेकिन अभी तो ‘वोट’ की खातिर, देश में टैक्स पेयर का पेट काटकर ही गरीब के घर में आटा बंट रहा है। ये घिसे पिटे इंदिरा गाँधी टाइप फैसले, सुपर पावर बनने के लक्षण कतई नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय व्यापर के विश्लेषक मानते है कि भारत बड़ी तेज़ी से चीन की ‘मैन्युफैक्चरिंग’ शक्ति का नया विकल्प बन सकता है। विकल्प बनने के स्वाभाविक कारण हैं। मसलन, चीन में इन दिनों मज़दूर की दिहाड़ी से लेकर उत्पादन की लागत बढ़ रही है। बढ़ी हुई उत्पादन लागत की वजह से अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे विकसित देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब चीन की जगह उत्पादन के नये केंद्र, नये विकल्प खोज रही हैं। यूँ तो चीन का विकल्प भारत होना चाहिए था लेकिन देखा जा रहा है कि भारत इस अवसर का लाभ नहीं उठा पा रहा है। लिहाजा भारत की जगह वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया और म्यांमार जैसे छोटे छोटे देश चीन का विकल्प बनते जा रहे हैं। ताजा रिपोर्ट बता रही हैं कि चीन का टेक्सटाइल उद्योग अब धीरे धीरे म्यांमार, कम्बोडिया और थाईलैंड जैसे देशों में खिसक रहा है। टेक्सटाइल की बड़ी-बड़ी फैक्टरियों के साथ साथ लाखों रोज़गार भी चीन के हाथ से निकल रहे हैं। इसी तरह वियतनाम और इंडोनेशिया अब दुनिया में कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने के बड़े केंद्र बन रहे है। ज़ाहिर है ये कारोबार भी चीन से ही इन देशों के पास जा रहा है। अब हमें जल्द और बेहद जल्द इस स्थिति को बदलना होगा। अगर भारत संकल्प के साथ आगे बढ़कर चीन के हाथ से निकल रहे उद्योगों पर झपट्टा मार दे तो निश्चित ही हम दुनिया के नये उत्पादन केंद्र बन सकते हैं। हम दुनिया के लिए चीन का विकल्प बनेंगे। हम दुनिया के नये ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ होंगे। अगर ऐसा हुआ तो भारत में नई उद्योग क्रांति का संचार होगा। भारत तब महाशक्ति की पंक्ति में खड़ा होगा।

मोदीजी… छोड़िये छोटे-छोटे राज्यों के चुनाव..

छोड़िये हिमाचल, तेलंगाना, ओडिशा…

निर्णायक अवसर है…

अब हिमालय के उस पार देखिये।

वहीं से ही न्यू इंडिया की गंगा निकलने वाली है।

(सीनियर जर्नलिस्ट दीपक शर्मा के फेसबुक पेज से साभार)

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