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देश की वो 5 बड़ी पार्टियां जो जल्द लुप्त होने वाली हैं!

देश की राजनीति जिस तरह से बदल रही है उसे देखते हुए कुछ राजनीतिक दलों पर खतरा मंडराने लगा है। इनमें से ज्यादातर वो दल हैं जो नेता और नीति के स्तर पर मजबूत विकल्प दे पाने में नाकाम रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद ही इन दलों के मुश्किल दिन शुरू हो गए थे और अब सियासी माहौल में उनके लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। इन दलों के लिए जल्द ही विलुप्तप्राय दलों की सूची में डालकर इनके संरक्षण का काम नहीं शुरू किया गया तो बहुत देरी हो जाएगी। वैसे कई पार्टियां ऐसी भी हैं जो कमजोर नेता के कारण खत्म हो रही हैं, जबकि कुछ के साथ सामाजिक और जातीय समीकरण की समस्या है। यह साफ दिख रहा है कि फिलहाल विपक्ष की जगह को भरने के लिए किसी बड़े नेता और मजबूत दल की काफी गुंजाइश है। न्यूज़लूज़ पर हमने ऐसी ही 5 बड़ी पार्टियों की लिस्ट तैयार की है, जो मौजूदा राजनीति में अनफिट साबित हो रही हैं और शायद तेज़ी से अपने खात्मे की तरफ बढ़ रही हैं।

1. कांग्रेस

सोनिया गांधी के नेतृत्व में मौजूदा कांग्रेस पार्टी ने अपना सबसे अच्छा दौर देखा तो सबसे बुरा दौर भी। मनमोहन सिंह की अगुवाई में लगातार 10 साल तक सरकार चलाने वाली कांग्रेस के पास इस समय न तो कोई नेता है और न ही कोई उम्मीद। चुनाव दर चुनाव बुरी हार के बावजूद राहुल गांधी अब भी कांग्रेस के भावी अध्यक्ष बने हुए हैं। तबीयत खराब होने के कारण अध्यक्ष सोनिया गांधी बहुत ज्यादा एक्टिव नहीं हैं। अब दिक्कत ये है कि कांग्रेस गांधी परिवार के बाहर कुछ भी सोचने को तैयार नहीं है। जबकि गांधी परिवार की स्थिति यह है कि राहुल और प्रियंका दोनों का ही डिब्बा गोल है। दोनों की सियासी सूझबूझ ऐसी नहीं है कि वो मरती जा रही इस पार्टी में दोबारा जान फूंक सकें। यही कारण है कि कई सीनियर नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। जो बचे हैं वो भी ऐसे हैं जिन्हें कोई पार्टी लेने को तैयार नहीं। पार्टी नेता जनार्दन पुजारी ने कुछ दिन पहले कहा था कि हमारी उम्मीद अब प्रियंका की बेटी रेहाना है। मतलब साफ है कि कांग्रेस का कोई फ्यूचर नहीं बचा है। ऐसी भी अटकलें हैं कि कांग्रेस पार्टी में एक बड़ी टूट हो सकती है। हो सकता है बहुत जल्दी ही पार्टी के कुछ अच्छे सीनियर नेता अलग होकर अपनी पार्टी बना लें।

2. वामपंथी मोर्चे की पार्टियां

सीपीएम, सीपीआई और खुद को वामपंथी बताने वाली ढेरों पार्टियां भी लुप्त होने की कगार पर हैं। फिलहाल देश के दो छोटे राज्यों त्रिपुरा और केरल में इनकी सरकारें चल रही हैं। लेकिन कभी वामपंथियों का गढ़ कहलाने वाला बंगाल इनके हाथ से निकल चुका है। हाल ही में बंगाल में हुए विधानसभा उपचुनाव में लेफ्ट फ्रंट का उम्मीदवार तीसरे नंबर पर आया। जबकि तृणमूल कांग्रेस के बाद बीजेपी दूसरी सबसे बड़ी ताकत के तौर पर उभर रही है। उधर त्रिपुरा में भी अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और यहां पर बीजेपी उसे कड़ी टक्कर देने वाली है। केरल में भी बीजेपी लगातार पैर पसार रही है। इसी का नतीजा है कि बीजेपी और आरएसएस के कार्यकर्ताओं पर आए दिन हमले हो रहे हैं। केरल में बीते 3-4 साल में बीजेपी का तेजी से फैलाव हुआ है। अब छोटे-छोटे गांवों में भी इसके संगठन हैं। अगर बीजेपी इसी तरह से मजबूत होती रही तो केरल से भी वामपंथी सफाया बहुत जल्द संभव है। वैसे ऐसा नहीं है कि वामपंथी दल पूरी तरह से खत्म हो जाएंगे। इनका जमीनी आधार थोड़ा बहुत हमेशा रहेगा, लेकिन सत्ता की राजनीति की रेस से वामपंथ का बाहर होना संभावित लग रहा है।

सियासी मौत की तरफ बढ़ रही बाकी तीन पार्टियों के बारे में जानने के लिए अगले पेज (2) पर क्लिक करें

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