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दलित उत्पीड़न के आरोपियों को भी बीएसपी के टिकट

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि खुद को दलितों की हितैषी बताने वाली बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों में कई ऐसे नाम भी हैं, जिन पर दलितों पर अत्याचार के मुकदमे चल रहे हैं। एक उम्मीदवार तो ऐसा भी है जिस पर एक दलितों की हत्या का आरोप है। पहली नजर में कम से कम 4 ऐसे लोगों को टिकट मिला है जिन पर एससी-एसटी एक्ट के तहत गंभीर मुकदमे चल रहे हैं। इन सभी को बाकायदा पार्टी सुप्रीमो मायावती के दस्तखत से टिकट दिए गए हैं।

1. राघवेंद्र सिंह, फिरोजाबाद की सिराजगंज सीट से उम्मीदवार:
इन पर हत्या के कुल 4 केस चल रहे हैं। ये सभी मामले आईपीसी की धारा 3(2)5 यानी एससी-एसटी एक्ट के तहत हैं। ये सारे केस उन पर 2007 में दर्ज हुए थे। उधर राघवेंद्र सिंह की दलील है कि उन्हें गलत तरीके से दलित व्यक्ति की हत्या के मामले में पूर्व मंत्री जयवीर सिंह के इशारे पर फंसाया गया था। जयवीर सिंह तब मायावती सरकार के मंत्री हुआ करते थे।

2. ज्ञानेंद्र गौतम, आगरा उत्तरी से उम्मीदवार: इनके खिलाफ दो मामले दर्ज हैं, जोकि धारा 22 व एसएसी-एसटी एक्ट के तहत हैं। गौतम ने अपने चुनावी हलफनामे में इस बात की भी जानकारी दी है कि उनके खिलाफ इन दोनों ही मामलों की जांच पर 2015 में कोर्ट ने रोक लगा दी है। गौतम का कहना है कि यह मामले उनपर राजनीति के तहत लगाए गए थे। हालांकि उनके राजनीतिक विरोधियों का आरोप है कि वो दलितों की जमीन हड़पने के मामले में फंसे हुए हैं।

3. वीरेंद्र सिंह, बरेली की चैनपुर सीट से उम्मीदवार:
इन्होंने एफिडेविट में बताया है कि उनके खिलाफ 3 मामले दर्ज हैं। 2005 में बरेली में उन पर दंगा भड़काने, जबरन बंधक बनाने और एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था। वीरेंद्र सिंह का दावा है कि ये सारे केस फर्जी हैं और कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है।

4. अरिमर्दन सिंह, महोबा से उम्मीदवार: इनके खिलाफ आठ केस दर्ज हैं। जिनमें अपहरण से लेकर दलित उत्पीड़न का मुकदमा भी शामिल है। उनकी भी दलील वही है कि राजनीतिक साजिश के तहत उन पर झूठा आरोप लगाया गया। इनका भी दावा यही है कि कोर्ट उन पर चल रहे मुकदमे पर रोक लगा चुका है। अरिमर्दन सिंह महोबा सीट से ही कांग्रेस के टिकट पर दो बार जीत चुके हैं। इस बार वो हाथी पर सवार हैं।

दलितों को भूल चुकी हैं मायावती!

वैसे टिकटों के बंटवारे में भी यह बात झलकती है कि मायावती का फोकस अब दलितों के अलावा दूसरे तबकों पर है। इसलिए उन्होंने सबसे ज्यादा टिकट सवर्णों, ओबीसी और मुसलमानों को बांटे हैं। 401 में से सिर्फ 87 दलितों को टिकट दिया गया है। जबकि बीएसपी दलितों के नाम की ही राजनीति करती है। यूपी में दलितों को मायावती का काडर माना जाता है लेकिन यह बात सही है कि मायावती ने कभी किसी दलित को आगे नहीं बढ़ाया। उनके इर्दगिर्द ब्राह्मण, मुस्लिम और ओबीसी वर्ग के लोगों का ही बोलबाला है।

क्या मायावती से दलितों का मोहभंग?

यह सवाल लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के नतीजों के बाद ही उठा था। क्योंकि राज्य में बीजेपी की बड़ी जीत के पीछे बड़ा कारण यह था कि दलितों ने कई सीटों पर एकजुट होकर बीजेपी के पक्ष में वोट दिया था। लोकसभा चुनाव में यूपी में बीजेपी को 3 करोड़ 43 लाख वोट मिले थे। जबकि समाजवादी पार्टी को 1 करोड़ 80 लाख और बहुजन समाज पार्टी को 1 करोड़ 59 लाख वोट। गैर-जाटव दलितों का बड़ा तबका आज भी मायावती को पसंद तो करता है, लेकिन उन्हें बीजेपी से कोई ऐतराज नहीं। बीजेपी की सारी कोशिश इसी तबके को लेकर है। इस तबके को बीजेपी से दूर रखने के लिए ही दूसरी पार्टियां बीजेपी को दलित-विरोधी और आरक्षण विरोधी के तौर पर दिखाने की कोशिश करती हैं।

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