मायावती जैसा नेता बन चुके हैं केजरीवाल, 5 लक्षण

आशीष कुमार

जब अरविंद केजरीवाल राजनीति में आए थे तो बहुत लोगों को उम्मीद थी कि एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति राजनीति में आया है। अब राजनीति में फैली गंदगी में कुछ कमी आएगी। लोगों की उम्मीदें गलत भी नहीं थीं, क्योंकि खुद अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि उनका राजनीति में आना एक तरीके की राजनीतिक क्रांति है और इससे भारत जरूर बदलेगा। वैसे ऐसा दावा करना कोई नई बात भी नहीं है, लेकिन एक आईआईटी ग्रेजुएट और आयकर अधिकारी का पद छोड़कर आए हुए व्यक्ति के दावे पर लोगों ने काफी हद तक यकीन कर लिया। लेकिन ये यकीन मिट्टी में मिलते ज्यादा वक्त नहीं लगा। खास तौर पर दोबारा भारी बहुमत के साथ दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद से तो उन पर सत्ता का नशा इस कदर सवार हुआ है जैसा परंपरागत नेताओं के साथ भी नहीं होता।

ईमानदारी से बेइमानी तक का सफर

राजनीति में आने के बाद से अरविंद केजरीवाल के क्रियाकलापों को देखो ध्यान से देखा जाए तो उनमें और किसी भी अन्य भ्रष्ट राजनेता में कुछ खास अंतर नहीं पता चलेगा। पिछले दिनों में उनके काम और किस तरीके की ख़बरें उनके बारे में मिल रही है उनसे काफी हद तक उनकी तुलना बीएसपी सुप्रीमो मायावती से की जा सकती है। राजनीति में आने के पहले या बाद में मायावती ने कभी भी अपनी इमेज बिल्डिंग के लिए कुछ नहीं किया इसलिए उनकी इमेज एक आम राजनेता की तरह ही है। लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल को एक ईमानदार नेता की तरह देखा जाता था। हालांकि उनका राजनीतिक आचरण उनकी इमेज से अब मेल नहीं खाता है।

केजरीवाल और मायावती में 5 समानताएं?

उत्तर प्रदेश चुनाव में हार के बाद जहां मायावती ने फौरन वोटिंग मशीनों पर सवाल खड़े कर दिए, IIT से पासआउट इंजीनियर होने के बावजूद केजरीवाल ने भी बिल्कुल वही काम किया। मायावती को हो सकता है कि तकनीकी बातों की समझ न हो, लेकिन केजरीवाल को अच्छी तरह पता होना चाहिए कि EVM पर जिस तरह के शक वो जता रहे हैं वो संभव ही नहीं है।

  1. नोटबंदी पर सवाल उठाने में भी मायावती और अरविंद केजरीवाल दोनों ही बराबर तौर पर आगे थे। नोटबंदी के बाद दोनों नेताओं के बयानों को देखें तो ऐसा लगता है जैसे इस फैसले से उन्हें जरूर कोई निजी नुकसान हुआ है। मायावती के मामले में बात समझी जा सकती थी किंतु अरविंद केजरीवाल जो कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से राजनीति में आए थे उनका विरोध लोगों की समझ से परे था। कहा जाता है पंजाब चुनाव में उन्होंने बड़ी मात्रा में ब्लैकमनी इकट्ठा की थी जो उन्होंने नोटबंदी के दौरान गंवा दी। ठीक इसी तरह  मायावती को यूपी चुनाव की तैयारी में झटका लगा था। संबंधित रिपोर्ट: करंसी बैन से इन्हें हुआ है सबसे ज्यादा नुकसान!
  2. कहा जाता है कि मायावती के पास एकमुश्त दलित वोट बैंक है जो किसी भी हालत में मायावती को ही सपोर्ट करता है। इसी वोट बैंक के दम पर मायावती हर चुनाव में अपने कैंडिडेट्स को पैसा लेकर टिकट बेचती हैं। पंजाब चुनाव में आम आदमी पार्टी के कई पुराने वॉलेंटियर्स ने दावा किया कि उनसे टिकट के बदले में करोड़ों रुपये मांगे गए। खुद पंजाब में आम आदमी पार्टी के सीनियर नेता रहे सुच्चा सिंह छोटेपुर ने भी बताया था कि हर उम्मीदवार से 2 से 5 करोड़ रुपये तक लेकर टिकट दिए गए हैं।
  3. मायावती और केजरीवाल दोनों को ही बगावत मंजूर नहीं। दोनों ही अपने विरोध को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं कर पाते और अपने से अलग राय रखने वालों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियों में ऐसे कई नेता मिल जाएंगे जो शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ बयानबाजी करने के बाद भी पार्टी में बने हुए हैं। लेकिन मायावती और केजरीवाल की पार्टी में ऐसा करने वाले को बख्शा नहीं जाता।
  4. दोनों ही अपने विरोधियों के लिए बेहद ही अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं। मायावती अपने विरोधी मुलायम सिंह यादव के लिए बेहद आपत्तिजनक भाषा इस्तेमाल करने के लिए कुख्यात रही हैं। आजकल वो ऐसी ही भाषा पीएम नरेंद्र मोदी के लिए प्रयोग कर रही हैं। ठीक यही हालत केजरीवाल की है, जो पहले पार्टी में अपने विरोधियों के साथ गाली-गलौज करते थे, लेकिन आजकल वो प्रधानमंत्री के लिए जिस तरह के शब्द इस्तेमाल करते हैं उससे कई बार यह शक भी होता है कि शायद केजरीवाल का मानसिक संतुलन ही ठीक नहीं है।
  5. मायावती और केजरीवाल के बीच एक और समानता ये है कि दोनों कभी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ कुछ नहीं बोलते। बताते हैं कि अंदरूनी तौर पर बीएसपी और आम आदमी पार्टी दोनों ही कांग्रेस को मदद करते हैं। संसद में कई मौकों पर बीएसपी कांग्रेस के इशारे पर काम करती रही है। ठीक इसी तरह केजरीवाल भी कांग्रेस के खिलाफ चाहे कुछ भी बोल लें, लेकिन अंदर ही अंदर सोनिया गांधी के संपर्क में रहते हैं।

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