मोदी ने बिहार में नीतीश को ‘तख्तापलट’ से बचाया!

बिहार में नीतीश कुमार को गद्दी से हटाकर अपने बेटे तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनवाने की लालू यादव की बड़ी साजिश नाकाम होने की खबर है। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक लालू यादव ने यूपी चुनाव के फौरन बाद नीतीश को हटाकर अपने बेटे को गद्दी पर बिठाने की तैयारी कर ली थी। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस से बात भी कर ली थी। लालू को भरोसा था कि यूपी चुनाव में समाजवादी पार्टी जीत जाएगी। इसी के हिसाब से उन्होंने तख्तापलट की पूरी साजिश रची थी। बहुमत का आंकड़ा पूरा करने के लिए लालू ने बीजेपी के कुछ विधायकों के संपर्क किया थे। लेकिन ऐन मौके पर बात लीक हो गई। बिहार विधानसभा में लालू यादव की आरजेडी 80 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है। बेटे को मुख्यमंत्री बनाने के लिए रणनीति के तहत राबड़ी देवी और आरजेडी के दूसरे नेताओं ने बयानबाजी शुरू कर दी थी कि बिहार की जनता तेजस्वीर को सीएम की कुर्सी पर देखना चाहती है।

क्या था तख्तापलट का पूरा प्लान?

बताया जा रहा है कि लालू यादव ने तय किया था कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के दोबारा चुने जाने के कुछ दिनों बाद ही वो अपनी पार्टी आरजेडी का समाजवादी पार्टी में विलय करवा देंगे। इसलिए ताकि ये पार्टी यूपी और बिहार की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनकर उभर सके। विलय के बाद लालू कांग्रेस के समर्थन से बेटे तेजस्वीर को मुख्यमंत्री बनाने का दावा ठोंक देते। वैसे आपको बता दें कि आरजेडी और कांग्रेस के विधायकों को जोड़कर भी बिहार में बहुमत पूरा नहीं होता, लिहाजा लालू यादव बीजेपी तो तोड़ने की फिराक में थे। लालू को उम्मीद थी कि कम अंतर से चुनाव जीते बीजेपी के कुछ विधायक उनके साथ आ जाएंगे। यूपी में अखिलेश यादव को भी इस प्लान की पूरी जानकारी थी। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी था कि “अब मैं 2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ूंगा। कांग्रेस तो साथ है ही, लालू यादव और ममता बनर्जी को भी साथ लाकर तैयारी शुरू होगी।”

क्या है बिहार में सीटों का गणित

बिहार में 243 सदस्यों वाली विधानसभा में आरजेडी के 80 और कांग्रेस के 27 विधायक हैं। दोनों को मिलकर 15 और विधायकों की जरूरत थी और लालू आश्वस्त थे कि वो इनका इंतजाम कर लेंगे। रणनीति के मुताबिक लालू बीजेपी या जेडीयू को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। दोनों ही पार्टियों में उनकी नजर उन विधायकों पर थी जो कम अंतर से चुनाव जीते हैं और अलग-अलग कारणों से अपनी पार्टी के अंदर असंतुष्ट समझे जाते हैं। जेडीयू के 71 और बीजेपी के 53 विधायक हैं। ऐसे में बीजेपी के विधायकों को तोड़ना आसान होता। लेकिन समय रहते लालू के इस खेल की भनक बीजेपी के हाईकमान को लग गई। सूत्रों के मुताबिक मोदी ने अपने एक दूत के जरिए नीतीश को इस बारे में जानकारी पहुंचा दी। सूत्रों के मुताबिक नीतीश कुमार के पास खुद भी इस बात के इनपुट्स थे। बीजेपी ने एक तरह से उनकी खबर को पक्का कर दिया।

लालू के प्लान पर ऐसे फिरा पानी!

तख्तापलट की जानकारी मिलते ही नीतीश ने सबसे पहले ये एलान कर दिया कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार नहीं उतारेगी। जबकि इससे कुछ दिन पहले ही नीतीश कुमार ने बनारस समेत पूर्वी यूपी में रैलियां की थीं और साफ संकेत दिया था कि उनकी पार्टी यूपी में चुनाव लड़ेगी। नीतीश ने तब पीएम मोदी पर जोरदार हमले भी किए थे। नीतीश कुर्मी जाति से ताल्लुक रखते हैं और अगर वो अपने उम्मीदवार उतारते तो कुर्मी वोटों में थोड़ा बंटवारा हो सकता था। नीतीश की गैरमौजूदगी में ये पूरा वोट बीजेपी को मिला। इसके बाद यूपी में समाजवादी पार्टी की बुरी हार ने लालू के हौसले को पस्त कर दिया।

बिहार में अब आगे क्या होगा?

लालू की इस कोशिश ने बिहार में आरजेडी और जेडीयू के बीच खाई को कुछ और चौड़ा कर दिया है। नीतीश और बीजेपी जब चाहें आपस में मिलकर पहले की तरह गठबंधन सरकार बना सकते हैं। लेकिन दोनों ही पार्टियां अभी इसके पक्ष में नहीं हैं। बिहार बीजेपी के एक सूत्र के मुताबिक नीतीश चाहते हैं कि गठबंधन तोड़ने की पहल लालू यादव करें। लिहाजा बीजेपी भी इंतजार करने की रणनीति पर चल रही है। ताजा हालात में न तो नीतीश कुमार और न ही बीजेपी के नेता एक-दूसरे के खिलाफ कोई कड़वाहट भरी बयानबाजी कर रहे हैं।

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