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जल्लीकट्टू के बाद क्या बकरीद भी बंद होगी?

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पिछले साल ढाका की सड़कों पर बकरीद के मौके पर खून की नदी बहते सभी ने देखा। भारत में ऐसी नदी नहीं बही, क्योंकि हमारे यहाँ बारिश नहीं हुई और होती भी तो हमारा सीवेज सिस्टम बांग्लादेश से तो अच्छा ही है। पर क्या सिर्फ ना दिखने से इस सच को झुठलाया जा सकता है कि हर बकरीद लाखों बेजुबान जानवरों को एक खास वर्ग के कुछ घंटों की ख़ुशी के लिए जान से मार दिया जाता है। और मजे की बात ये है की ना कोई सरकारी फरमान आता है ना कोर्ट का आदेश। यहां तक कि जानवरों के नाम पर दुनिया भर में नाटक करने वाली संस्था पेटा ऐसे गायब हो जाती है जैसे गधे के सिर से सींग। सब मजे से चल रहा है, किसी को कोई फर्क पड़ता।

ये बात इस लिए याद आई क्योंकि पिछले कुछ साल से दक्षिण भारत का एक त्यौहार ‘जल्लीकट्टू’  बड़ी चर्चा में है। तमिल लोग ढाई हजार साल से ये त्यौहार मनाते आ रहे हैं। इस मौके पर लोग सांड को भीड़ में उत्पात मचाने को खुला छोड़ देते हैं और कुछ युवाओं को ऐसे सांड को एक तय समय तक रोक कर रखना होता है। इस खेल में काफी भीड़ होने से कभी लोगों को चोट लगने तो कभी सांड को चोट लगने का खतरा रहता है। जान जाने का खतरा जरूर है, पर ऐसा नहीं कि जान नहीं गई तो त्यौहार ही नहीं हुआ। भला किस साहसिक खेल में ये खतरा नहीं है।

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फिर भी हमारे बुद्धिजीवी और अब तो सुप्रीम कोर्ट भी इस परंपरागत त्यौहार पर बहुत मेहरबान हैं।  सबको लगता है कि ऐसा खतरनाक त्यौहार जिसमें किसी पशु और इंसान की जान को खतरा हो उसे मनाया ही क्यों जाता है। कुछ लोग एक कदम आगे जाकर इसकी तुलना सती प्रथा से करके पूछने लगे हैं कि कोई परंपरा भले ही पुरानी हो गलत हो तो बंद क्यों नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे लोगों से सहमति जताते हुए इस त्यौहार पर पाबंदी भी लगा दी। पर अब आगे क्या? क्या जान जाने के खतरे भर से जब एक परंपरागत खेल और त्यौहार पर पाबंदी लगाई जा सकती है तो सचमुच जान लेने वाले वाले त्यौहारों पर पाबंदी नहीं लगनी चाहिए?

सारा खेल तुष्टीकरण का

ऐसा नहीं होगा क्योंकि तुष्टीकरण में बुझा-बुझा कर चमकाई गई हमारे देश की राजनीति और समाजनीति में इतना दम ही नहीं बचा है, कि ऐसे सवाल भी पूछ सके। जलीकट्टू एक अकेला उदाहरण नहीं है, होली पर पानी की बर्बादी, दिवाली पर वायु प्रदूषण, दुर्गा पूजा और गणेश पूजा पर जल प्रदूषण की चर्चा जोरों से होती हैं, पर बात अभी तक पाबंदी तक नहीं पहुचाई जा सकी है। यहाँ तक कि ऐसे लोग अब तो रक्षाबंधन और करवा चौथ जैसे व्रत त्योहारों पर भी सवाल खड़ा करने से पीछे नहीं रहते।

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सवाल खड़ा करने से कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि समाज और देश में प्रगति के लिए ये जरूरी है कि सवाल पूछे जाएं और यथासंभव समाधान भी खोजा जाए। पर गुस्सा इस बात का है कि जब बात पूरे समाज और देश की हो रही है तो सवाल सबके सब एकतरफा क्यों हैं? क्या साल दर साल घटती हुई 80 प्रतिशत बची आबादी को सभ्यता का संदेश और बाकी आबादी को कुछ भी सवाल नहीं करना सही है?

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आशीष कुमार
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