राम मंदिर केस में सुलह से क्यों भाग रहे हैं मुस्लिम!

सुप्रीम कोर्ट ने सलाह दी है कि अयोध्या में राम मंदिर को लेकर चल रहा विवाद हिंदू और मुसलमान आपस में बैठकर सुलझा लें। इस मामले की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा कि दोनों पक्ष चाहें तो वो खुद इस मामले में मध्यस्थता करने को तैयार हैं। हालांकि चीफ जस्टिस ने यह साफ किया है कि अगर दोनों पक्ष आपस में मामला सुलझाने में नाकाम रहते हैं तब कोर्ट अपना फैसला देगा। राम मंदिर समर्थक संगठनों ने तो इस पहल का स्वागत किया है, लेकिन मुस्लिम संगठन तैयार नहीं दिख रहे। मामले में कानूनी लड़ाई लड़ रहे जफरयाब जिलानी ने तो इस ऑफर को सीधे तौर पर ठुकरा दिया। बाकी नेता भी किंतु-परंतु ही ज्यादा करते दिख रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर क्या कारण है कि मुस्लिम नेता और संगठन बरसों से लटके इस मामले को आपसी सुलह-समझौते से निपटाने से बच रहे हैं? जबकि हिंदू नेता इसके लिए भी राजी हैं। न्यूज़लूज़ ने इस बारे में कुछ जानकारों से बात की। मोटे तौर पर इसके 3 कारण हैं।

कारण नंबर-1, हिंदुओं के पक्ष में जाएगा फैसला!

2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तमाम साक्ष्यों, सबूतों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर माना था कि जिस गर्भगृह पर हिंदू संगठन दावा करते रहे हैं वहां पर पहले मंदिर था। वैसे भी तकनीकी स्थिति यही है कि बाबरी ढांचा गिरने से पहले भी वहां गर्भगृह में रामलला की पूजा हो रही थी। ये पूजा अब भी जारी है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस हिस्से पर मंदिर बनाने की मंजूरी दे दी थी। अब अगर इस मामले पर बीच-बचाव शुरू होगा तो हाई कोर्ट का फैसला ही आधार बनेगा। हाई कोर्ट के फैसले में मंदिर क्षेत्र की जमीन को 3 हिस्से में बांटने को कहा गया है। यह एक तरह का सर्वमान्य फैसला हो सकता था लेकिन मुस्लिम संगठनों ने इसे नहीं माना। उन्हें लग रहा है कि केस सुप्रीम कोर्ट में चलता रहा तो वो हाई कोर्ट के फैसले को बदलवाने में कामयाब हो जाएंगे।

कारण नंबर-2, बीजेपी को फायदे का डर

विपक्ष समेत तमाम मुस्लिम संगठनों को ये एहसास है कि अगर अयोध्या मंदिर का मामला सुलझ गया तो बीजेपी को इसका राजनीतिक फायदा हो सकता है। बीजेपी चुनावों में इसे अपनी उपलब्धि के तौर पर गिनाएगी। अभी मंदिर न बनने की स्थिति में हर चुनाव में उसे शर्मिंदगी की स्थिति का सामना करना पड़ता है। हिंदू संगठन भव्य राम मंदिर को हिंदुओं की जीत के तौर पर प्रचारित करेंगे। ये राम मंदिर एक तरह से हिंदू एकता का प्रतीक बन सकता है। जिसका फायदा बीजेपी को ही होगा। यही कारण है कि मुस्लिम संगठनों की कोशिश है कि राम मंदिर विवाद को जितना लंबा खींचा जाए उतना ही अच्छा है। सुप्रीम कोर्ट ने जब सुलह का सुझाव दिया तो वकील जफरयाब जिलानी ने फौरन कहा कि सुलह का मतलब है सरेंडर कर देना। दरअसल यह बयान बताता है कि मुसलमानों को एहसास है कि वो न तो सुलह और न मुकदमे से राम मंदिर पर कब्जा पा सकेंगे, लिहाजा इस मामले को जितना लटकाए रखकर हिंदुओं को चिढ़ाया जा सके उतना ही अच्छा है।

कारण नंबर-3, मुसलमानों का नेता नहीं

जफरयाब जिलानी की बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी से लेकर ओवैसी की पार्टी तक इस मामले में मुसलमानों का नुमाइंदा होने का दावा करते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि मौजूदा दौर में मुसलमानों का कोई ऐसा सर्वमान्य नेता नहीं है, जिसकी बात सभी मानें। हर मुस्लिम संगठन और नेता दूसरे से नफरत करता है और एक-दूसरे को शक की नजर से देखता है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने आउट ऑफ कोर्ट सैटलमेंट के सुझाव का स्वागत कर दिया तो कुछ मुस्लिम नेताओं ने उन्हें बीजेपी का एजेंट करार दिया। जहां तक हिंदुओं की बात है वो मंदिर को लेकर आरएसएस और बीजेपी पर भरोसा कर लेंगे, लेकिन मुसलमानों के पास ऐसा कोई बड़ा नेता नहीं है, जिस पर वो ऐतबार कर सकें।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सुलह-सफाई से फैसला इसलिए चाहता है क्योंकि उसे एहसास है कि फैसला मुसलमानो के पक्ष में नहीं आया तो वो दंगा-फसाद पर उतारू हो सकते हैं। इसलिए बेहतर है कि आपसी रजामंदी से ही एक बीच का रास्ता निकल आए। क्योंकि अदालत अगर फैसला सुनाएगी तो हो सकता है कि मुसलमानों को अभी जमीन का जो एक हिस्सा मिला है वो भी छिन जाए।

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