मोदी ने बनारस के लिए क्या किया? जवाब के लिए पढ़ें

यूपी चुनाव में विपक्षी पार्टियों के नेता बार-बार कह रहे हैं कि पीएम मोदी ने वाराणसी में कुछ नहीं किया। यहां तक कि रायबरेली में अपने चुनाव प्रचार में प्रियंका वाड्रा ने भी आरोप लगा दिया कि वाराणसी में कोई काम नहीं हुआ। क्या वाकई ये आरोप सही है? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए न्यूज़लूज़ टीम ने वाराणसी लोकसभा क्षेत्र के अलग-अलग इलाकों का दौरा किया और विकास परियोजनाओं के बारे में जानकारी बटोरी। हमने कई स्थानीय लोगों और अधिकारियों से बात की और हर जगह जाकर ग्राउंड रिएलिटी को भी अपनी आंखों से देखा। बनारस में अभी जिन परियोजनाओं पर काम चल रहा है उनमें पीएम मोदी के विजन की छाप देखी जा सकती है। इनमें से ज्यादातर प्रोजेक्ट जब पूरे होंगे तो इससे न सिर्फ वाराणसी बल्कि पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश की किस्मत बदल सकती है। कुछ प्रोजेक्ट ऐसे भी हैं जो केंद्र और राज्य सरकार के झगड़े में लटके हैं। इसके अलावा कुछ ऐसे काम भी चल रहे हैं जिनकी कल्पना आम तौर पर नहीं की जाती। हमने बनारस में पीएम मोदी के प्रोजेक्ट्स की एक लिस्ट तैयार की है, जो कुछ इस तरह है-

1. रामनगर में कार्गो टर्मिनल, लागत 184 करोड़

रामनगर के राल्हूपुर गांव में गंगा के किनारे बन रहा मल्टी मॉडल कार्गो टर्मिनल बनारस में पीएम मोदी का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट माना जाता है। ये प्रोजेक्ट अब तक पूरा होने को होता, लेकिन बताते हैं कि समाजवादी पार्टी के कुछ करीबियों ने इस प्रोजेक्ट के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका डाल दी थी। कोर्ट से इसे पिछले साल अप्रैल में इजाज़त मिली। जिसके बाद अब पूरे जोर-शोर से काम शुरू हो चुका है। खुद पीएम मोदी हर महीने इस प्रोजेक्ट के कामकाज की जानकारी लेते हैं। जून 2016 में शुरू हुआ कार्गो प्रोजेक्ट अगस्त 2018 में पूरा होने का टारगेट है। कंस्ट्रक्शन कंपनी AFCONS यहां जोर-शोर से काम कर रही है। ये गंगा नदी पर बन रहा एक तरह का छोटा-मोटा बंदरगाह होगा। जहां पर कार्गो शिप आया करेंगी। इस पोर्ट से बंगाल का हल्दिया बंदरगाह जुड़ा रहेगा। फिलहाल यहां से एक हजार टन साइज के मालवाहक जहाजों का आवागमन शुरू भी हो चुका है। इनसे सीमेंट और मारुति कारों की ढुलाई हो रही है। जो कि सड़क रास्ते के मुकाबले काफी सस्ता पड़ता है। इस पोर्ट को रेलवे और सड़क से भी जोड़ा जा रहा है। आगे चलकर इस नदी बंदरगाह का एक टर्मिनल गाजीपुर में भी बनने वाला है। इसके बनने के बाद पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में ऐसे उद्योग-धंधे खुल सकेंगे, जो हल्दिया के रास्ते एक्सपोर्ट कर सकेंगे। समझना बहुत मुश्किल नहीं है कि इस एक कदम से बनारस समेत पूर्वी यूपी का पूरा इलाका उद्योग-धंधो से भर जाएगा और यहां के लोगों को रोजगार के लिए कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं होगी।

2. डीजल रेल इंजन कारखाने की क्षमता बढ़ी, लागत 266 करोड़

रेलवे मंत्रालय ने 266 करोड़ रुपये खर्च करके वाराणसी में डीजल लोकोमोटिव वर्क्स (डीएलडब्लू) की क्षमता एक चौथाई बढ़ाने का काम शुरू किया है। वाराणसी के इस इकलौते बड़े कारखाने में डीजल इंजन बनाए जाते हैं। लेकिन टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन की कमी के कारण बीते कुछ साल में ये कारखाना मंदी का शिकार हो रहा था। लेकिन मोदी के आने के बाद इस कारखाने के अच्छे दिन आ गए हैं। बनारस के डीएलडब्लू कारखाने के जरिए हजारों परिवारों को डायरेक्ट और इनडायरेक्ट तरीके से रोजगार मिला हुआ है।

3. इंटिग्रेटेड टेक्सटाइल ऑफिस कॉम्प्लेक्स, 64 करोड़ रुपये

बुनकरों के शहर बनारस के लिए ये एक अनोखा प्रोजेक्ट है। दिसंबर 2015 में इस पर काम शुरू हुआ है, जो इस साल दिसंबर तक पूरा हो जाएगा। चौकाघाट इलाके में हैंडलूम टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट के साथ में बन रहे इस कॉम्प्लेक्स में कपड़ा और हथकरघा उद्योग से जुड़ी हर सहायता मौजूद होगी। बुनकर यहां पर आकर नई डिजाइन और नए डिमांड की जानकारी ले सकेंगे और यहां से सीधे कारोबारियों को अपना माल भी उचित कीमत पर बेच सकेंगे। केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी ने बताया था कि यहां पर बुनकर सेवा केंद्र और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (निफ्ट) का एक्सटेंशन भी होगा जो समय समय पर कारीगरों की ट्रेनिंग का इंतजाम करेगा। ताकि बनारस का कपड़ा उद्योग नए वक्त की जरूरत के हिसाब से ढल सके। अब यहां से हैंडलूम टेक्नोलॉजी में बीटेक कोर्स भी शुरू करने की तैयारी चल रही है।

बुनकरों के इस ट्रेड सेंटर के लिए केंद्र सरकार ने जब अखिलेश सरकार से जमीन मांगी थी तो उन्होंने साफ मना कर दिया था। इसके बाद कपड़ा मंत्रालय ने खुद से ही जमीन का इंतजाम किया। जबकि ऐसे प्रोजेक्ट्स में आम तौर पर राज्य सरकारें ही जमीन मुहैया कराती हैं।

4. आईआईटी बीएचयू में रेल रिसर्च, लागत 5 करोड़

पीएम बनने से पहले मोदी विश्वविद्यालयों को उद्योगों से जोड़ने की बात कहा करते थे। अपने इस सपने को उन्होंने सबसे पहले बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में लागू किया है। इसके तहत वहां पर रेलवे का आर एंड डी सेंटर खोला गया है। 5 करोड़ की लागत से बन रहे इस प्रोजेक्ट ने काम शुरू भी कर दिया है। इसके तहत रेलवे की टेक्नोलॉजी में सुधार पर शोध हो रहा है।

5. मिनी पीएमओ

वाराणसी शहर के अंदर मिनी पीएमओ नाम से मशहूर यह दफ्तर दरअसल सांसद के तौर पर पीएम मोदी का कार्यालय है। यहां पर हर रोज कई दर्जन लोग अपनी शिकायतें और फरियाद लेकर आते हैं। इनमें गैस कनेक्शन से लेकर रेल टिकट कन्फर्म कराने की अर्जी तक होती है। अक्सर यहां पर केंद्रीय मंत्री खुद बैठकर लोगों की शिकायतें सुनते और उनका निपटारा करते हैं। बहुत सारे लोगों के काम यहां अर्जी डालने पर से हो जाते हैं। हालांकि ऐसे काम नहीं हो पाते, जो दरअसल राज्य सरकार के दायरे में आते हैं।

6. वाराणसी की कनेक्टिविटी में सुधार, 7100 करोड़

सड़क परिवहन मंत्रालय के तहत बनारस को आसपास के शहरों से जोड़ने के लिए कुल 524 किलोमीटर सड़कों का निर्माण हो रहा है। इनमें 6 लेन औऱ 4 लेन की सड़कें शामिल हैं। यूपी सरकार के असहयोग के कारण ये प्रोजेक्ट सबसे बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। यहां नेशनल हाइवे से जोड़ने के ज्यादातर प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी मिसाल है वाराणसी बाइपास बनाने का काम। ये राज्य सरकार के तहत आता है। केंद्र सरकार ने इसे अपने हाथ में लेकर काम शुरू किया, लेकिन मुआवजे के लिए किसानों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिए और काम ठप हो गया। आरोप है कि किसानों को भड़काने का काम भी लोकल समाजवादी पार्टी नेताओं के जरिए किया गया। बाबतपुर एयरपोर्ट से शहर को जोड़ने वाली 17 किलोमीटर लंबी सड़क भी इसी प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इतनी महत्वपूर्ण सड़क होने के बावजूद बीते कई साल से इस सड़क की हालत बेहद खस्ता थी। कोई भी सरकार इस पर ध्यान नहीं देती थी। अब जब केंद्र सरकार ने इसको नए सिरे से बनाने का फंड जारी किया तो अतिक्रमण से लेकर मुआवजे की मांग तक कई तरह की अड़ंगेबाजी लोकल नेताओं की तरफ से लगाई जा रही है।

7. बिजली, टेलीफोन के तार अंडरग्राउंड

केंद्रीय बिजली मंत्रालय और टेलीकॉम मंत्रालय मिलकर पूरे बनारस में बिजली और फोन के तारों को अंडरग्राउंड करने में जुटे हैं। कई बड़ी सड़कों पर ये काम हो भी चुका है। अभी पूरे बनारस में बिजली के तारों का एक जंजाल देखने को मिलता था। ये काम इंटिग्रेटेड पावर डेवलपमेंट स्कीम के तहत जारी है। अस्सी से राजघाट तक गंगा घाटों के किनारे के इलाकों में तारों को अंडरग्राउंड किया जा रहा है। इसकी कुल लंबाई 1100 किलोमीटर के करीब है।

8. हेरिटेज सिटी योजना, 89 करोड़ रुपये

बनारस की विरासती पहचान को बनाए रखने के लिए हृदय योजना के तहत काम भी चल रहा है। इसके तहत वाराणसी की 24 सड़कों की पहचान की गई है। इनमें से 9 सड़कों को बनाने का काम नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (NBCC) कर रहा है। इसके अलावा 10 सड़कों को नए सिरे से बनाने का काम नगर निगम के तहत हो रहा है। दिसंबर 2016 तक इस प्रोजेक्ट का 50 फीसदी काम पूरा हो चुका है। इस परियोजना में 200 करोड़ रुपये अभी और मिलने वाले हैं।

9. बनारस में गंगा पर क्रूज, प्राइवेट सेक्टर में निवेश

शहर में दुनिया भर से आने वाले सैलानियों को देखते हुए यहां वर्ल्ड क्लास टूरिज्म विकसित करने का काम भी जारी है। इसी के तहत पर्यटन मंत्रालय ने गंगा पर क्रूज चलाने का प्रोजेक्ट शुरू किया है। इसके तहत बनारस से पटना और कोलकाता के बीच क्रूज चलाए जा रहे हैं। पटना तक 7 सातों के क्रूज का टिकट 90 हजार रुपये है। इसी तरह कोलकाता तक का पैकेज 22 दिन का है। बनारस के अंदर ही राजघाट से अस्सी घाट के बीच क्रूज चलाने की भी तैयारी है। विदेशी सैलानियों के बीच ये क्रूज इतने लोकप्रिय हो चुके हैं कि इनमें 80 फीसदी तक टिकट हाथोंहाथ बिक रहे हैं। ये क्रूज पूरी तरह प्राइवेट सेक्टर में हैं, लेकिन इनके रेगुलेशन का काम पर्यटन मंत्रालय और इनलैंड वाटरवेज़ अथॉरिटी देख रही हैं। इसके अलावा अस्सी घाट पर हर रोज शाम को लाइट एंड साउंड लेज़र शो का प्रोजेक्ट भी आखिरी चरण में है। इस पर 10 करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं।

10. गंगातीरी गाय संरक्षण योजना, 4 करोड़ रुपये

बनारस शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर शहंशाहपुर गांव में इस अनोखे प्रोजेक्ट पर काम जारी है। अब लगभग लुप्त हो चुकी गंगातीरी नस्ल की गायों के संरक्षण का काम यहां पर हो रहा है। 195 एकड़ के इलाके में बने डेयरी फार्म में शुद्ध नस्ल की 249 गायों को रखा गया है। ये गायें रोज 8 से 10 लीटर तक दूध देती हैं। अब प्रजनन के जरिए इन गायों की संख्या बढ़ाई जा रही है और इन्हें गंगा से लगे पूरे इलाके के गांवों में किसानों को दिया जाएगा।

11. कुश्ती और जूडो जैसे खेलों को बढ़ावा

जिस तरह से हरियाणा के गांवों में कुश्ती के खिलाड़ी तैयार करने की परंपरा है, वैसा ही बनारस में भी कई गांवों में होता है। ऐसा ही एक गांव है ककरहिया, जहां पर एक तरह का खेल गांव विकसित किया जा रहा है। यहां पर कुश्ती और जूडो के खेलों की इंटरनेशनल लेवल की सुविधाओं का इंतजाम हो रहा है। पीएम के निर्देश पर यहां अब तक करीब 100 अखाड़े बनाए गए हैं। जिनमें हर रोज सैकड़ों की तादाद में पहलवान दांवपेच लगाते हैं। मशहूर पहलवान नरसिंह यादव भी वाराणसी के ही नीमा गांव के हैं। पीएम मोदी ने इन तमाम इलाकों में कुश्ती की परंपरा में जान फूंकने का काम शुरू किया है और उन्होंने यहां के लोगों को टारगेट दिया है कि वो अपने बीच से एशियाड और ओलिंपिक में जाने लायक पहलवान और जूडो खिलाड़ी तैयार करें।

बनारस के विकास मॉडल में क्या कमी रही?

इन तमाम प्रोजेक्ट्स के अलावा बनारस की सूरत बदलने की पीएम मोदी की कोशिशों में कुछ कमियां भी दिखाई देती हैं। जापान के क्योटो की तर्ज पर काशी के विकास की खबरों ने यहां के लोगों की उम्मीदें बढ़ा दी थीं। लेकिन हुआ कुछ नहीं। क्योटो और काशी की तुलना बिल्कुल भी व्यावहारिक नहीं थी। बनारस शहर में अब भी गंदगी का अंबार है। शहर में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की बातें तो बहुत हुईं, लेकिन हुआ कुछ नहीं। शहर की सफाई की जिम्मेदारी नगर निगम पर है और नगर निगम पर बीजेपी का कब्जा है। ऐसे में गंदगी के लिए अक्सर लोग बीजेपी को ही कोसते नजर आते हैं। इसी तरह शहर के मछुआरों को सोलर बोट देने की मोदी सरकार की योजना भी फिसड्डी साबित हुई है। ऐसी ज्यादातर बोट बेकार पड़ी हैं।

कुल मिलाकर बनारस में पीएम मोदी की जो योजनाएं अभी चल रही हैं उनका असर लोगों को दिखना शुरू भी हो चुका है। जो काम हो रहे हैं उनसे सिर्फ बनारस नहीं, बल्कि पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश की तस्वीर बदल सकती है। अब तक उत्तर प्रदेश सरकार की अड़ंगेबाजी के बीच जितना काम हुआ है उसे भी काफी माना जा सकता है। वैसे भी बीते कई दशक में बनारस के लोग इतने विकास की उम्मीद भी छोड़ चुके थे।

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