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क्या सविता भाभी गुजराती हैं? जेएनयू में जारी है रिसर्च

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में फीस बढ़ने और रिसर्च की सीटें कम होने पर विवाद होते रहे हैं। कहा जा रहा है कि फीस बढ़ाने या रिसर्च की सीटें कम करने से पढ़ाई के स्तर को नुकसान पहुंचेगा। लेकिन जेएनयू में होने वाली रिसर्च पर अगर नजर डालें तो सच्चाई सामने आ जाएगी। बीते कुछ साल में जेएनयू में फिजूल के मुद्दों पर शोध का चलन बढ़ा है। कई बार रिसर्च के ऐसे टॉपिक चुने जाते हैं कि कोई सुन ले तो हंसी आए। एक ऐसा ही रिसर्च पेपर यहां पर पेश किया गया था, जिसका टॉपिक था- ‘रीथिंकिंग गुजराती आइडेंटिटी थ्रू द इमेज ऑफ सविता भाभी’। इसमें पॉर्न कॉमिक कैरेक्टर सविता भाभी का समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया गया था। ये कॉमिक सीरीज एनआरआई के दिमाग की उपज है और जिस कैरेक्टर को सविता भाभी कहा जाता है, उसका असली नाम सविता पटेल है। ये रिसर्च जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी की छात्रा अनन्या बोहिदर ने की थी। 2014 में जमा की गई इस रिसर्च में यह साबित करने की कोशिश की थी कि सविता भाभी और मौजूदा दौर के कई टीवी सीरियल, कॉमेडी शो में महिलाओं को जिस तरह से दिखाया जाता है वो गुजराती पहचान का हिस्सा है।

बेसिर-पैर की रिसर्च

एक शादीशुदा गुजराती महिला की इच्छाओं और गुजराती संस्कृति के नाम हुई इस रिसर्च के नतीजे बेसिर-पैर के थे। टीवी सीरियल या पॉर्न कॉमिक्स के कैरेक्टर के आधार पर गुजरात की महिलाओं की पहचान को जोड़ना ही अपने-आप में बेहद आपत्तिजनक था। सीरियलों की कहानी के आधार पर शोधकर्ता ने यह नतीजा निकाल लिया कि गुजरात के समाज में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स आम बात है। यह भी बताया गया कि सविता भाभी के पति का चरित्र कैसे आम गुजराती पुरुष से मिलता-जुलता है। इस बात को इस तरह से साबित किया गया था कि जिस तरह से पॉर्न सीरीज में सविता भाभी एक घरेलू महिला रहती है और उसका पति काम के सिलसिले में अक्सर विदेश जाता रहता है। उसके पास अपनी पत्नी के लिए ज्यादा वक्त नहीं होता। शोधकर्ता ने यह साबित करने की कोशिश की है कि ये हर गुजराती परिवार की कहानी है। दरअसल ये रिसर्च एक तरह से गुजराती समाज की छवि खराब करने की नीयत से किया गया था। पूरी शोध में किसी तरह के आंकड़ों या तथ्यों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। एक काल्पनिक चरित्र के आधार पर पूरे गूजराती समाज के बारे में राय बनाने की कोशिश की गई है। सविता भाभी की तरह ही जेएनयू में एक बार लोटे पर रिसर्च की भी काफी चर्चा हुई थी। रिसर्च स्टूडेंट बोहिदर ने अपने इस ‘महान’ शोध के लिए जिन किताबों का रेफरेंस दिया है, उनमें कुछ पुराने धर्मग्रंथ, कला के बारे में कुछ आधुनिक किताबें और अखबारों की खबरों के अलावा कामसूत्र भी शामिल है।

टैक्स के पैसे की बर्बादी

बायोटेक्नोलॉजी और कंप्यूटर साइंस को छोड़ दें तो ह्यूमैनिटीज में होने वाले ज्यादातर शोध इसी तरह के रद्दी विषयों पर हैं। जेएनयू में पढ़ाई बहुत सस्ती है और यहां छात्रों को बहुत कम कीमत पर बेहतरीन सुविधाएं दी जाती हैं। ये सबकुछ देश टैक्स के पैसे से होता है। इसके बावजूद जब यहां पर देशविरोधी गतिविधियां होती हैं तो यह सवाल उठता है कि क्या हम इसी के लिए टैक्स दे रहे हैं। इसी नाराजगी को जताते हुए कई लोगों ने इस मसले पर ट्वीट भी किए हैं।

कॉमेडी कॉमिक्स के नाम पर सविता भाभी सीरीज 2008 में शुरू हुई थी। 2009 में भारत सरकार ने इसको पॉर्न कैटेगरी में डालकर इस पर पाबंदी लगा दी थी। ये हैरानी की बात है कि पाबंदी के बाद देश के अग्रणी विश्वविद्यालय में इस विषय पर रिसर्च हुई।

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