क्या आपके इर्द-गिर्द भी कोई ‘शहरी नक्सली’ रहता है?

तस्वीर में बायें से- नंदिनी सुंदर, गोपाल राय, मालिनी सुब्रह्मण्यम और बेला भाटिया

सुकमा में नक्सली हमले के बाद से पूरे देश में गुस्सा है और नक्सलियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की जा रही है। लेकिन कम लोगों को यह पता होगा कि नक्सली सिर्फ जंगलों में नहीं रहते। कुछ नक्सली जंगलों में रहते हैं और बाकी उनकी मदद के लिए दिल्ली और दूसरे शहरों में फैले हुए हैं। ये शहरी नक्सली आमतौर मानवाधिकार या सामाजिक कार्यकर्ता, टीचर या फिर पत्रकार के भेष में रहते हैं। ये जंगल में रह रहे अपने साथियों को फंड से लेकर हथियार तक पहुंचाने में मदद करते हैं। शहरी नक्सलियों की ये लॉबी इतनी मजबूत है कि बड़ी-बड़ी सरकारें इनके खिलाफ कार्रवाई करने से डरती हैं। यूपीए सरकार के वक्त जब तत्कालीन गृहमंत्री पी चिंदबरम ने नक्सलियों के खिलाफ एयरफोर्स के इस्तेमाल की बात कही थी तो इन्हीं शहरी नक्सलियों ने इतना हंगामा मचाया था कि उस वक्त अभियान ड्रॉप करना पड़ा। ये शहरी नक्सली जंगल वाले नक्सलियों को कानूनी दांवपेच और ईमानदार अफसरों को फंसाने की ट्रेनिंग भी देते हैं। खुद पर फर्जी हमले करवाने से लेकर किसी पर भी बलात्कार के आरोप लगाने में इनकी महारत होती है। ऐसे ही कुछ कथित शहरी नक्सलियों की लिस्ट देखिए। यह लिस्ट मीडिया रिपोर्ट्स और नेताओं के आरोपों के आधार पर तैयार की गई है। अगर इसमें कही कोई बात गलत है तो हमें सूचित करें।

1. नंदिनी सुंदर, सिद्धार्थ वरदराजन

पति-पत्नी की ये जोड़ी देश में सफेदपोश नक्सलियों की लिस्ट में सबसे ज्यादा चर्चित है। नंदिनी सुंदर दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में समाजशास्त्र की प्रोफेसर के तौर पर काम करती हैं, जबकि उनके पति सिद्धार्थ वरदराजन पत्रकार हैं। आजकल वो वायर नाम की एक न्यूज वेबसाइट चलाते हैं। पत्नी छात्रों को ब्रेनवॉश करके नक्सलवाद की तरफ मोड़ती है तो पति अपनी वेबसाइट से नक्सलवादियों के हित की खबरें पब्लिश करता है। बताते हैं कि दिल्ली में रह रहे ज्यादातर अंडरकवर नक्सली इन दोनों पति-पत्नी के संपर्क में रहते हैं। नंदिनी सुंदर पिछले दिनों तब चर्चा में आई थीं जब उन पर एक आदिवासी की हत्या का आरोप लगा। इस आदिवासी के परिवार ने नक्सलियों की मदद से इनकार कर दिया था। उसकी पत्नी ने पुलिस में दर्ज शिकायत में बताया कि कैसे कुछ लोगों ने रात के वक्त उसके घर पर हमला करके पति की जान ले ली। पत्नी ने बयान में नंदिनी सुंदर के अलावा बस्तर में सक्रिय शहरी आदिवासी अर्चना प्रसाद (जेएनयू), विनीत तिवारी (मानवाधिकार कार्यकर्ता) और संजय पराटे (सीपीआई नेता) के नाम लिए थे और बताया था कि ये सभी उसके पति को पिछले कुछ वक्त से धमकियां दे रहे थे। नंदिनी सुंदर और सिद्धार्थ वरदराजन दोनों ही कानूनी दांवपेच के माहिर हैं। इनके साथ वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की एक फौज रहती है, जो इन्हें किसी भी पुलिस कार्रवाई या रोक-टोक से बचाती है। इनका रैकेट कितना बड़ा है आप इसी बात से समझ सकते हैं कि पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने सुकमा हमले में 26 जवानों की मौत पर अपने कार्यक्रम में नंदिनी सुंदर को बतौर एक्सपर्ट बुलाया था। जबकि देखा जाए तो गोली चलाने वाले नक्सलियों के पीछे दिमाग इसी औरत का है। फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने हत्या की आरोपी एक नक्सली को टीवी स्टूडियो में बुलाने के खिलाफ कानूनी शिकायत भी दर्ज कराई है।

कई बड़े पत्रकारों से इन दोनों नक्सली पति-पत्नी के रिश्ते हैं और ये सभी मिलकर एक-दूसरे को बचाते रहते हैं। बताते हैं कि राजदीप सरदेसाई और उनकी पत्नी सागरिका घोष के अलावा एनडीटीवी और सीएनएन न्यूज़18 चैनल में भी इनका गहरा नेटवर्क है।

2. बेला भाटिया

खुद को लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता बताने वाली बेला भाटिय बस्तर में ही रहती हैं। इन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से सोशल और पॉलिटिकल साइंस में पीएचडी किया है। वहां पर इन्होंने सेंट्रल बिहार में नक्सली आंदोलन के विषय पर थीसिस लिखा था। इसके अलावा इन्होंने गुजरात यूनिवर्सिटी और मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से पढ़ाई की है। ये महिला देश तोड़ने वाली सभी ताकतों के समर्थन में रहती है चाहे वो कश्मीरी हों, नक्सली हों या नॉर्थ-ईस्ट के अलगाववादी। बाकी देश में भी नक्सलवाद फैलाने की कोशिशों के आरोप इन पर लगते रहते हैं। पिछले साल बेला भाटिया तब चर्चा में आई थीं जब इन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने मुझे बस्तर छोड़ने की धमकी दी है। इसके लिए उन्होंने बस्तर के आईजी कल्लूरी पर आरोप लगाया। इसके बाद दिल्ली में बैठे इनके साथियों ने मामला सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग तक पहुंचा दिया। नक्सलियों की मदद के आरोपों बावजूद कोर्ट और मानवाधिकार आयोग ने बेला भाटिया को सुरक्षा देने का आदेश दिया। जिसके बाद इन्हें बिना किसी रोकटोक बस्तर में गतिविधियां चलाने की छूट मिल गई। एनडीटीवी चैनल ने तो बेला भाटिया के समर्थन में बाकायदा अभियान चलाया था। जिसके बाद बस्तर के आईजी कल्लूरी को हटाना पड़ा था। बेला भाटिया को कांग्रेस हाईकमान का समर्थन होने की बात भी समय-समय पर सामने आती रही है। इनके पति ज्यां द्रेज़ सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी कौंसिल के सदस्य थे।

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3. गोपाल राय

आरोप है कि अरविंद केजरीवाल कैबिनेट में मंत्री गोपाल राय राजनीति में आने से पहले नक्सल समर्थक के तौर पर जाने जाते थे। मंत्री बनने के बाद भी इन्होंने जितनी बार अपने क्षेत्र का दौरा नहीं किया होगा, उससे ज्यादा बार ये बस्तर जा चुके हैं। जब भी वो वहां जाते हैं नक्सलियों के समर्थन में ही बयान जारी करते हैं। डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी भी कहते रहे हैं कि गोपाल राय के नक्सलियों से संबंध हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि अरविंद केजरीवाल और नक्सली नेताओं के बीच में गोपाल राय संपर्क सूत्र के तौर पर काम करते हैं। दिल्ली और दूसरे राज्यों के चुनाव में आम आदमी पार्टी को वहां के नक्सली नेटवर्क की भरपूर मदद मिलती है। जब अरविंद केजरीवाल बनारस से मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने गए थे, तब भी यह बात सामने आई थी। उस वक्त कुछ लोकल अखबारों ने छापा था कि कैसे मिर्जापुर से लेकर झारखंड तक के नक्सली अरविंद केजरीवाल के लिए प्रचार करने के लिए बनारस में जमा हुए हैं। चूंकि गोपाल राय ने अब संविधान की शपथ ले रखी है, इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि फिलहाल वो नक्सलवाद की मदद के बजाय कानून की मदद कर रहे होंगे।

4. मालिनी सुब्रह्मण्यम

इनकी कहानी भी बेला भाटिया और नंदिनी सुंदर जैसी ही है। ये पत्रकारिता के चोले में रहकर नक्सली आंदोलन को बढ़ावा देने में जुटी हैं। करीब डेढ़ दशक तक ये जगदलपुर में रहीं। वहां से रहकर वो नक्सली प्रोपोगेंडा और सुरक्षा बलों और पुलिस पर मनगढ़ंत आरोप लगाने का काम करती रही हैं। इनमें सबसे आम है बलात्कार का आरोप। बिना किसी सबूत या साक्ष्य के बलात्कार और हत्या के आरोप लगाना इनके लिए आम बात है। इनका रैकेट इतना जबर्दस्त है कि किसी न्यूज पोर्टल के लिए एक लेख लिखते ही बाकी नक्सली समर्थक पत्रकार उसे अपने-अपने चैनलों और अखबारों में पब्लिश करना शुरू कर देते हैं। इस तरह से एक झूठ बार-बार बोलकर सच बना दिया जाता है। पिछले साल फरवरी में जब पुलिस ने मकान मालिकों के लिए अपने किरायेदारों का वैरीफिकेशन कराना जरूरी बना दिया तो मालिनी सुब्रह्मण्यम रातों-रात बस्तर छोड़कर दिल्ली भाग आईं और यहां पर बताया कि पुलिस ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी। मालिनी सुब्रह्मण्यम का वकीलों, पत्रकारों और विदेशी एनजीओ का ऐसा नेटवर्क है कि जिस पर पार पाना आसान काम नहीं है। जब इन पर कार्रवाई हुई तो एमनेस्टी से लेकर दुनिया भर के तमाम एनजीओ ने विरोध करना शुरू कर दिया। फौरन इन्हें पत्रकारिता का एक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी दे दिया गया, ताकि देश में सरकार पर दबाव बनाया जा सके।

5. प्रशांत भूषण

नक्सलवादियों के मददगारों में प्रशांत भूषण एक बेहद अहम कड़ी है। बताते हैं कि वो खुद तो कभी बस्तर या ऐसे किसी नक्सली इलाके में नहीं जाते, लेकिन परदे के पीछे से नक्सलियों को कानूनी मदद देने में इनका बड़ा हाथ है। ये आए दिन सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक में जनहित याचिकाएं डालकर नक्सली नेताओं की मदद का काम करते रहते हैं। प्रशांत किशोर को सीधे तौर पर शहरी नक्सली तो नहीं कह सकते, लेकिन वो लगभग हर उस व्यक्ति या संस्था की कानूनी मदद करते हैं जिसने देश के खिलाफ हथियार उठा रखा हो। इसके कारण उनका आचरण हमेशा शक के दायरे में रहता है।

हमने अपनी लिस्ट में सिर्फ 5 सबसे सक्रिय नामों को लिया है। इनके अलावा भी कई नए-पुराने सफेदपोश नक्सली देश भर के शहरों में सक्रिय हैं। ऐसे ही दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जीएन साईबाबा को उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है। साईबाबा का नाम तब सामने आया जब जेएनयू के एक छात्र हेमंत मिश्रा को माओवादियों से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। 90 फीसदी विकलांग प्रोफेसर साईबाबा नक्सलियों के लिए साहित्य तैयार करने से लेकर छात्रों को माओवाद की तरफ मोड़ने का काम किया करता था। इसके अलावा बिनायक सेन, कोबाड गांधी, संदीप पांडे और स्वामी अग्निवेश जैसे कई और नाम हैं जो समय-समय पर सामने आते रहते हैं। बिनायक सेन को देशद्रोह के आरोप में पकड़ा गया और बाद में जब वो कोर्ट से छूट गए तो कांग्रेस सरकार ने उन्हें योजना आयोग में सलाहकार बना दिया। दिल्ली में इन सभी का केंद्र जेएनयू है, जहां पर उन्होंने ही कन्हैया, उमर खालिद जैसे नक्सलियों की नई पौध तैयार की है। इन सक्रिय शहरी नक्सलियों के अलावा एक तीसरा स्तर है जो मीडिया में है। इनमें एनडीटीवी के कुछ पत्रकार हैं। इसके अलावा लगभग सभी हिंदी-अंग्रेजी अखबारों में नक्सली छिपे तौर पर काम कर रहे हैं।

नक्सली नेटवर्क पर फिल्म

मशहूर फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने पिछले साल ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ नाम से फिल्म बनाई थी। इस फिल्म में शहरों में सक्रिय नक्सलियों और उनके तौर-तरीकों को बेहतरीन तरीके से दिखाया गया है। नीचे लिंक पर क्लिक करके आप यह फिल्म देख भी सकते हैं।

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