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बैंकों ही नहीं, एक ‘स्टिंग’ डॉक्टरों का भी हुआ है!

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क्या आप सोच सकते हैं कि नोटबंदी के दौरान मुफ्त इलाज करके लोगों की मदद करने वाले कई डॉक्टर दरअसल दिखावा कर रहे थे? सभी तो नहीं, लेकिन ज्यादातर मामलों में यह बात सच पाई गई है। डॉक्टर की पर्ची पर प्राइवेट केमिस्ट से दवा खरीदने पर भी 500 रुपये के नोट चलाए जा सकते हैं। पहले ये छूट 1000 के नोट पर भी थी। इस छूट ने कई डॉक्टरों को बेइमानी का मौका दे दिया। इन डॉक्टरों ने फौरन ऐलान कर दिया कि वो लोगों का इलाज बिना कोई फीस लिए करेंगे। दरअसल इस चैरिटी के पीछे अपने काले पैसे को सफेद करने का बड़ा खेल था। न्यूज़लूज़ को सूत्रों से पता चला है कि शुरुआती दिनों में ही सरकार को इस धांधली की खबर मिल गई थी, जिसके बाद ऐसे कई ‘दयालु डॉक्टरों’ की बाकायदा पड़ताल करवाई गई और ज्यादातर में शक सही निकला। देश भर में ऐसे डॉक्टर्स की लिस्ट तैयार की गई है।

काली कमाई सफेद कर रहे हैं डॉक्टर

एक सरकारी सूत्र ने न्यूज़लूज़ को बताया कि 8 नवंबर के 2-3 दिन बाद ही कुछ डॉक्टरों के इस जुगाड़ की जानकारी मिल गई थी। जिसके बाद मीडिया रिपोर्ट्स और खुफिया तंत्र से मिली जानकारी के आधार पर ऐसे दयालु डॉक्टरों की लिस्ट तैयार की गई। इन सभी के यहां डमी मरीज भेजे गए। यह पता चला है कि ऐसे ज्यादातर डॉक्टरों ने मोटे तौर पर धांधली के दो तरीके अपनाए:

  1.  मुफ्त इलाज की बात सुनते ही इन डॉक्टरों के यहां मरीजों की भीड़ बढ़ गई। डॉक्टर मरीजों को महंगी दवाएं लिख रहे थे, जिन्हें उनके अपने नर्सिंग होम या अस्पताल के केमिस्ट से खरीदना होता था। यहां पर काफी मात्रा में 100 और 50 के छोटे नोट भी जमा हो रहे थे, जिन्हें डॉक्टर अपने बड़े नोट से बदल लेते। इसके अलावा बड़ी संख्या में फर्जी मरीजों की पर्चियां भी तैयार कराई गईं। जिनके नाम पर डॉक्टरों ने भारी मात्रा में अपनी काली कमाई को सफेद बनाया।
  2.  जिन डॉक्टरों के पास अपना नर्सिंग होम नहीं था, उन्होंने इस खेल के लिए आसपास के किसी केमिस्ट शॉप को अपना मददगार बनाया। खुद डॉक्टर या उनके असिस्टेंट मरीज को बता देते थे कि ये दवाएं उसी केमिस्ट पर ही मिलेंगी। मरीज जब 500 या 1000 की नोट देता तो दवा की दुकान वाला छुट्टे न होने की बात कहकर खुले पैसे देने को बोलता। इस तरह से केमिस्ट के पास शाम तक काफी मात्रा में छोटी नोट जमा हो जातीं और डॉक्टर इनको अपनी 500 और 1000 की नोट से बदल लेते। केमिस्ट का फायदा ये कि उसे ज्यादा मार्जिन वाली दवाएं बेचने का मौका मिल गया। दवा कंपनियों और दुकानदारों ने अपनी बिक्री बढ़ने के बदले में ऐसे डॉक्टरों को खूब तोहफे भी दिए हैं। इस तरीके में भी डॉक्टर के फर्जी परचों पर दवाइयों की बिक्री दिखाई गई है।

बेइमान डॉक्टरों के नाम खोलने पर विचार

जालसाजी करने वाले ऐसे कई बड़े डॉक्टरों की पूरी डिटेल सरकार के पास पहुंच चुकी है। इस लिस्ट की जांच का काम एक टास्क फोर्स को सौंपा गया है, जिसके बाद तय किया जाएगा कि क्या इन जालसाज डॉक्टरों के नाम सार्वजनिक कर दिए जाएं। ताकि समाज इनका असली चेहरा देख सके। इनकम टैक्स विभाग का फोकस अभी ज्यादातर बड़ी मछलियों पर है, इसलिए ऐसे डॉक्टरों पर फौरन किसी कार्रवाई की उम्मीद नहीं है। हालांकि यह तय है कि आगे चलकर इन सभी को भी हिसाब देना पड़ेगा। खास तौर पर सालाना रिटर्न फाइल करते वक्त उन्हें अपनी करनी का नतीजा भुगतना पड़ सकता है। दरअसल नोटबंदी का शिकार होने वालों में एक बड़ा तबका डॉक्टरों का भी है। बिना पक्की पर्ची के मरीज देखने वाले कई डॉक्टर कोई टैक्स नहीं चुकाते और भारी मात्रा में ब्लैकमनी अपने पास रखते हैं।

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