बीते साल में मीडिया के फैलाए टॉप-10 झूठ

बीते साल में मीडिया ने झूठी खबरें फैलाने का रिकॉर्ड बनाया है। ज्यादातर फर्जी खबरें मोदी सरकार के खिलाफ फैलाई गईं। न्यूज वेबसाइट opindia.com ने साल भर के टॉप-10 झूठों की लिस्ट जारी की है। ये झूठ हैं:

1. नोटबंदी के कारण मरने वालों की संख्या

जिस तरह से एक साल पहले मीडिया ने शोर मचाया गया था कि देशभर में चर्च पर हमले हो रहे हैं, ठीक उसी अंदाज में इस साल नोटबंदी का मामला रहा। बिना पुलिस से पुष्टि किए कुछ संदिग्ध किस्म के चश्मदीदों के बयान के आधार पर मरने वालों की संख्या का घोड़ा ऐसा दौड़ाया गया कि बहुतों को ये सच भी लगने लगा। चैनलों और अखबारों ने बैंक की लाइन में मौत की जितनी खबरें चलाईं उनमें से ज्यादातर फर्जी साबित हो चुकी हैं। यूपी की अखिलेश सरकार ने मुआवजा देने के लिए बड़ी मुश्किल से 14 लोग जुटाए। कहा गया कि ये वो लोग हैं, जिनके परिवार का कोई सदस्य बैंक की लाइन में मरा है। जबकि मुआवजा पाने वाले एक भी परिवार का नोटबंदी से कोई लेना-देना नहीं था। यहां तक कि अलीगढ़ की जिस रजिया नाम की महिला के परिवार को 5 लाख रुपये दिए गए उसके भी एटीएम या बैंक की लाइन में होने की कोई पुष्टि नहीं है।

2. जेएनयू में देशद्रोही नारेबाजी के वीडियो

जेएनयू में देशद्रोही नारेबाजी के वीडियो पर ज्यादातर चैनलों ने अपने-अपने नजरिए से झूठ फैलाने की कोशिश की। ज़ी न्यूज़ ने कहा कि नारे लगाने वाले पाकिस्तान जिंदाबाद बोल रहे थे, तो एनडीटीवी और आजतक चैनलों ने उन टेप को फर्जी साबित करना शुरू कर दिया, जिनमें कन्हैया कुमार देशद्रोही नारे लगाने वालों को कैमरों से बचाते देखा जा सकता था। इन वीडियो की फौरेंसिक जांच कराई गई तो 7 में से 2 क्लिप फर्जी निकलीं। लेकिन मीडिया ने इसे जेएनयू के नारेबाजों की जीत बता दिया। जबकि सच्चाई यह थी कि 5 वीडियो क्लिप सही थीं और उनसे भारत विरोधी नारेबाजी की बात साबित हो रही थी। इस मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अफवाहें उड़ाने में सबसे ज्यादा मदद की।

3. जाट आंदोलन के दौरान मुरथल में रेप हुए

पिछले साल फरवरी में हरियाणा में हिंसक जाट आंदोलन के दौरान मीडिया ने ये मनगढ़ंत खबर उड़ा दी कि दिल्ली-अंबाला नेशनल हाइवे पर 22 फरवरी की रात कुछ महिलाओं से गैंगरेप हुए। ये खबर पूरी तरह फर्जी साबित हुई। फर्स्टपोस्ट.कॉम नाम की न्यूज वेबसाइट के पत्रकार तारिक अनवर ने सरकार और देश को बदनाम करने की नीयत से ये खबर प्लांट की थी। इस मामले में कई और अखबारों चैनलों ने फर्जी चश्मदीद खड़े करने की कोशिश की, लेकिन सबकी पोल एक के बाद एक खुलती गई।

4. बीजेपी विधायक ने घोड़े का पैर तोड़ डाला

मार्च में पूरे देश की मीडिया उत्तराखंड के बीजेपी विधायक गणेश जोशी पर टूट पड़ी। दावा किया गया कि गणेश जोशी ने लाठी मारकर पुलिस के घोड़े की टांग तोड़ दी। एक खास एंगल से कुछ तस्वीरें दिखाई गईं, जिनसे ऐसा लग रहा था कि विधायक घोड़े पर डंडा मार रहे हैं। लेकिन जल्द ही पूरी घटना का वीडियो सामने आ गया, जिससे पूरी सच्चाई खुल गई। विधायक के पहुंचने से पहले ही घोड़े का पैर सड़क किनारे के एक गड्ढे में फंस गया था, जिसके कारण उसका पैर टूट गया। इसके बावजूद मीडिया ने अपना प्रोपोगेंडा जारी रखा। बिना ये सोचे-समझे कि किसी घोड़े की टांग क्या एक डंडा मारने भर से टूट सकती है।

5. फिल्मकार बरुन कश्यप को गोरक्षकों ने पीटा

चिड़ीमार जैसे दिखने वाले मुंबई के एक छुटभैये फिल्मकार बरुन कश्यप ने फेसबुक पर लिखा कि मैं चमड़े का बैग लेकर कहीं जा रहा था तभी एक ऑटोवाले ने मुझे रोककर कहा कि तुम्हारा बैग गाय के चमड़े से बना है और उसने मुझे पीटना शुरू कर दिया। फेसबुक पर बरुन कश्यप की ये पोस्ट वायरल हो गई। बहुत सारे सेकुलर लोगों ने इसके लिए मोदी सरकार को दोषी ठहराते हुए कोसना शुरू कर दिया। जिस जगह पर यह घटना बताई गई वहां पर पास के ही एक मॉल का सीसीटीवी कैमरा फोकस था। जब पुलिस ने उसकी जांच की तो पता चला कि वहां ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था। बरुन कश्यप ने बाद में पुलिस के आगे माना कि उसने झूठ बोला था। उसने यहां तक कहा कि मैं हिंदुओं से नफरत करता हूं और दंगे फैलने का मकसद से मैंने ये बात फैलाई। बाद में यह जानकारी भी सामने आई कि बरुन कश्यप के पीछ मुंबई आम आदमी पार्टी की नेता प्रीति मेनन का दिमाग था।

6. पर्रीकर ने कहा हमारी टीमें स्नैपडील के बायकॉट में शामिल थीं

पर्रीकर ने मराठी में दिए एक भाषण में कहा कि आमिर खान के विज्ञापन के लिए टीमों की टीमें स्नैपडील का बायकॉट करने लगी थीं। पर्रीकर ने ये बात उस अभियान की आलोचना के मकसद से कही थी। लेकिन एनडीटीवी ने पर्रीकर के बयान में अपनी मर्जी से ‘हमारी टीमें’ शब्द जोड़ दिया और शोर मचाना शुरू कर दिया कि स्नैपडील का बायकॉट कराने के पीछे बीजेपी थी। मराठी समझने वाले कहते रहे कि पर्रीकर ने ऐसा कुछ नहीं कहा है, लेकिन एनडीटीवी मानने को तैयार नहीं हुआ। आज भी चैनल के कुछ एंकर अक्सर उस घटना को तथ्य की तरह पेश करने की कोशिश करते रहते हैं।

7. राजस्थान के चितौड़गढ़ में दलित लड़कों की पिटाई

कई अखबारों और चैनलों ने खबर दी कि बाइक चोरी के शक में 3 दलित लड़कों को बुरी तरह मारा पीटा गया। टाइम्स ऑफ इंडिया और कुछ अखबारों ने यह दावा भी कर दिया कि पीटने वाले ऊपरी जाति के लोग थे। एनडीटीवी ही नहीं, ज़ी न्यूज़ जैसे चैनलों ने भी बिना तथ्य की पड़ताल किए इसे दलितों पर अगड़ी जाति के लोगों के अत्याचार का मामला बता दिया। लेकिन जल्द ही सच्चाई सामने आ गई कि पीटने वाले लोग भी एससी और ओबीसी जातियों के थे। ये लोग व्यापारी थे और इलाके में चोरियों से परेशान थे। अपराध की इस सामान्य घटना को भी देश की जिम्मेदार मीडिया ने दलित अत्याचार का मामला बना दिया। आम आदमी पार्टी के ब्लॉग ‘जनता का रिपोर्टर’ ने भी इस झूठ को जमकर फैलाया।

8. 2000 के नोट में जीपीएस चिप लगा हआ है

सोशल मीडिया पर फैली इस फर्जी खबर को दैनिक भास्कर और ज़ी न्यूज ने बिना सोचे-समझे उठा लिया। बाद में आजतक ने भी बता डाला कि नए नोट में चिप लगा है, जिससे उसे बहुत आराम से पकड़ा जा सकेगा। मीडिया के इस दावे की बहुत जल्द पोल खुल गई। अब इसे लेकर तरह-तरह के चुटकुले चल रहे हैं।

9. आरएसएस के प्रोग्राम में लियोनार्डो डि कैपरियो हिस्सा लेंगे

यह खबर देश की सबसे गालीबाज पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी के दिमाग की उपज थी। उन्होंने ये मनगढ़ंत खबर लिखी कि लंदन में आरएसएस का एक प्रोग्राम होने वाला है, जिसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत हिस्सा लेंगे। मोहन भागवत के साथ मंच पर हॉलीवुड के मशहूर एक्टर लियोनार्डो डि कैपरियो भी मौजूद होंगे। स्वाति चतुर्वेदी यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने यहां तक बता डाला कि लंदन में होने वाला ये कार्यक्रम बीफ पर पाबंदी के मकसद से हो रहा है। वैसे स्वाति चतुर्वेदी ऐसी बेसिर-पैर की खबरें लिखने के लिए बदनाम रही हैं। बताते हैं कि उन्हें आज भी 10 जनपथ से हर महीने सैलरी मिलती है।

10. सड़क निर्माण का काम टारगेट से पिछड़ गया

मीडिया ने खबर फैलाई कि मोदी सरकार और नितिन गडकरी चाहे जो दावे करें, लेकिन देश में सड़कें बनाने का काम लक्ष्य से पीछे छूट गया है। इसके लिए जिन अधकचरे और पुराने आंकड़ों का हवाला दिया गया वो पहली नजर में ही फर्जी मालूम हो रहे थे। इस खबर को सबसे पहले छापने वाली क्विंट वेबसाइट ने दावा किया कि ये सारी जानकारी उन्होंने NHAI की वेबसाइट से ली है। मोदी सरकार से नफरत में ऐसी खबरें आए दिन छपवाई जाती हैं, जिनमें अधकचरे और बेवकूफी भरे आंकड़े इस्तेमाल किए जाते हैं।

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