‘बंगालिस्तान’ के कालीग्राम की वो काली रात!

bhaswar-goswami

भास्वर गोस्वामी

बंगाल में दुर्गा पूजा के वक्त शुरू हुई हिंसा को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। राज्य सरकार ने दंगों की मीडिया कवरेज पर एक तरह से पाबंदी लगा रखी है। ऐसे में जो खबरें आ रही हैं वो या तो अफवाह की शक्ल में हैं या उनके सही-गलत होने को लेकर शक है। वेब मैगजीन indiafacts.org ने एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता भास्वर गोस्वामी के हवाले से एक रिपोर्ट पब्लिश की है, जिससे हिंसा की तस्वीर साफ होने में काफी हद तक मदद मिलती है। मालदा जिले का कालीग्राम सारी हिंसा का केंद्र था। घटना के वक्त भास्वर गांव में ही मौजूद थे। मीडिया में आई ज्यादातर तस्वीरें भी उन्हीं ने शेयर की हैं। अंग्रेजी में पोस्ट हुए इस लेख का हिंदी अनुवाद हम लेकर आए हैं, ताकि हर कोई यह जान सके कि बंगाल में क्या हो रहा है।

जिहादी की आग में जल गया एक हिंदू गांव

बंगाल में दुर्गा पूजा हिंदुओं का सबसे बड़ा त्यौहार है। ये वो समय होता है जब पूरा बंगाल जश्न में डूबा होता है, लेकिन कालीग्राम के लोगों के लिए यह बात सही नहीं है। मालदा से 75 किलोमीटर दूरी पर इस गांव में दुर्गापूजा का जश्न नहीं होता। सांस्कृतिक तौर पर बेहद समृद्ध गांव माना जाता है, लेकिन करीब तीन दशक से यहां दुर्गा पूजा पर तनाव की स्थिति रहती है। लगभग हर साल दुर्गा पूजा के आसपास ही मुहर्रम पड़ता है और इसके नाम पर दुर्गा पूजा पर बंदिशें और रोकटोक लागू कर दी जाती हैं। हिंदू आबादी वाले इस गांव से जब भी ताजिया गुजरता है, साल भर शांत रहने वाला ये इलाका हिंसा की भेंट चढ़ जाता है। पिछले साल भी यही हुआ था और इस साल भी वही हुआ है।

इस साल भी दुर्गा पूजा की शुरुआत से पहले ही गांव के हिंदू परिवार डरे हुए थे कि मुहर्रम के दिन कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर होगी। क्योंकि दोनों एक साथ ही पड़ रहे थे। जिला प्रशासन ने इसे देखते हुए तमाम बंदिशें लागू कर दी थीं। जैसे कि- ‘मुहर्रम के दौरान हिंदू संगीत नहीं बजा सकते।’, ‘दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन मुहूर्त देखकर नहीं, बल्कि जिला प्रशासन के दिए हुए समय के अंदर करना होगा।’ वगैरह-वगैरह। वैसे तो प्रशासन के ये आदेश पूरी तरह से भेदभाव वाले थे लेकिन गांव वालों ने इन्हें चुपचाप स्वीकार कर लिया था। लेकिन 14 अक्टूबर की शाम को ताजिया गुजरने के दौरान गांव में जो कुछ हुआ वो कल्पना से परे था। मुस्लिम भीड़ ने गांव में लगे दुर्गा पंडाल पर हमला बोल दिया। वहां बने मंदिर और हिंदुओं के घरों को भी भारी नुकसान पहुंचाया गया

यह हिंसा भी अचानक नहीं हुई थी। एक दिन पहले 13 अक्टूबर को रात 9 बजे के करीब जब प्रशासन के आदेश के मुताबिक गांववाले दुर्गा मां की प्रतिमा को विसर्जन के लिए लेकर जा रहे थे, उसी वक्त पास के मुस्लिम गांव में ‘बसी करबला’ नाम का जुलूस निकाला जा रहा था। यह जुलूस बेहद खून-खराबे वाला होता है। बसी करबला सिर्फ बंगाल के मुसलमान मुहर्रम के दौरान करते हैं। रात 10 बजे के करीब जब प्रतिमा को तय कार्यक्रम के तहत विसर्जन के लिए ले जाया जा रहा था, तभी पता चला कि पुलिस ने बसी करबला के जुलूस को इसी तरफ घुमा दिया है। इस जुलूस में हजारों लोग तलवारें और लाठियां और दूसरे नुकीले हथियार लेकर भांजते हुए चलते हैं। 24 साल पहले कोर्ट ने यह कहते हुए इस जुलूस के किसी गांव से गुजरने पर पाबंदी लगा दी थी। क्योंकि इससे हिंदू गांवों में दहशत का माहौल बन जाता था। पुलिस का फैसला सीधे-सीधे कोर्ट के आदेश का उल्लंघन था।

इसके बाद जब गांव के लोगों ने पुलिस के आगे विरोध जताया तो बदले में उन्हें पुलिस की लाठियां झेलनी पड़ीं। पुलिस ने यहां तक कि महिलाओं को भी नहीं छोड़ा। लोग गांव लौट आए, लेकिन तय किया गया कि बसी करबला के जुलूस को अपने गांव से नहीं गुजरने देंगे। इसके लिए आधी रात में ही लोगों ने गांव की सड़क को मां दुर्गा की प्रतिमा से ब्लॉक कर दिया। यह तय हुआ कि तब तक दुर्गा विसर्जन नहीं होगा, जब तक प्रशासन कोई साफ आश्वासन न दे।

मुस्लिम दंगाइयों ने घरों को लूटने के बाद उनमें आग लगा दी। कई लोगों पर तलवारों और गंडासों से हमला भी किया।

 दंगाइयों ने घरों को लूटने के बाद उनमें आग लगा दी। कई लोगों पर तलवारों से हमला भी किया।

इसके बाद जब जुलूस वहां पहुंचा तो उसमें चल रहे लोगों ने फैसला किया कि वो गांव की तरफ से न जाकर एक दूसरी बाहरी सड़क से चले जाएंगे। इसी रात 4 बजे के करीब मालदा पुलिस प्रशासन की एक बड़ी टीम कालीग्राम पहुंची। उनके साथ बड़ी तादाद में हथियारबंद पुलिसवाले भी थे। उन्होंने गांववालों से कहा कि अब प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाइए। इस पर गांव वाले तैयार भी हो गए। तड़के 5 बजे के आसपास जब प्रतिमा विसर्जन का काम चल ही रहा था, तभी पुलिस ने आकर गांव के 8 लोगों (रतन दास, सिद्धार्थ नंदी, सुमन गुहा, मनीष सरकार, गोपेश सरकार, अजीत प्रमाणिक, रामकृष्ण दास और हिमाद्री दास) को अपने साथ थाने चलने को कहा। थाने पहुंचने के बाद इन आठों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। जबकि इन लोगों ने कोई अपराध नहीं किया था।

सुबह 7 बजे के करीब तक गिरफ्तारी की खबर पूरे गांव में फैल गई थी। गांव के लोगों ने तय किया कि वो इस गिरफ्तारी के विरोध में चंचल थाने का घेराव करेंगे। शाम तक यह घेराव चला और 5 बजे के करीब पुलिस को माफी मांगते हुए इन आठों लोगों को छोड़ना पड़ा। सभी लोग गांव में वापस लौट आए। लेकिन उस रात को जो हुआ वो कल्पना से परे था। रात 10 बजे के करीब मुसलमानों की एक बड़ी भीड़ ने गांव पर धावा बोल दिया। इनकी तादाद 10 हजार से भी ज्यादा बताई जा रही है। इन लोगों के पास देसी बम, पिस्तौलें, पाइप गन, तलवारें और लाठियां थे। गांव में घुसकर इन लोगों ने लूटमार करना और घरों को जलाना शुरू कर दिया। गांव के बाहर तैनात रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की टीम पर भी हमला हुआ। दो पुलिसवाले गंभीर रूप से घायल हुए। RAF के जवानों ने जान बचाकर भागना बेहतर समझा। इस दौरान गांव के लोग मालदा जिला प्रशासन के बड़े अफसरों को फोन करते रहे, लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं मिला। उस रात मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ ने गांव पर कहर बरपाया। घर, मंदिर, दुकानें सब कुछ लूट ले गए और कई जगहों पर आग भी लगा दी।

इसके बाद अगली शाम 5 बजे के करीब डीएम, एसपी और दूसरे अफसर भारी पुलिस बल के साथ कालीग्राम गांव पहुंचे। उस समय तक जो होना था हो चुका था। करीब 50 घरों को लूटकर आग लगा दी गई थी। 2 कारें और एक कार भी जलाई गई थी। गांव की एक ज्वैलरी शॉप और दो जनरल स्टोर लुट चुके थे। दर्जनों गायों और दूसरे जानवरों को दंगाई अपने साथ हांक ले गए थे। न जाने कितनी महिलाओं के साथ छेड़खानी और बदसलूकी हुई। दरिंदों ने बच्चों तक तीन मंदिर पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए थे। सैकड़ों लोग पूरी तरह सड़क पर थे और उनके पास रहने की छत तक बाकी नहीं बची थी। लगभग पूरे गांव ने अपनी जिंदगी भर की जमापूंजी गंवा दी थी।

अब गांव में धारा 144 लगा दी गई और केंद्रीय बलों की तैनाती कर दी गई। इससे गांव के लोगों को थोड़ी राहत मिली। पिछले पांच दिनों में एक खूबसूरत गांव किसी उजाड़ जगह में बदल चुका है। सैकड़ों लोगों के पास रहने को घर नहीं है और नया घर बनाने को एक फूटी कौड़ी भी नहीं बची है। जिन परिवारों में छोटे बच्चे वो उन्हें अपने रिश्तेदारों के घर भेज चुके हैं। सरकार की तरफ से अब तक किसी भी मुआवजे या मदद का भरोसा तक नहीं दिया गया है। हिंदू वोट बैंक नहीं हैं, इसलिए बंगाल सरकार शायद ऐसा करना जरूरी भी नहीं समझती।

फिलहाल गांव के लोग खुद पर हुए इस भयानक अत्याचार के खिलाफ पुलिस में एफआईआर लिखवाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं, ताकि कम से कम उन पर हुए जुल्म के बारे में बाकी देश को पता चल सके। लोकल मीडिया इस घटना को दबा रही है क्योंकि सांप्रदायिक सौहार्द्र खराब हो जाएगा और प्रशासन तमाशबीन बना हुआ है।

नीचे लिंक पर क्लिक करके आप हिंसा के बाद का वीडियो देख सकते हैं।

एक अपील: न्यूज़लूज़ के जरिए हम राष्ट्रवादी पत्रकारिता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इस वेबसाइट पर होने वाला खर्च बहुत ज्यादा है और हमारी आमदनी काफी कम। हम अपने काम को जारी रख सकें इसके लिए हमें आर्थिक मदद की जरूरत है। ये हमारे लिए ऑक्सीजन का काम करेगी। डोनेट करने के लिए क्लिक करें:

comments

Tags: , , , , , , ,