सहारनपुर में सामने आई भीम-मीम एकता की सच्चाई

राजनीति के लिए अक्सर दलितों और मुसलमानों को एक खांचे में फिट करने की कोशिश होती है, लेकिन वास्तव में मुस्लिम समुदाय दलितों का कितना हितैषी है इसकी मिसाल समय-समय पर सामने आती रहती है। पिछले दिनों अंबेडकर जयंती के मौके पर यूपी में सहारनपुर के एक गांव में जो कुछ हुआ उसने इस सियासी समीकरण की भी पोल खोल दी है। 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती के मौके पर सहारनपुर के दुधली गांव के दलितों ने एक शोभा यात्रा निकाली। इस पर गांव के ही शांतिदूत समुदाय के लोगों ने हमला बोल दिया। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की झांकी को लेकर चल रहे लोगों पर इतनी बुरी तरह से पथराव किया गया कि जो तस्वीरें सामने आ रही हैं वो बिल्कुल कश्मीर जैसी मालूम होती हैं। पथराव की घटना में सहारनपुर से बीजेपी सांसद राघव लखनपाल और एसएसपी लव कुमार समेत कई लोग घायल हुए। स्थानीय अखबारों ने उन तस्वीरों को भी प्रकाशित किया है कि कैसे बीजेपी सांसद की जान बड़ी मुश्किल से बचाई गई। शांतिदूत समाज ने उन्हें घेर लिया था और लात-घूसों से मारने की कोशिश भी की गई। शोभा यात्रा में मौजूद लोगों ने मुश्किल से उन्हें बाहर निकाला। इस दौरान स्थानीय पुलिस बिल्कुल उसी अंदाज में तमाशा देखती रही, जैसे वो अखिलेश यादव के वक्त में होती थी। बीजेपी सांसद पर हमले की ये तस्वीर आप नीचे देख सकते हैं।

पत्थरबाजों की पहचान जारी

फिलहाल हालात पूरी तरह काबू में हैं और दोषियों की पहचान करके उनके खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। पुलिस ने दोनों पक्षों के कई लोगों के खिलाफ हिंसा और दंगा फैलाने की धाराओं में केस दर्ज किया है। आरोपियों में सांसद राघव लखनपाल भी हैं। उन पर आरोप है कि शांतिदूत समुदाय के मोहल्लों की तरफ से हुई भारी पत्थरबाजी के बाद उन्होंने नाराजगी जताने के लिए जिले के एसएसपी के बंगले पर धावा बोल दिया और वहां पर तोड़फोड़ मचाई। हालांकि पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक सांसद लखनपाल खुद तोड़फोड़ में शामिल नहीं थे। बताया जा रहा है कि सांसद पर हमले के कारण उनके समर्थक बुरी तरह भड़के हुए थे। ये दंगा भले ही अभी हुआ, लेकिन इसकी बुनियाद काफी पहले रख दी गई थी, जब शांतिदूत समुदाय की दादागीरी के चलते दलितों को अपने त्यौहार मनाना भी मुश्किल कर दिया गया। बीजेपी ने जब दलितों के अधिकार की आवाज उठाने की कोशिश की तो यह बात स्थानीय शांतिदूतों को पसंद नहीं आई। स्थिति यह है कि गांव के शांतिदूत समुदाय के लोग दलितों का अपने मोहल्लों में घुसने देना तक पसंद नहीं करते। अब दिल्ली की मीडिया में यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि दंगों की शुरुआत बीजेपी के सांसद ने ही की थी, जबकि सच्चाई इसके विपरीत है।

दलितों के दमन का मामला

अक्सर जब भी दलितों पर अत्याचार की बात होती है मीडिया ऐसे जताती है कि अत्याचार हिंदुओं की अगड़ी जातियां ही करती हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई का पता सहारनपुर की इस घटना से पता चलता है। गांव के लोग कुछ साल पहले तक हर साल अंबेडकर जयंती और संत रविदास जयंती के मौके पर शोभा यात्राएं निकाला करते थे। लेकिन 2012 में जब अखिलेश सरकार बनी तो गांव के शांतिदूतों के हौसले बुलंद हो गए और उन्होंने शोभा यात्राओं पर एतराज जताया। प्रशासन ने बिना कोई देरी किए दोनों ही शोभा यात्राएं बंद करवा दीं। प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने के बाद गांव के दलित समुदाय के अंदर फिर से हौसला जागा और उन्होंने इस साल 14 अप्रैल के दिन शोभा यात्रा निकालने का एलान किया। लेकिन जब ये शोभा यात्रा शांतिदूतों के इलाके से निकली तो अचानक पथराव शुरू हो गया। जुलूस पर पथराव से लोग बुरी तरह भड़क गए और उन्होंने नाराजगी जताने के लिए एसएसपी दफ्तर पर धावा बोल दिया। तकनीकी तौर पर देखें तो इस बार भी प्रशासन से शोभा यात्रा के लिए औपचारिक तौर पर मंजूरी नहीं मिली थी। लोगों का सवाल है कि यह कहां तक उचित है कि गांव के दलितों को अपने पर्व-त्यौहार भी प्रशासन की मंजूरी से ही मनाना पड़े। मौजूदा एसएसपी लव कुमार अखिलेश सरकार के वक्त यहां नियुक्त हुए थे। लोगों का आरोप है कि उनकी काम करने की स्टाइल अखिलेश सरकार वाली ही है, इसी के कारण लोगों का गुस्सा और भी भड़का और हालात बेकाबू हो गए।

आंखों में खटक रहे हैं दलित

सहारनपुर में पिछले कुछ वक्त से लगातार दलितों को उकसाने वाली घटनाएं हो रही थीं। देवबंद के एक गांव में 15 दिन के अंदर दूसरी बार अंबेडकर की प्रतिमा के साथ तोड़फोड़ की घटना हुई। इन सबका मकसद दलितों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने और हिंसा फैलाना मालूम होता है। साथ ही ये घटनाएं इस बात का भी इशारा कर रही हैं कि उत्तर प्रदेश में नई सरकार बनने के बाद एक तबका जानबूझकर दंगे भड़काने की कोशिश कर रहा है। इसका पहला शिकार दलित समुदाय को बनना पड़ रहा है। एक नजर सोशल मीडिया पर चल रही बातचीत पर:

जैसा कि सभी दंगों में होता है सहारनपुर में भी अफवाह फैलाने वाले तत्व पूरी तरह से सक्रिय हैं। सोशल मीडिया और दूसरे जरियों से भड़काऊ बातें फैलाने की कोशिश की जा रही है। दिल्ली के चैनल और अखबार भी पूरे मामलों में शांतिदूत समाज की भूमिका को छिपाकर सिर्फ बीजेपी सांसद को कसूरवार ठहराने की कोशिश में हैं। जबकि सच्चाई कुछ और है। ये सच्चाई आप घटना के बाद स्थानीय अखबारों की इन रिपोर्ट्स से समझ सकते हैं।

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