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सिमी के जिहादियों को मारते नहीं तो क्या करते?

आशीष कुमार
भोपाल में जेल से भागे सिमी के 8 जिहादी आतंकवादियों की मौत पर मचे अखिल भारतीय मातम को देखकर हैरान हूं। रोना-धोना देखकर तो यही लग रहा है कि कुछ बुद्धिजीवी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के नेता इन 8 आतंकवादियों के ताबूत के साथ ही सती न हो जाएं। खैर देश के ज्यादातर लोगों की तरह मुझे भी इन नकली मानवाधिकारवादियों की परवाह नहीं है। क्योंकि इनमें से किसी ने भी उस पुलिसवाले के बारे में एक शब्द लिखना भी जरूरी नहीं समझा, जिसका गला काटकर ये शांतिदूत भागे थे। इस एनकाउंटर ने देश के अंदर पल रहे उस तबके को एक बार फिर से उजागर कर दिया है जो आतंकवादियों की मौत पर तो मातम मनाते हैं लेकिन शहीदों का मज़ाक उड़ाते हैं। खतरनाक बात ये है कि शहीदों का अपमान और आतंकवादियों का महिमामंडन करने वालों की इस फौज में ज्यादातर पत्रकार हैं। ये वो पत्रकार हैं जिनकी रोज शाम की शराब और महीने के आखिर में मिलने वाली सरकारी ‘थैली’ मोदी के आने के बाद से बंद है। यही वो पत्रकार हैं जो इन आतंकवादियों के लिए ‘कार्यकर्ता’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं।

मारते नहीं तो क्या करते?

अक्सर हम देखते हैं कि पुलिस तब पागल हो उठती है जब कोई अपराधी उनके किसी साथी की हत्या कर दे। अगर कोई कैदी या अपराधी पुलिस वाले की हत्या कर देता है तो पुलिस का बदला अपने आप में बेहद भयानक होता है। भोपाल में भी तो यही हुआ। आठ कैदी एक पुलिसवाले का गला काटकर भाग रहे थे। उन दरिंदों ने चाहा होता तो वो गला काटने के बजाय भोपाल के जेल गार्ड रमाकांत यादव के हाथ-पांव भी बांध सकते थे। लेकिन उन्होंने वही किया जो उनका मजहब उन्हें सिखाता है। इसके बाद पुलिस ने भी जो किया वो वही है जो वो हमेशा से करती आई है। इसमें कौन सी बड़ी बात है? इतना जरूर है कि अगर अगर वो कैदी सेकुलर शांतिप्रिय समुदाय के न होते और राज्य बीजेपी का नहीं होता तो किसी को पता भी नहीं चलता।

मुठभेड़ पर मीडिया का खेल!

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुताबिक 1997 से 2013 तक 2103 एनकाउंटर हुए। जिनमें सबसे ज्यादा यूपी में 952, असम में 256 और महाराष्ट्र में 126 लोग मारे गए। इस दौरान इन तीनों राज्यों में गैर-बीजेपी सरकारें थीं। जबकि गुजरात में सिर्फ 16 लोग एनकाउंटर में मारे गए। लेकिन आज इन 16 लोगों की हैसियत सीमा पर मरने वाले किसी शहीद से ज्यादा है। देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि गुजरात में किन लोगों का फेक एनकाउंटर हुआ था, लेकिन उन सैकड़ों-हजारों लोगों के नाम कोई नहीं जानता जो कांग्रेस या उसकी साथी पार्टियों की सरकारों वाले राज्यों में मारे गए। जाहिर सी बात है कि ये सारा मीडिया का खेल है। जो बीजेपी की सरकार वाले राज्य में हुए असली एनकाउंटर को नकली बना देती है और कांग्रेस के राज्यों में नकली एनकाउंटर को भी असली बना देती है।

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