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ऊना के दलितों ने पंचायत चुनाव में बीजेपी को जिताया

गुजरात के ऊना में एक दलित परिवार को पिटवाने का आरोपी सरपंच प्रफुल्ल कोराट चुनाव में बुरी तरह हार गया है। गांव के लोगों ने बीजेपी के समर्थन पर चुनाव लड़ रहे धनजी भाई कोराट को नया सरपंच चुना है। पिछले साल जुलाई में गुजरात के ऊना जिले के मोटा समधियाला में दलितों को बुरी तरह पीटने के मामले में ये गांव काफी चर्चा में रहा था। गोरक्षकों के नाम पर कुछ गुंडों ने गांव के एक दलित परिवार के 4-5 सदस्यों को रस्सी से बांधकर बुरी तरह पीटा था। इसका वीडियो वायरल होने के बाद मामले पर भारी हंगामा खड़ा हो गया था। जांच में यह पता चला कि गांव का सरपंच ही पिटाई के पीछे था। ये सरपंच ऊना से कांग्रेसी विधायक का काफी करीबी बताया जाता है।

गांव के दलितों ने बीजेपी को चुना

गुजरात का ऊना जिला कांग्रेस का गढ़ माना जाता है, लेकिन इस मामले में कांग्रेस की भूमिका को लेकर लोगों में शुरू से ही शक रहा। नेशनल मीडिया दलितों पर अत्याचार के इस मामले को लेकर भले ही केंद्र की मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश कर रही थी, लेकिन स्थानीय लोग शुरू से ही मानते रहे कि इस मामले में कहीं न कहीं लोकल सरपंच और विधायक का हाथ है। मोटा समधियाला गांव में पाटीदारों की संख्या ज्यादा है। गांव में कुल 8 वार्ड हैं, जिनमें से 6 में बीजेपी के उम्मीदवारों को जीत हासिल हुई है। इनमें से एक वार्ड में दलितों की संख्या सबसे ज्यादा है। इस वार्ड में बीजेपी को सबसे ज्यादा समर्थन मिला है। यहां से बीजेपी के रमेश सरवैया उम्मीदवार थे। रमेश सरवैया उसी दलित परिवार के सदस्य हैं, जिन्हें गोरक्षा के नाम पर बर्बर तरीके से पीटा गया था। घटना के बाद हमने पूरे मामले का सच न्यूज़लूज़ पर आप तक पहुंचाया था।
संबंधित रिपोर्ट: ऊना में दलितों की पिटाई के पीछे कांग्रेस!

कांग्रेस के डर्टी गेम की पोल खुली

ऊना कांड बिहार चुनाव से ठीक पहले करवाया गया था। इसका मकसद था कि देश भर के दलितों में ये संदेश जाए कि बीजेपी के राज्यों में दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं। इस बर्बर कांड में कुछ मुसलमान भी शामिल थे, इसके बावजूद कांग्रेस के टुकड़ों पर पलने वाली दिल्ली की मीडिया ने यह कहना जारी रखा कि पीटने वाले गोरक्षक थे। बाद में जांच में यह बात सामने आई कि सरपंच प्रफुल कोराट ने ऊना के कांग्रेसी विधायक और कुछ दूसरे कांग्रेसी नेताओं के साथ संपर्क में था। अब तक की जांच में यह साफ हो चुका है कि सरपंच ने ही फोन करके बाहर से हमलावरों को बुलाया था। जो वीडियो वायरल हुआ था वो भी प्रफुल्ल कारोट के फोन से ही बना था। दलितों की पिटाई की ये पूरी कहानी कांग्रेस ने ही रची थी और उसने उसके नाम पर केंद्र सरकार को बदनाम करने की कोशिश की। गुजरात से कांग्रेस के एक बहुत बड़े नेता का नाम भी इस साजिश में उछलता रहता है।
संबंधित रिपोर्ट: सामने आ रहा है ऊना के दलितों पर अत्याचार का सच

दलित आंदोलन का केंद्र बना गांव

इस घटना के बाद दलितों के नाम पर दुकान चलाने वाले कई वामपंथी संगठनों ने गांव के लोगों में भ्रम फैलाने की कोशिश की और यह जताने की कोशिश की कि गांव में हुई घटना का केंद्र सरकार से कुछ लेना-देना है। तब मोटा समधियाला गांव में दलितों के समर्थन में कई रैलियां भी की गईं, जिनमें दलितों से ज्यादा स्थानीय मुसलमानों ने शिरकत की। इसके अलावा पीड़ित परिवार से मिलने के लिए राहुल, मायावती और केजरीवाल जैसे नेताओं का तांता लग गया। लेकिन लोगों को सच्चाई का एहसास था और चुनाव में लोगों ने दलितों पर अत्याचार करवाने वाले कांग्रेस उम्मीदवार से बदला ले लिया।

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