यूपी वालों जाति छोड़ो, या पूरे जातिवादी हो जाओ!

22 करोड़ की आबादी वाले यूपी में यूं तो 13 प्रतिशत ब्राह्मण हैं लेकिन 9 प्रतिशत यादव पिछले 27 साल से देश के सबसे बड़े राज्य के भाग्य विधाता बने हुए है। यूपी में राजपूत कोई 7.8 प्रतिशत है लेकिन 1.7 प्रतिशत जाट लखनऊ के सिंहासन पर भारी हैं।राजनीतिक मंच पर ब्राह्मण निरीह है और ठाकुर निर्बल। ये कोई लिखता तो नहीं है लेकिन गंगा जमुनी तहजीब और अमन-चैन के छद्म नारों के परे, उत्तर प्रदेश की ज़मीनी हकीकत यही है।

हरदोई से अमेठी तक गाँव-गाँव आपको सैकड़ों ब्राह्मण सुदामा स्टाइल में, झोपड़ी और धोती में मिलेंगे। लेकिन कभी सैफई के आसपास जाइए। नाइके के स्पोर्ट्स शूज और सैमसंग के स्मार्टफोन से लैस रिवॉल्वर धारी यादव ठेकेदार आपको सपा के लहलहाते झंडे वाली सफ़ेद स्कॉर्पियो गाड़ी में विचरण करते मिल जाएंगे। यूपी में लांच होने वाली नई SUV गाड़ियां अगर देखनी हों तो आप इस यादव बेल्ट में जाइए। अलीगढ से इटावा और फ़िरोज़ाबाद से कानपुर तक, मंडी पार्षद, पीडब्लूडी और विकास प्राधिकरण के सारे ठेकों पर काबिज़ यादव, आपको 30 लाख की नई फार्च्यूनर से लेकर 28 लाख की स्पोर्ट्स पजेरो में धूल उड़ाते दिख जाएंगे। किसी जमाने में शराब से लेकर सड़क तक के ये सरकारी ठेके जायसवाल और अग्रवाल घरानों के हाथ में होते थे। फिर 80 के दशक में हरिशंकर, अमरमणि और मुख्तारों जैसे बाहुबलियों का दौर आया लेकिन आज यूपी में मालदार ठेकेदार का मतलब समाजवादी पार्टी का गुंडा है। सपा का सफ़ेद कुर्ते वाला गुंडा।

यूपी
में बहुमत वाले ओबीसी की कहानी भी मध्ययुगीन भारत के छोटे-छोटे रजवाड़ों जैसी है। ओबीसी की कई जातियां यूपी में 2-2 और 4-4 परसेंट में बिखरी हुई हैं। कहने को यहाँ गैर-यादव ओबीसी कोई 36 फीसदी हैं लेकिन उन पर सिर्फ 19 फीसदी मुसलमान भारी हैं। नाई हो, कहार हो, कुम्हार हो, कुर्मी हो या फिर तेली हो, काछी हो या मल्लाह हो…. इन जातियों को बिखेर कर ही मुलायम और माया ने यूपी में सल्तनत बनाई है। दरअसल 9 प्रतिशत यादव जब 19 प्रतिशत मुसलमान से जुड़ता है तो समाजवादी पार्टी किसी तैमूर लंग की तरह सूबे की सत्ता लूट कर 21 लाख करोड़ रुपए के बजट को हथिया लेती है। और जब माया के 17 प्रतिशत जाटव इसी 19 फीसदी मुस्लिम वोटबैंक में सेंध लगाने में सफल हो जाते हैं तो बसपा का हाथी भी 5 साल में इसी 21 लाख करोड़ रुपए को घास की तरह चर जाता है।

शायद इसीलिए मायावती के भाई आनंद, आज 500 कॉरपोरेट कंपनियों का शेयर होल्डर है। लेकिन यूपी के मुरादाबाद से लेकर ग़ाज़ीपुर और बस्ती से लेकर झाँसी तक दर्ज़नों म्यूनिसिपल नगरों की असंख्य कॉलोनियों को आज भी सीवर लाइन का इंतज़ार है। एक तरफ शहर की गंदी नालियां है तो दूसरी तरफ 21 लाख करोड़ के हरे-हरे नोट जो सरकारी तिजोरी से बहकर बसपा के गंदे गटर में जमा होते हैं।

तस्वीर सपा की भी वैसी ही है। इसलिए अखिलेश 40 करोड़ के प्राइवेट जेट से उड़ते हैं और उनके भाई प्रतीक 4 करोड़ रुपए की सुपरकार से हज़रतगंज की रातों को तेज़ रफ्तार से चीरते हैं। लेकिन हज़रतगंज से हटकर, आज भी यूपी के छोटे-छोटे शहरों और तहसीलों की सड़कें रियायती टिकट वाली सरकारी बसों के लिए मोहताज़ हैं।

समाजवादियों के सामाजिक अन्याय की सूची बहुत लंबी पर बात छोटी-सी है। अगर 9 प्रतिशत यादव, 15 प्रतिशत जाटव और 19 प्रतिशत मुसलमान ही यूपी के किंगमेकर हैं तो किंग बदलिए।

या तो आप अपनी जाति से निकलिए… या 100 फीसदी जातिवादी हो जाइए!

पहले ये आंकड़ा बदलिए देश और आपकी किस्मत बदलते वक़्त नही लगेगा।

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)

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