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इन द्रौपदी के लिए भगवान कृष्ण बनेंगे हिंदू संगठन?

बीते 10-15 दिन में मुझे ऐसी कई मुस्लिम महिलाओं और उनके परिवारवालों से बात करने का मौका मिला है जो शौहर के तीन तलाक के कारण दर-दर भटकने को मजबूर हैं। ऐसे कई परिवार इन दिनों नोएडा में खबरिया चैनलों के चक्कर लगा रहे हैं। उन्हें उम्मीद जगी है कि उनकी कहानी जानकर शायद सरकार और इस देश की जनता की सहानुभूति जागे और उनके बच्चों के साथ इंसाफ हो। मामला सुप्रीम कोर्ट में आने के बाद से कुछ एनजीओ इन महिलाओं की छिटपुट मदद कर रहे हैं। उन्होंने ही इन महिलाओं और उनके परिवारवालों को इस बात के लिए मनाया कि वो मीडिया के आगे जाकर अपनी बात कहें। ऐसे ही एक एनजीओ में अपने संपर्क के जरिए मैंने इन परिवारों से बात की। तीन तलाक की मारी ज्यादातर महिलाएं अपनी गोद में छोटे-छोटे बच्चों को लेकर चैनलों तक पहुंच रही हैं। इनके साथ अक्सर उनके बूढ़े पिता या भाई होते हैं। बेहद गरीब घरों की इन सभी महिलाओं की कहानी लगभग एक जैसी है। ज्यादातर के पति गल्फ में या कहीं दूसरे शहर में कमाने गए और वहां से तलाक का फरमान भेज दिया। न जाने ये इत्तेफाक है या क्या कि तलाक देकर दुत्कारी गई इन महिलाओं में से ज्यादातर के पास बेटियां हैं। ज्यादातर महिलाओं के आगे सबसे बड़ा सवाल यही है कि वो अपने बच्चों को अब कैसे पालेंगी और कैसे उनका भविष्य संवारेंगी।

जितनी महिलाओं से मैंने बात की उनमें से ज्यादातर की बातों में एक नाउम्मीदी नजर आती है। मुस्लिम संगठनों और नेताओं से ये महिलाएं बुरी तरह से निराश हैं। महिलाएं ही नहीं उनके भाई और पिता की बातों में भी यही झलक दिखाई देती है। बस आखिरी उम्मीद यही है कि शायद कोर्ट या सरकार उनके लिए कुछ मुआवजे या मदद का इतंजाम कर दे। ज्यादातर महिलाएं अनपढ़ हैं और इस हालत में नहीं कि वो कोई रोजी-रोटी कमा सकें। ऐसी ही एक कम पढ़ी-लिखी तलाकशुदा महिला ने बातों-बातों में कुछ ऐसा कहा जो मेरे ख्याल से इनमें से ज्यादातर महिलाओं, उनके यतीम हो चुके बच्चों और परिवार वालों के दिमाग में चल रहा है। बुरके से पूरी तरह ढंकी इस महिला ने बस इतना कहा कि “योगी जी ने बोला कि जैसे द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था वही हमारा हाल है। द्रौपदी को बचाने के लिए तो भगवान कृष्ण आए थे। हमें बचाने कौन आएगा?” मैंने पूछा आपको क्या लगता है कि कौन आएगा? थोड़ी देर चुप रहकर उसने थोड़ी दबी जुबान में कहा- “अभी तो मोदीजी और योगीजी ही हैं। हमारे भाई तो वही हैं। कम से कम उन्होंने हमारे बच्चों का दर्द समझा तो।”

इसके बाद इसी महिला के साथ आए एक 14-15 साल के लड़के, जो उसका भाई था से मेरी बातचीत शुरू हो गई। उसने वो हालात बताए जिसमें उसकी बहन को तलाक दिया गया। उसने अपने परिवार के हालात के बारे में भी बताया। बातों-बातों में उसने अचानक कहना शुरू कर दिया कि “सर हम सभी बहुत परेशान हैं। हमें हमारे मजहब ने कुछ नहीं दिया। हम तो फंसे हुए हैं। कोई हमारी मदद करे तो हम अगले दिन हिंदू धर्म अपनाने को तैयार हैं।” लड़के ने आगे कहा- “हमें भी पता है कि तीन पीढ़ी पहले तक हम हिंदू थे। शायद छोटी जात के कारण पुरखों ने धर्म बदल लिया था।” उसने पश्चिमी यूपी की कोई जाति बताई जिसका नाम मुझे समझ में नहीं आया। “हमारे ही खानदान के जो लोग मुसलमान नहीं बने वो आज भी गांव में हैं और वो हमसे ज्यादा खुशहाल हैं। हम अपने पुरखों की गलती का नतीजा भुगत रहे हैं।” लड़के की ये बातें सुनकर मैं हैरान रह गया। मैंने पूछा कि क्या तुम जो सोचते हो वो तुम्हारे परिवार मतलब पिता और बहन की भी राय है। लड़के का जवाब था “अब्बा और दीदी ही नहीं। अब तो ज्यादातर फैमिली में ये बात लोगों के जेहन में आ रही है। जिन लोगों को अभी ये बात समझ में नहीं आई वो भी आगे चलकर सोचने को मजबूर होंगे।” मुझे लगा कि वो लड़का शायद किसी मदद की उम्मीद में मुझसे ये बातें कह रहा था। मुझे पता था कि मैं तो उसकी कोई मदद नहीं कर सकता, लेकिन शायद कोई ऐसा संगठन हो जो इन महिलाओं के लिए भगवान कृष्ण बनकर आए। मैंने इसीलिए यह पोस्ट लिखने का फैसला किया ताकि लोगों तक ये बात पहुंच सके।

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