जब नेहरू ने जवानों को चीन के आगे मरने छोड़ा था!

बायीं तस्वीर में नेहरू और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन हैं। दायीं तस्वीरें उन कुछ जवानों की हैं, जिन्होंने चीन युद्ध में बहादुरी से लड़ते हुए शहादत दी थी।

भारत और चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध की 20 अक्टूबर को 54वीं बरसी थी। ये वो दिन है जो भारत के इतिहास में एक कड़वी याद के तौर पर दर्ज है। 20 अक्टूबर को ही चीन की सेना ने लद्दाख में घुसपैठ करते हुए युद्ध का एलान कर दिया था। करीब एक महीने तक चले इस युद्ध में भारत को बेहद अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा। ये हार तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके रक्षा मंत्री वीके कृष्णा मेनन के कूटनीतिक दिवालियापन की बड़ी मिसाल मानी जाती है।

भारतीय सेना को मरने को छोड़ दिया!

20 अक्टूबर 1962 से कुछ दिन पहले जब चीनी सेनाएं लद्दाख में घुसपैठ कर रही थीं तो नेहरू श्रीलंका की यात्रा पर चले गए थे। जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि सेना चीन की सेनाओं को खदेड़ देगी। 10 साल से भी ज्यादा समय से देश के प्रधानमंत्री रह चुके नेहरू को अहसास ही नहीं था कि सेना इस युद्ध के लिए तैयार नहीं है। उस वक्त के जरनल केएम करियप्पा ने बार-बार कहा था कि हमारी सरहद तक रसद और रक्षा उपकरण भेजने के लिए सड़कें नहीं हैं। इन अपीलों पर नेहरू और उनके रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन उनका मज़ाक उड़ाया करते थे। तब के अखबारों ने यहां तक खबर छापी थी कि हथियार फैक्ट्रियों में बंदूकें नहीं, बल्कि कॉफी मशीनें बनाई जा रही थीं। युद्ध की कमान जनरल बीएम कौल को सौंपी गई थी, जिन्हें इन हालात में युद्ध का कोई अनुभव ही नहीं था। तैयारी की स्थिति यह थी कि जवानों की गोलियां तक खत्म हो गई थीं। कई मोर्चों पर गोरखा रेजीमेंट को गोली खत्म होने के बाद खुखरी से लड़ाई लड़नी पड़ी थी।

चीन युद्ध पर जनरल वीके सिंह की टिप्पणी

विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह ने चीन युद्ध में नेहरू और मेनन की जोड़ी की मूर्खता भरी हरकतों पर एक फेसबुक पोस्ट लिखा है:

“भारत और चीन के बीच 1962 का युद्ध सही मायनों में ‘हिमालयन ब्लंडर’ था। नेहरू-मेनन युगल का कूटनीतिक दिवालियापन इस युद्ध की वजह बना। यह विफलता एक उत्कृष्ट उदाहरण बन चुकी है कि सत्ता में होने पर क्या नहीं करना चाहिए। यह युद्ध इसका भी साक्षी है कि आजादी के बाद से कांग्रेस की सरकारों ने भारतीय सेना से किस प्रकार व्यवहार किया है। हमारे सैनिकों के पास साहस तो था परंतु हथियार और उपकरण घटिया थे। उन्हें किन्हीं प्यादों की तरह चीन के साथ लड़ाई में झोंक दिया गया, जबकि राजनीतिक नेतृत्व परमपावन बना रहा। चीन के साथ भारत के रिश्तों की हिलती हुई नींव के लिए नेहरू और मेनन धन्यवाद देना न भूलें। मैं भारतीय सेना के उन सैनिकों को सलाम करता हूँ जिनका अदम्य साहस ही इस युद्ध में भारत की वास्तविक गरिमा के अनुरूप था।”

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