मोदी को ले डूबेंगे अरुण जेटली और सुरेश प्रभु!

आशीष कुमार

सीनियर बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी अरुण जेटली को इशारों-इशारों में शकुनी कहते हैं। उनकी ऐसी भाषा के कारण अक्सर लोग उन पर अनुशासनहीनता के आरोप भी लगाते हैं। लेकिन नोटबंदी के बाद से अरुण जेटली और उनके नौकरशाहों ने जिस तरह का मैनेजमेंट दिखाया है उससे स्वामी की बात कहीं न कहीं सही साबित होती दिख रही है। जेटली कांग्रेस के साथ दोस्ताना के कारण अक्सर शक की नजरों से देखे जाते हैं। नोटबंदी के बाद भी संसद में विपक्ष अरुण जेटली पर तो बिल्कुल नरम है और सारा अटैक प्रधानमंत्री पर हो रहा है। कुछ यही स्थिति रेल मंत्रालय में है, जहां सुरेश प्रभु के अव्यावहारिक फैसलों के चलते लोगों में गुस्सा है। ये गुस्सा भी रेलमंत्री पर न होकर, मोदी के लिए है।

अरुण जेटली ने बढ़ाई मुसीबत

नोटबंदी के मोर्चे पर फेल: नोटबंदी के बाद जब लोगों तक नए नोट पहुंचाने की जल्दी थी तब जेटली लगभग सोए रहे। उनके अफसर बार-बार बयान देते रहे कि कैश की कोई कमी नहीं है। बैंकों, पेट्रोल पंप से लेकर रोडवेज, रेलवे और दूसरे सरकारी दफ्तरों में पुराने नोट बदलकर काली कमाई को सफेद बनाने का खेल चल रहा था। शुरुआती दिनों में वित्त मंत्रालय और इसके तहत आने वाले एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ईडी) और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। पहले-दूसरे हफ्ते के बाद जब मीडिया में धांधली की खबरें छपने लगीं, तब जाकर मंत्रालय हरकत में आया। लेकिन तब तक काफी काम बिगड़ चुका था।


अफवाहें रोकने में नाकाम रहे:
नोटबंदी के खिलाफ सोशल मीडिया ही नहीं, चैनल और अखबार भी जमकर झूठी खबरें फैला रहे हैं। लेकिन वित्त मंत्रालय इनके आगे अब तक लाचार ही रहा है। आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास को मीडिया के आगे जानकारियां रखने की जिम्मेदारी दी गई, लेकिन वो मीडिया के आगे बेबस दिखते रहे। इतने अहम फैसले पर कोई ऐसा चेहरा होना चाहिए था जिसकी बातों पर लोग भरोसा कर सकें।

परेशान लोगों की मदद में देरी: ये वित्त मंत्रालय की ही नाकामी मानी जाएगी कि जब कैशलेस लेनदेन में छूट का ऑफर करने में सरकार को एक महीने की देरी हो गई। अच्छा होता कि सरकार नोटबंदी से 2-3 महीने पहले ही पेट्रोल-डीजल और दूसरे सामान की खरीद पर छूट का ऑफर कर देती तो अब तक लोग कार्ड या वॉलेट से पेमेंट करने के आदी हो चुके होते और इतनी माथापच्ची न करनी पड़ती।


राज्यसभा में कांग्रेस से याराना:
बीजेपी के अंदर इस बात पर काफी नाराजगी है कि अरुण जेटली राज्यसभा में आक्रामक भूमिका नहीं निभा रहे हैं। नोटबंदी पर अब तक जो बहसें हो पाई हैं, उनमें भी कांग्रेस से लेकर बाकी पार्टियों के नेता ज्यादातर वक्त जेटली की तारीफों के पुल ही बांधते रहे। सपा के नरेश अग्रवाल ने तो यहां तक कह डाला था कि अगर जेटली को फैसले की जानकारी पहले से होती तो वो हमारे कान में पहले ही बता देते। इसी बात को मायावती और कांग्रेस के नेता भी कह चुके हैं। राज्यसभा में विपक्ष जब सरकार पर झूठे आरोप लगा रहा था तब ज्यादातर वक्त जेटली बैठे-बैठे मुस्कुराते रहे।

एनडीटीवी से खास लगाव: नोटबंदी के बाद से जेटली ने मीडिया में सिर्फ एक इंटरव्यू दिया है वो भी एनडीटीवी को। अंग्रेजी में दिए गए इस इंटरव्यू का आम जनता से कोई लेना-देना नहीं था। इसके बजाय जेटली अगर दूरदर्शन या किसी हिंदी चैनल पर लोगों को नोटबंदी के फायदे समझाते तो सरकार को ज्यादा फायदा होता। लेकिन जेटली को सरकार या जनता के फायदे से ज्यादा एनडीटीवी का मेहमान बनने में होती है।

मोदी का सिरदर्द बन चुके हैं सुरेश प्रभु

सफाई कम, दिखावा ज्यादा: रेल मंत्रालय वो महकमा है जिसका जनता पर सीधा असर पड़ता है। सुरेश प्रभु को इस बात का शायद अब तक एहसास भी नहीं है। पहले उन्होंने सारा फोकस स्टेशनों और ट्रेनों की सफाई पर दिखाया। नतीजा ये निकला कि थोड़ा बहुत सुधार हो गया, लेकिन वो भी दिखावे का। स्टेशनों की मेन बिल्डिंग आपको चमचाती मिल जाएंगी, लेकिन बाकी स्टेशन का वही पुराना हाल है। कुछ हाइप्रोफाइल गाड़ियों में थोड़ी साफ-सफाई है, लेकिन बाकी सैकड़ों गाड़ियां भगवान भरोसे ही चल रही हैं। कुल मिलाकर सफाई से ज्यादा जोर सफाई के दिखावे पर है। रेल मंत्री ट्विटर पर स्टेशनों की सफाई की तस्वीरें तो रीट्वीट करते हैं, लेकिन कोई उन्हें गंदगी की तस्वीर ट्वीट करे तो आजकर कोई कार्रवाई भी नहीं करते।

किराये के नाम पर खुली लूट: सुरेश प्रभु के रेल मंत्री बनने के बाद से रेल किराये लगभग दोगुने हो चुके हैं। यहां तक कि खाली गाड़ियों में भी सर्ज-प्राइसिंग के नाम पर ज्यादा किराया वसूला जा रहा है। रिजर्वेशन न मिलने से परेशान लोगों की मजबूरी का फायदा उठाने के लिए कथित प्रीमियम ट्रेनें शुरू कीं, जिनमें रिजर्वेशन तो मिल जाएगा, लेकिन किराया इतना ज्यादा होगा कि आपको लगेगा कि इससे अच्छा फ्लाइट से ही चले जाएं। यहां तक कि टिकट कैंसिल करने के नियम ऐसे बना दिए गए हैं कि अब आप ट्रेन के अनाप-शनाप लेट होने पर भी रिफंड नहीं ले सकते। हालांकि सुरेश प्रभु टिकट के दलालों के नेटवर्क को तोड़ने में काफी हद तक कामयाब हुए हैं।

रेलवे की लेट-लतीफी जारी है: अफसरशाही के आंकड़ों के मुताबिक भारतीय ट्रेनें 82 से 85 फीसदी टाइम बिल्कुल सही वक्त पर चलती हैं। इस दावे की सच्चाई सब जानते हैं, लेकिन रेलमंत्री को शायद नहीं पता। सच्चाई यह है कि कई-कई घंटे देरी के बावजूद रेलवे के अफसर गाड़ियों के छूटने और पहुंचने का सही वक्त दर्ज नहीं करते। आंकड़ों में तो भारतीय रेल वक्त की बिल्कुल पाबंद बताई जाती है, लेकिन सच्चाई कुछ और है। रेलवे ने दावा किया था कि ट्रेन लेट होने पर लोगों को एसएमएस से बताया जाएगा, लेकिन ये सर्विस कहां पर है कोई नहीं जानता।

अफसरशाही के चंगुल में प्रभु: बताते हैं कि सुरेश प्रभु रेल मंत्रालय में बरसों से जमे अफसरों के आगे लाचार हो गए हैं। इन अफसरों की गुटबंदी ऐसी है कि ये किसी की नहीं सुनते। यहां तक प्रधानमंत्री के साथ होने वाली बैठकों में दिए जाने वाले सुझावों पर भी अड़ंगेबाजी में सबसे आगे रहते हैं। ऐसे कई अफसर रेलवे बोर्ड में भी हैं। ऐसा लगता है कि सुरेश प्रभु इनके आगे सरेंडर कर चुके हैं। रेलवे की हालत सुधारने पर वो ईमानदारी से कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन अफसरों का भ्रष्टाचार रोकने में बहुत ज्यादा सफल नहीं रहे हैं। यहां तक कि नोटबंदी के बाद भी रेलवे अफसरों ने अपनी काली कमाई को बुकिंग विंडो के जरिए सफेद करवाया, लेकिन रेल मंत्री को कानों-कान खबर नहीं लगी।

बुलेट ट्रेन के नाम पर पागलपन: बुलेट ट्रेन देश की जरूरत है, लेकिन इस अभियान के चक्कर में लगता है कि सुरेश प्रभु बाकी भारतीय रेल को भूल गए हैं। रेलवे के सिस्टम में सुधार के जो दावे अब तक उन्होंने किया है आम लोगों को उनकी छाप देखने को नहीं मिली। यही कारण है कि जब भी कोई हादसा होता है या रेलवे में कोई भी गड़बड़ी होती है लोग सबसे पहले बुलेट ट्रेन को कोसना शुरू कर देते हैं।

सबसे बुरी बात यह है कि शुरू में सुरेश प्रभु ने ये दिखावा किया कि वो सोशल मीडिया पर आने वाली रेल यात्रियों की शिकायतों पर फौरन कार्रवाई करते हैं। इस बात के लिए मीडिया के जरिए उन्होंने खूब वाहवाही भी लूटी। लेकिन अब हालत ये है कि दिखावे के लिए कुछ एक शिकायतों पर कार्रवाई हो जाए तो हो जाए, वरना बाकी सारी शिकायतें न तो कोई सुनने वाला है न देखने वाला।

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