प्रणब मुखर्जी से इतनी नाराज क्यों हैं सोनिया गांधी?

राष्ट्रपति भवन की तरफ से जारी तमाम तस्वीरों में सोनिया गांधी ऐसी ही भाव-भंगिमा में दिख रही हैं।

क्या राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के रिश्तों में किसी तरह की कड़वाहट है? दिल्ली में सत्ता के गलियारों में ये अटकलें आजकल जोरों हैं। दरअसल सोनिया गांधी शुक्रवार को दिन में राष्ट्रपति भवन में एक ज्ञापन लेकर गई थीं। उनके साथ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और दूसरे तमाम सीनियर नेता भी थे। ये ज्ञापन संसद की कार्यवाही में ठप रहने और कामकाज करवा पाने में सरकार की कथित नाकामी के सिलसिले में था। मौके पर मौजूद फोटोग्राफरों और दूसरे लोगों ने ये नोटिस किया कि प्रणब और सोनिया के बीच औपचारिक अभिवादन से ज्यादा कुछ भी नहीं हुआ। सोनिया पूरी मीटिंग के दौरान गंभीर बनी रहीं। यह बात तस्वीरों में भी झलकी है, क्योंकि ज्यादातर में सोनिया गांधी एक तरह की अकड़ में दिखाई दे रही हैं।

प्रणब मुखर्जी से नाराज हैं कांग्रेस अध्यक्ष!

कांग्रेस पार्टी के कई नेता मीडिया से निजी बातचीत में इस बात का जिक्र करते रहे हैं कि सोनिया गांधी इस बात से ‘दुखी’ हैं कि राष्ट्रपति होते हुए प्रणब मुखर्जी, नरेंद्र मोदी सरकार के साथ बहुत तालमेल बिठाकर काम कर रहे हैं। बीते ढाई साल में कई ऐसे मौके भी आए जब प्रणब केंद्र सरकार के लिए शर्मिंदगी वाली स्थिति पैदा कर सकते थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे कोई मुश्किल पैदा होती हो। कुछ राज्यों में राष्ट्रपति शासन हो या जमीन अधिग्रहण अध्यादेश पर बार-बार दस्तखत करने जैसे मुद्दों पर जब सरकार घिरी हुई थी, तब भी प्रणब ने कभी नाराजगी का कोई संकेत नहीं दिया। जानकारों के मुताबिक शायद सोनिया गांधी को लगता है कि प्रणब मुखर्जी को उन्होंने राष्ट्रपति बनवाया था। लेकिन वो ऐसी राजनीतिक परिस्थितों में भी सरकार का साथ देते हैं, जब वो बड़ी आसानी से कांग्रेस को फायदा पहुंचा सकते थे।

मोदी को सलाह देते हैं राष्ट्रपति प्रणब

यह बात कई बार सामने आ चुकी है कि अहम मुद्दों पर मोदी राष्ट्रपति प्रणब से सलाह-मशविरा करते हैं। खास तौर पर आर्थिक मोर्चों और पाकिस्तान से के सवाल पर वो राष्ट्रपति के लगातार संपर्क में रहे हैं। यह बात कांग्रेस हाईकमान को अच्छी तरह पता है। सोनिया गांधी की नाराजगी की एक वजह इसे भी माना जा सकता है।

सोनिया भले ही राष्ट्रपति के आगे अकड़ में नज़र आती हैं। प्रधानमंत्री होते हुए भी मोदी प्रणब मुखर्जी के आगे नतमस्तक नजर आते हैं। विरोधी दल की पृष्ठभूमि होने के बावजूद वो प्रणब मुखर्जी से सलाह-मशविरा करते हैं। फोटो सौजन्य- पीटीआई

नोटबंदी के सवाल पर भी प्रणब मुखर्जी सरकार के सलाहकार की भूमिका में हैं। 2012 में वित्त मंत्री रहते हुए प्रणब मुखर्जी ने काले धन पर संसद में एक श्वेत पत्र रखा था। इसमें उन्होंने कई ऐसे मुद्दे और आंकड़े रखे थे, जिनको नोटबंदी के लिए मोदी सरकार ने आधार की तरह इस्तेमाल किया है। नोटबंदी की शिकायत करने ममता बनर्जी की अगुवाई में जब विपक्षी नेता राष्ट्रपति के पास गए थे तो उन्होंने बस उनकी बात सुन ली थी, लेकिन इस फैसले को लेकर कभी कोई राय नहीं जताई ताकि विवाद की कोई गुंजाइश न रहे।

प्रणब और सोनिया में खटास पुरानी है!

कांग्रेस के सबसे सीनियर और योग्य नेता होने के बावजूद 2004 में सोनिया गांधी ने प्रणब मुखर्जी का नाम हटाकर मनमोहन सिंह को पीएम बनाने का एलान कर दिया था। इसके बावजूद प्रणब ने करीब 9 साल तक पूरी मेहनत से यूपीए सरकार की सबसे अहम जिम्मेदारियों को अपने कंधे पर उठाया। इस दौरान उनकी छवि सरकार के संकट मोचक की थी। बाद में बनी परिस्थितियों में सोनिया गांधी को प्रणब को राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर आगे करना पड़ा। हालांकि बताते हैं कि राजीव गांधी और प्रणब के संबंध ठीक नहीं थे। यही कारण है कि वो कांग्रेस पार्टी के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य होने के बावजूद कभी सोनिया गांधी की पहली पसंद नहीं रहे। अब जब राष्ट्रपति बनने के बाद प्रणब मुखर्जी मनमोहन सिंह के उलट खुद को एहसानों के बोझ तले दबा नहीं दिखाते तो सोनिया गांधी की नाराजगी तो बनती ही है।

 

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