जानिए यूपी में आरक्षण पर मीडिया ने कैसे झूठ फैलाया

Photo Courtesy: Indian Express

अगर आप ये सोचते हैं कि चैनल आजकल योगी आदित्यनाथ को दिन भर इसलिए दिखाते हैं क्योंकि वो उनके काम को पसंद कर रहे हैं तो ये आपकी गलतफहमी है। योगी हों या इनसे पहले मोदी वो टीवी पर इसलिए छाये रहते हैं क्योंकि उन्हें दिखाने से चैनलों को खूब टीआरपी मिल रही है। मीडिया एक तरफ मोदी और योगी को दिन भर दिखाकर टीआरपी बटोर रही है, दूसरी तरफ झूठी खबरें उड़ाकर उन्हें नुकसान पहुंचाने का खेल भी जारी है। पिछले दिनों इंडिया टुडे चैनल ने एक ट्वीट करके दावा किया कि सरकार ने प्राइवेट मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में एससी-एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण खत्म कर दिया है। यह भी नहीं बताया कि कौन सी सरकार। उसके कुछ देर बाद एक और खबर पोस्ट की, जिसके मुताबिक यूपी की योगी सरकार ने आरक्षण खत्म कर दिया। विपक्षी पार्टियों और फौरन इस खबर को सोशल मीडिया के जरिए फैलाना शुरू कर दिया और दावा किया जाने लगा कि सत्ता में आते ही योगी ने आरक्षण खत्म कर दिया। अभी प्राइवेट कॉलेजों में आरक्षण खत्म किया है आगे सरकारी कॉलेजों में भी इसे खत्म कर दिया जाएगा। लेकिन दरअसल ये न्यूज फर्जी थी और ऐसा लगता है कि चैनल ने जानबूझकर अफवाह उड़ाने की नीयत से इसे फैलाया। चैनल और अखबार आम तौर पर ऐसी खबरें किसी खास दल को फायदा पहुंचाने की नीयत से उड़ाते हैं।

अफवाह फैलाने की रणनीति

न्यूज़लूज़ ने इस खबर के बारे में इंडिया टुडे की सोशल मीडिया टीम से जुड़े एक व्यक्ति से बात की तो उसने जानबूझ कर शरारत की बात की पुष्टि की। मोदी और योगी विरोधियों को अच्छी तरह पता है कि उनके अब तक के प्रोपोगेंडा का ये असर हुआ है कि बीजेपी को आरक्षण के मुद्दे पर शक की नजर से देखा जाता है। ऐसे में अगर आरक्षण से जुड़ी कोई ऐसी झूठी खबर फैलाई जाए तो उसका असर बहुत गहरा होगा। क्योंकि जब सरकार सही स्थिति बताने के लिए सफाई देगी तो मीडिया उसे उतनी प्रमुखता नहीं देती, जितनी नकली खबर को दी जाती है। ये खबर भी पूरी तरह निराधार थी। असलियत ये है कि योगी सरकार ने आरक्षण की पुरानी नीति में कोई बदलाव नहीं किया है। मेडिकल एजुकेशन विभाग के डीजी ने भी एक बयान जारी करके बताया कि प्राइवेट कॉलेजों में तो पहले से ही आरक्षण नहीं है। जो आरक्षण कभी रहा ही नहीं, उसे खत्म कैसे किया जा सकता है।

आरक्षण पर क्या है सच्चाई?

दरअसल आरक्षण पर जिस सरकारी आदेश का हवाला दिया जा रहा है वो 10 मार्च को जारी किया गया था। इस समय तक अखिलेश यादव ही यूपी के सीएम थे। दरअसल नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET) के तहत ऐसा करना जरूरी था। दरअसल 2006 में मुलायम सिंह यादव सरकार के वक्त एक अध्यादेश के जरिए प्राइवेट शिक्षा संस्थानों में आरक्षण का फैसला लागू कर दिया गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2011 में इस फैसले पर ये कहते हुए रोक लगा दी कि किसी भी गैर-सहायता प्राप्त निजी संस्थान को आरक्षण लागू करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। ऐसा करना संविधान के खिलाफ है। इसके बाद अक्टूबर 2015 में उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग ने तब की अखिलेश सरकार को एक सिफारिश भेजी, जिसमें प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में ओबीसी को आरक्षण देने की बात कही गई थी। लेकिन हाई कोर्ट के आदेश के चलते इस सिफारिश पर कभी अमल नहीं हो सका।

इंडिया टुडे ने फैलाया झूठ

तो सवाल ये कि इंडिया टुडे की वेबसाइट ने आखिर क्यों 10 मार्च के आदेश के आधार पर योगी सरकार को ‘कसूरवार’ ठहरा दिया। यह भी सवाल है कि जब प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण था ही नहीं तो आखिर अखिलेश सरकार ने 10 मार्च को वो आदेश जारी ही क्यों किया? पहले सवाल का जवाब तो इंडिया टुडे के पत्रकार ही दे सकते हैं कि उन्होंने झूठी खबर क्या लेकर छापी। जबकि दूसरे सवाल का जवाब ये है कि इस सत्र में पहली बार यूपी सीपीएमटी के बजाय नीट स्कोर के आधार पर दाखिले होने हैं। राज्य सरकार ये परीक्षा करवाएगी। प्राइवेट कॉलेजों में आरक्षण को लेकर किसी तरह का भ्रम पैदा न हो, इसके लिए शायद एहतियात के तौर पर यह आदेश निकाला गया होगा। इंडिया टुडे की मंशा को लेकर सवाल इसलिए भी हैं क्योंकि रिपोर्ट गलत साबित होने और राज्य सरकार के स्पष्टीकरण के बावजूद समूह के चैनलों जैसे कि आजतक ने इस खबर को बिना किसी स्पष्टीकरण के चलाया। खुद इंडिया टुडे वेबसाइट ने भी अभी तक इस खबर को न तो हटाया है और न ही इस पर माफी मांगी।

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