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जाति-विहीन हिंदुत्व की शुरुआत हैं योगी आदित्यनाथ

एक खास तरह के पत्रकार योगी आदित्यनाथ का नाम लिखते वक्त बताना नहीं भूलते कि उनका असली नाम अजय सिंह बिष्ट है और वो राजपूत जाति से हैं। लेकिन यह बताते हुए वो बड़ी सफाई ये यह तथ्य छिपा जाते हैं कि संन्यास लेते समय अजय सिंह बिष्ट ने न सिर्फ अपना परिवार और अपना नाम छोड़ा था, बल्कि अपनी जाति का भी त्याग कर दिया था। तकनीकी तौर पर वो उत्तर प्रदेश के पहले जाति-विहीन मुख्यमंत्री हैं। राजपूत परिवार में जन्म लेने के बावजूद आदित्यनाथ ने नाथ परंपरा के साधु के तौर पर दीक्षा ली और वो गोरखनाथ मंदिर के महंत बने। गोरखनाथ पीठ को अक्सर मीडिया में बुरे तौर पर दर्शाया जाता है, लेकिन वहां रहने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि इस मंदिर में जाति-पाति के भेदभाव का कोई स्थान नहीं है। यही कारण है कि गोरखनाथ पीठ के भक्तों और योगी आदित्यनाथ के समर्थकों में बड़ी संख्या पिछड़ी और दलित जातियों के लोगों की है।

क्या है नाथ परंपरा?

योगी आदित्यनाथ को समझने के लिए नाथ परंपरा को समझना जरूरी है। इस परंपरा में हठ-योग का सबसे अधिक महत्व है। यह कुछ गिनी-चुनी धार्मिक परंपराओं में से एक है जिसका साहित्य लगभग सभी स्थानीय भाषाओं में मिलेगा। नाथ परंपरा से जुड़े लोग आपको पूरे देश में मिल जाएंगे। इस परंपरा के आराध्य महंत गोरखनाथ ने उत्तर से लेकर दक्षिण तक पूरे देश में सनातन धर्म की रक्षा के उद्देश्य से मठों की स्थापना की थी। उन्होंने हठयोग को पूरे देश तक पहुंचाया और नाथ योगियों की परंपरा की शुरुआत की। कुछ लोग दावा करते हैं कि 12वीं या 13वी शताब्दी में गोरखनाथ वर्तमान पाकिस्तान या अफगानिस्तान के किसी इलाके से नेपाल आए थे। वहां पर उन्होंने कई साल तक गहरी साधना की। बाद में वो गोरखपुर पहुंचे यहां पर अपने प्रमुख मठ की स्थापना की। उनके नाम पर ही इस शहर का नाम गोरखपुर पड़ा।

जात-पात की जगह नहीं

जहां तक जाति की बात है नाथ परंपरा इसे सिर्फ एक सामाजिक व्यवस्था के तौर पर मानती है। जाति के आधार पर श्रेष्ठता या निकृष्टता की मान्यता बिल्कुल भी नहीं है। यही कारण है कि गोरखनाथ पीठ के सबसे अधिक भक्त पिछड़ी और दलित जातियों के लोग हैं। ये गोरखनाथ पीठ का ही मंत्र है कि जाति-पाँति पूछे नहिं कोई-हरि को भजै सो हरि का होई। योग की शिक्षा देने वाले नाथ परंपरा के योगियों ने इस्लामिक आक्रमण के दौर में पूरे देश में शिव-भक्ति का भाव जगाया और दौर में जाति-पाति में बंट चुके भारतीय समाज की अनेक जातियों को न केवल अपना शिष्य बनाया बल्कि इस्लाम में जाने से रोक भी लिया। एक सामाजिक बुराई के तौर पर जाति-पाति को दूर करने के लिए नाथ संप्रदाय का बड़ा योगदान माना जाता है।

नाथ परंपरा में इस्लाम

यह बात कम लोगों को पता होगी कि इस्लाम की सूफी परंपरा में भी नाथ योगी भी होते हैं। नाथ योगियों का प्रमुख ग्रंथ है गोरखवाणी। इसमें एक अध्याय ‘मोहम्मद बोध’ के नाम से भी है, जिसका सभी नाथ योगी पूरी तरह पालन करते हैं। यही कारण है कि गोरखनाथ पीठ में कभी भी हिंदू-मुसलमान या जाति-पाति का भेदभाव नहीं हुआ। मठ के अंदर हर धर्म और जाति के लोगों को पूरी छूट है। हालांकि अपनी इन्हीं खूबियों के कारण वहाबी मुसलमानों को गोरखनाथ पीठ कभी पसंद नहीं आया। मुसलमान बादशाहों ने तीन बार इस मंदिर को गिरवाया। सबसे पहले अलाउद्दीन के आदेश पर इस मंदिर को नेस्तनाबूद किया गया था। दूसरी बार बाबर के शासनकाल में गोरखनाथ पीठ को तोड़ा गया था। तीसरी बार औरंगजेब ने इस पीठ को पूरी तरह नष्ट करवा दिया था। तीनों बार मुसलमान राजाओं के अत्याचार के बावजूद मठ का निर्माण उसी जगह पर हुआ।

भेदभाव का सवाल नहीं

जो लोग आदित्यनाथ को राजपूत ठहराने में जुटे हैं उन्हें पता ही नहीं कि वो अपने मठ का महंत होने के नाते जाति के आधार पर भेदभाव कर ही नहीं सकते। नाथ परंपरा उन्हें ऐसा करने से रोकती है। यह कोई नई बात नहीं है। नाथ परंपरा के इसी खुलेपन से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में मुसलमानों ने भी खुद ही संन्यास धर्म ग्रहण करके योग का रास्ता चुना है। गोरखनाथ पीठ कट्टरपंथियों की आंखों में जरूर खटकता रहा, लेकिन जोर-जबर्दस्ती धर्मांतरण का आरोप नहीं लगा सके।

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