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जनता के दिल से क्यों उतर गया ‘नायक’ केजरीवाल!

राष्ट्रीय अस्मिता से परे, देश के स्वाभिमान से परे, एक अलग संसार हमारे घर गली और शहर के भीतर बसता-घटता है। ये लोकल संसार है, जहाँ रोज़ रोज़ के मसले हैं, झगड़े हैं और व्यवस्था के संघर्ष हैं। कहीं स्कूल में बच्चे के एडमिशन को लेकर माँगी जाने वाली घूस तो कहीं अपने मकान के एक्सटेंशन के एनओसी के लिए अफसरों की मुट्ठी गरम करने की मज़बूरियां। ड्राइविंग लाइसेंस हो, बिजली के पुराने बिल हों या रेल के वेटलिस्टेड टिकट।संघर्ष हर मोड़ पर है। और जीवन की इस आपाधापी से जब वक़्त बेवक्त हम खीझते हैं तो हमारे भीतर का ‘एंग्री मैन’ व्यवस्था के खिलाफ हमें झकझोरता है जगाता है।
ये एंग्री मैन कहीं न कहीं हर किसी के दिल में है। शायद इसीलिए कुछ दशक पहले जब सलीम जावेद ने एंग्री मैन के तौर पर अमिताभ बच्चन को परदे पर उतारा था तो देश उनकी स्क्रिप्ट का कायल हो गया था। कायल इसलिए क्योंकि एंग्री मैन का किरदार व्यवस्था से त्रस्त हर हिंदुस्तानी के भीतर छुपा था। सलीम जावेद काफी समय से स्क्रिप्ट लिख रहे थे। अमिताभ बच्चन को भी डेब्यू किए कुछ साल हो चुके थे। दोनों हिट तभी हुए जब उनकी फिल्मों ने एंग्री मैन की थीम को पकड़ा। उस दुखती रग को पकड़ा जो व्यवस्था से हारे लोगों को सता रही थी।

चाहे फिल्म की स्क्रिप्ट हो, चाहे किसी सामाजिक आंदोलन की पृष्ठभूमि या जीत की तरफ बढ़ती किसी राजनीतिक दल की रणनीति। आप क्लिक तभी करते हैं जब आम आदमी की नब्ज़ पर आपका हाथ हो। दिल्ली के रामलीला मैदान का आंदोलन भी आम आदमी की दुखती रग को छूता हुआ ही देश पर छा गया था। वही एंग्री मैन की फील, वही भ्रष्ट और निर्लज्ज व्यवस्था के आगे टूटा हुआ सड़क का आदमी। जैसे सत्तर के दशक में ‘जंजीर’ या ‘मज़बूर’ के अमिताभ बच्चन की एंग्री यंगमैन की इमेज ने देश को झकझोरा था वैसे ही रामलीला मैदान के आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल की इमेज, व्यवस्था से खार खाए हर दिल में जेरॉक्स होती चली गई। हमें लगा केजरीवाल वो सड़क का आदमी है जिसका कुछ अंश हमारे भीतर भी है। शायद इसलिए सत्ताधारी कांग्रेस को छोड़कर समाज से जुड़ा हर घटक हर संस्थान केजरीवाल और अन्ना के साथ मुट्ठी बाँध कर खड़ा हो गया।
वामपंथी हों, संघ के समर्थक हों, श्रीश्री हों या रामदेव। सबके सब शुरुआत में आंदोलन के साथ खड़े हुए। आंदोलन ज्यों-ज्यों बड़ा होता गया केजरीवाल का कद भी बढ़ता गया। ज़ंजीर के बच्चन की तरह केजरीवाल कुछ ही महीनों में घर-घर के नायक हो गए। आंदोलन के ऐतिहासिक जनसमर्थन ने उन्हें देश का सुपर व्हिसिलब्लोअर बना दिया। उनमें सत्ता का विकल्प बनने की संभावना दिखने लगी। वो उस रास्ते की तरफ बढ़ भी गए।
लेकिन केजरीवाल की ये राम कहानी आज अचानक मैं क्यों लिखने बैठ गया! ऐसा क्या हुआ जो आज ये पोस्ट लिखनी पड़ रही है।

मित्रों, आज दिल्ली का निर्णायक एमसीडी का मतदान था। लेकिन मेरी तरह लाखों दिल्ली वालों ने वोट क्या देना इस चुनाव की चर्चा भी नहीं की। जिस दिल्ली ने तीन साल पहले मोदी का विरोध कर केजरीवाल को 67-3 की जीत दिलाकर हीरो बनाया था वो आज इस एंग्री यंग मैन को शायद भूल गई। एमसीडी के नतीजे जो कुछ भी आएं लेकिन आम आदमी पार्टी आज दिल्ली वालों के दिल से उतरती हुई दिखी। निराशा के इस भाव के पीछे ढेरों कारण हैं। बहुत कुछ है लिखने को और तमाम ऐसे किस्से तो पहले से ही पब्लिक डोमेन में हैं। लेकिन मैं इतना ज़रूर कहूंगा कि केजरीवाल ने हम सब के भीतर छुपे रामलीला के उस केजरीवाल को मसल दिया जिसने कुछ साल पहले हज़ारों-हज़ार युवाओं के दिलों में आशा की लौ जगाई थी। जिस आवाज़ ने, जिस आंदोलन ने, भ्रष्ट राजनीति और भ्रष्ट व्यवस्था को दिल्ली की छाती पर बैठकर चुनौती दी थी उस आवाज़ से हम अब ठगा महसूस करते हैं। जैसे कोई खड़ग सिंह बनकर जनता के विश्वास का घोड़ा हर ले गया हो। हो सकता है पूरा दोष केजरीवाल का ना होकर उनकी इष्ट मंडली का भी हो, पर परसेप्शन तो परसेप्शन है।
आम आदमी पार्टी पर बढ़ते अविश्वास के कारण अनेक है लेकिन मुझे लगता है कि साख खो देने का मुख्य कारण शायद ये है कि एंग्री मैन, एंग्री से एंबिशस बन गया। एंबिशस यानी महत्वाकांक्षी होना गलत नहीं है लेकिन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं जब समाज के कन्धों पर रखकर पूरी की जाती हैं तो हश्र वही होता है जो आज हम देख रहे हैं।
बेशक ‘रियल लाइफ’ में एंग्री यंग मैन अरविंद केजरीवाल…’रील लाइफ’ के हीरो अमिताभ बच्चन से भी बढ़े हो सकते थे… अगर वो अपनी स्क्रिप्ट न लिख कर आम आदमी की स्क्रिप्ट लिखते।

(वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक पेज से साभार)

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