यूपी में राहुल खुद तो डूबे, प्रशांत किशोर को भी ले डूबे!

आशीष कुमार

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के ‘कुशासन’ के खिलाफ कांग्रेस पार्टी ने ही सबसे पहले चुनाव प्रचार शुरू किया था। जीत की बड़ी उम्मीद से कांग्रेस ने एक मोटी फीस के साथ प्रशांत किशोर को राहुल गांधी का राजनीतिक सलाहकार नियुक्त किया था। उम्मीद थी कि इससे राहुल गांधी की हमेशा फिसड्डी वाली छवि सुधर जाएगी। पर ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा। नियुक्ति के बाद से ही कांग्रेस पार्टी की सारी रणनीतियां स्वयं प्रशांत किशोर निश्चित कर रहे थे। उन्होंने ने राहुल गांधी से कई हजार किलोमीटर की यात्राएं पूरे उत्तर प्रदेश में करवाईं। इन यात्राओं के दौरान हुई खाट सभाओं में भी राहुल गांधी की काफी फजीहत हुई। इन सभाओं में लोगों का ध्यान राहुल गांधी की बातें सुनने से ज्यादा वहां आई खाटों को अपने साथ ले जाने में होता था, और खाटों के लालच में जुटे लोग ना पाने पर दुखी होकर ही लौटे। ऐसा लगता है चुनाव आने से पहले ही प्रशांत किशोर ने अपने घुटने पूरी तरह से टेक दिए हैं। कांग्रेस पार्टी की बुरी हालत को देखते हुए ना सिर्फ राहुल गांधी बल्कि प्रशांत किशोर भी अपने लिए पतली गली खोज रहे हैं और समाजवादी पार्टी से गठबंधन में उनको यह रास्ता दिखाई दे रहा है। मतलब ये कि प्रशांत किशोर ने मान लिया कि कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी का अब कुछ नहीं हो सकता।

कल का खलनायक आज का पार्टनर

फजीहत से डरी कांग्रेस पार्टी अब चुनावों में सपा से गठबंधन की कोशिश कर रही है। कांग्रेस पार्टी हालांकि अपनी इज्जत बचाने के लिए गठबंधन में अपने लिए कम से कम 100 सीटें चाहती है। यहाँ एक बार फिर प्रशांत किशोर विफल नज़र आ रहे हैं और समाजवादी पार्टी उनको 100 से ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं है। हालांकि पिछले कुछ दिनों से गठबंधन की संभावना भर से कांग्रेस नेता जिस तरीके से समाजवादी पार्टी की सरकार की बड़ाई करने लगे थे उससे अब उनके पास मजबूरी में ही सही समाजवादी पार्टी से जितनी भी सीटें मिले उनपर गठबंधन करना ही होगा।

रणनीति में फिसल गए प्रशांत किशोर

प्रशांत किशोर यूपी में ब्राह्मण वोटरों को कांग्रेस की ओर खींचने के पक्ष में रहे हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर प्रोजेक्ट करवाया। प्रशांत की दलील थी कि नीतीश कुमार की मदद से वो कुर्मी और कुछ दूसरी ओबीसी जातियों को कांग्रेस की तरफ मोड़ने में कामयाब रहेंगे। लेकिन कांग्रेस पार्टी के ही कई नेताओं को लग रहा है कि खुद ब्राह्मण होने के कारण से प्रशांत किशोर का झुकाव ब्राह्मणों की तरफ ज्यादा है। कांग्रेस नेताओं की दलील है कि उत्तर प्रदेश में सिर्फ 10 फीसदी ब्राह्मण हैं और उन पर फोकस बढ़ने से उनका पारंपरिक दलित और मुस्लिम वोटर छिटकता जा रहा है।

प्रशांत किशोर की काबिलियत सवालों में

प्रशांत किशोर एक राजनीतिक रणनीतिकार हैं जिनका नाम लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी की जीत से जोड़ कर लिया जाता है। हालांकि बाद में अमित शाह से मतभेद होने से उनके बीच दूरी बन गई और प्रशांत किशोर बिहार चुनावों से पहले नीतीश कुमार के लिए चुनाव की कमान संभालने लगे। यहां उनका रोल नीतीश और लालू के बीच में महागठबंधन बनवाने और उसकी जीत में रहा। चुनावों में उनकी इसी इसी सफलता को देखते हुए राहुल गांधी ने भी उनको अपना रणनीतिकार बनाया। दिल्ली में कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि प्रशांत किशोर अब तक जीतने वाले घोड़ों पर दांव लगाते आए हैं, उनकी कामयाबी की असली वजह यही है। यूपी में कांग्रेस की राह बेहद मुश्किल है।

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