फर्जी किसान, जालसाज पत्रकार और देश का बंटाधार

ये उस फोटोशूट की तस्वीर है जो नोएडा के एक गांव में किया जा रहा था। इन तस्वीरों को मीडिया में दिखाकर मोदी सरकार के खिलाफ प्रोपोगेंडा की पूरी तैयारी थी। लेकिन गांव वालों ने सारी पोल खोल दी।

जब डाकू खड़क सिंह ने असहाय आदमी का भेष बनाकर बाबा भारती का घोड़ा चुरा लिया तो बदले में बाबा भारती ने उससे सिर्फ इतना कहा कि किसी को ये मत बताना कि ये घोड़ा कैसे चुराया वरना लोग असहाय लोगों की मदद नही करेंगे। बचपन में पढ़ी कहानी हार की जीत एकदम से जेहन में ताजा हो गई। किसानों का ये आंदोलन शुरू ही हुआ था। मैं सुबह-सुबह जंतर मंतर पहुंचा लगभग 9 बजे वहां एक गाड़ी रुकी। गाड़ी में खाने का सामान इडली, वड़ा अच्छा-खासा नाश्ता। ये सारे किसान डट के नाश्ता कर रहे थे। फिर 11 बजे मुझे पता लगा कि खोपड़ी हाथ में लिए ये किसान तमिलनाडु के हैं और भूख हड़ताल पर हैं। खैर मोटी सोने की कई-कई चेन लटकाए लोगों की टीम भी इन किसानों के साथ थी। पता चला कि ये लोग उनकी पीआर एजेंसी के लोग हैं। यानी वो पब्लिक रिलेशन एजेंसी जो पैसे लेकर आपकी खबरें मीडिया में छपवाती है। ये फीस कोई दो-चार सौ रुपये नहीं, बल्कि लाखों और कई बार करोड़ों रुपये में भी होती है। यह सब देखकर मुझे काफी हैरानी भी हुई। मैं पहली बार ऐसा कोई किसान आंदोलन देख रहा था जिसमें सब कुछ तय हिसाब से चल रहा था। बिल्कुल ऐसे जैसे कोई ड्रामा चल रहा हो और ये किसान उस ड्रामे के पात्र हों।

राज्य सरकार से दिक्कत नहीं

मुझे सबसे ज्यादा हैरत तब हुई जब पता चला कि ये किसान अपनी कथित खराब हालत के लिए तमिलनाडु की सरकार को कसूरवार नहीं मानते। जबकि उनकी ज्यादातर मांगें तमिलनाडु सरकार के ही अधिकारक्षेत्र में आती थीं। मैंने एक किसान से बातचीत शुरू की। तभी सफेद शर्ट और काली पैंड में एक लड़का मेरे पास आया और बोला कि यहां बहुत धूप है आप टेंट में चलकर बात कीजिए। एक रिपोर्टर के तौर पर यह बात चौंकाने वाली थी। क्या ऐसा कभी हो सकता है कि कोई किसान यह कहे कि यहां पर धूप बहुत है और मैं टेंट में चलकर बात करूंगा। किसानों को तो ऐसी ही कड़ी धूप में खेती-बाड़ी करनी होती है और वो इसके लिए अभ्यस्त होते हैं। उस दिन ही मुझे लगा कि ये दर्द नही दर्द का दिखावा हो रहा है। फिर मैं जंतर मंतर पर इन किसानों के पास नहीं गया। इस दौरान मैं देखता रहा कि कैसे कई फेसबुकी क्रांतिकारी और एयर कंडीशन कमरों में बैठकर पत्रकारिता करने वाले मामले को हवा देते रहे। इस दौरान मीडिया का एक खास तबका खूब स्टंट करता रहा। जबकि मैं दावे से कह सकता हूं कि उनमें से कोई जंतर-मंतर तक गया भी नहीं होगा। लोगों ने ऐसे दिखाया मानो अन्नदाता राजधानी में भूखा-प्यासा बैठा है और केंद्र में बैठी सरकार इतनी निर्दयी है कि वो उनसे मिलने का वक्त तक नहीं निकाल रही। जबकि सच्चाई यह थी कि सबकुछ जानते बूझते हुए भी वित्त मंत्री जेटली और कृषि मंत्री ने किसानों से मुलाकात करके उनकी बात सुनी।

असली दर्द भी नकली न लगे!

लोकतंत्र में आपको नौटंकी करने का भी हक़ है। लेकिन तकलीफ इस बात की है कि जिस तरह अन्ना आंदोलन के बाद लोगों को हर आंदोलन फर्जी लगने लगा है वैसे ही इन ड्रामेबाजों के कारण लोगों का असली दर्द भी नकली न लगने लगे। ऊपर जो तस्वीरें हैं वो नोएडा के एक गांव की हैं। प्रदर्शनकारी किसानों ने एक मैगजीन के ताजा अंक के लिए बाकायदा वहां जाकर फोटोशूट करवाया। इस फोटोशूट पर गांव के ही कुछ लोगों की नजर पड़ गई और उन्होंने इस तमाशे की तस्वीरें अपने मोबाइल में कैद कर लीं और सारी पोल पट्टी खुल गई। हालांकि इस सारे तमाशे के बाद जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे गरीब किसान देर रात को दिल्ली से चेन्नई रवाना हो गए। बताया जा रहा है कि इनमें से ज्यादातर की फ्लाइट पहले से बुक थी। ऐसे में लोग कयास लगा रहे हैं कि इस पूरे तमाशे का कहीं न कहीं दिल्ली में एमसीडी चुनाव से कोई लेना-देना था। न्यूज़लूज़ पर हमने इस बारे में पहले ही रिपोर्ट पब्लिश कर दी थी कि कैसे यह किसान आंदोलन दरअसल फर्जी है। नीचे लिंक पर क्लिक करके आप ये रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

पढ़ें रिपोर्ट: दिल्ली में तमिलनाडु के किसानों के आंदोलन का सच

(पत्रकार रमन ममगई के इनपुट्स के साथ)

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