Loose Top

पाकिस्तानी एक्टरों पर बैन से इसलिए है इतना दर्द!

पाकिस्तानी कलाकारों को बॉलीवुड में बैन कर देने से ऐसी क्या आफत आ जाएगी? आखिर क्या कारण है कि फिल्मी दुनिया की कुछ बड़ी हस्तियां इस मामले पर बेवजह विवाद पैदा करने में जुटी हैं? ये वो सवाल हैं जो सोशल मीडिया पर इन दिनों कई लोग पूछ रहे हैं। हमने इसका जवाब जानने के लिए फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कुछ लोगों से बात की। एक अजीब बात ये देखने को मिली कि कोई भी इस मामले पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। नाम जाहिर न करने की शर्त पर ज्यादातर लोगों ने जो कुछ बताया वो बेहद चौंकाने वाला है। ज्यादातर लोगों ने दाऊद इब्राहिम या छोटा शकील का नाम लिया। अलग-अलग हुई इन बातचीत का निचोड़ कुछ इस तरह से है-

फिल्मों में लगता है दाऊद का पैसा!

लगभग सभी ने यह बताया कि बॉलीवुड के कई बड़े डायरेक्टर और एक्टरों की फिल्मों में डी-कंपनी के पैसे लगते हैं। इसमें से ज्यादातर ब्लैकमनी होती है, जिसे सफेद करने के लिए यहां लगाया जाता है। एक बड़े फिल्म डायरेक्टर ने हमें बताया कि डी-कंपनी से पैसों की लेन-देन अब सीधे तौर पर नहीं होती, क्योंकि इसमें पकड़े जाने का डर होता है। अब ज्यादातर लेन-देन प्रोफेशनल फाइनेंसर कंपनियों के जरिए होता है। ये इन कंपनियों की गारंटी होती है कि वो पैसे को इस तरीके से रूट करती हैं कि इनका असली सोर्स जानना लगभग नामुमकिन होता है। अगर कभी किसी को शक भी हो जाए तो इसे साबित करना बेहद मुश्किल होता है।

‘शुकराना के तौर पर पाक कलाकार’

किसी फिल्म में पाकिस्तानी एक्टर को लेने के पीछे दलील होती है कि इससे पाकिस्तान और खाड़ी के मार्केट में एंट्री आसान हो जाती है। लेकिन यह दलील अजीबोगरीब है। क्योंकि कुछ साल पहले जब पाकिस्तानी एक्टर ज्यादा नहीं थे, तब भी खाड़ी के मार्केट में भारत की फिल्में अच्छा कारोबार करती थीं। रही बात पाकिस्तान की तो वहां पर होने वाला बिजनेस किसी फिल्म की कुल कमाई का एक फीसदी से भी कम होता है। फिल्मों की जो पाइरेटेड कॉपी मार्केट में आती हैं, वो भी ज्यादातर पाकिस्तान में ही तैयार होती हैं। इस लिहाज से तो पाकिस्तान में बॉलीवुड की फिल्मों को रिलीज़ करना फायदे से ज्यादा नुकसान का सौदा है। इंडस्ट्री से जुड़े एक सीनियर व्यक्ति ने हमें बताया कि जो प्रोड्यूसर डॉन के पैसे पर फिल्में बनाते हैं, वही अक्सर पाकिस्तानी कलाकारों को भी लेते हैं। क्योंकि इस तरीके से एक तरह से वो शुक्रिया अदा कर देते हैं।

हीरो-हीरोइन भी डी-कंपनी की पसंद?

इस सवाल का जवाब ज्यादातर लोगों ने नहीं दिया। फिल्म बिजनेस से जुड़े एक अहम व्यक्ति ने हमें बताया कि एक्टरों का दाऊद से कोई सीधा कनेक्शन होता है ये कहना तो बेहद मुश्किल है। लेकिन उन्हें यह बात थोड़ा हैरत में डालती है कि आखिर पाकिस्तानी कलाकारों को भारत में इतनी बड़ी-बड़ी फिल्में और मोटी फीस कैसे मिल जाती है। मिसाल के तौर पर फवाद खान को पाकिस्तान में एक फिल्म के लिए 50 लाख रुपये से भी कम मिला करते थे, लेकिन मुंबई में वहां की फिल्मों से भी छोटे रोल के लिए 5 करोड़ रुपये तक मिल रहे थे। सुल्तान में तो अरिजीत सिंह का गाना हटाकर राहत फतेह अली खान का गाना डाल दिया गया था।

पाकिस्तानियों की इमेज सुधारने की कोशिश!

एक बड़े प्रोडक्शन हाउस की क्रिएटिव टीम के प्रमुख ने हमें बताया कि पाकिस्तानी कलाकारों को फिल्म में रखने के बाद कहानी कुछ इस तरह से बुनी जाती है कि उनके किरदार से पाकिस्तान की इमेज सुधरती हो और लोगों में यह राय बने कि पाकिस्तान के लोग बहुत अच्छे दिल के होते हैं। उन्होंने हमें हाल ही में आई एक ब्लॉकबस्टर फिल्म का उदाहरण दिया। एक खान एक्टर की इस फिल्म में यूं तो कोई पाक कलाकार नहीं था, लेकिन कुछ अज्ञात कारणों से इसमें एक पाकिस्तानी लड़के का किरदार घुसाया गया था। ये किरदार सुशांत सिंह राजपूत ने किया था। ये रोल सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तानियों को ‘अच्छा इंसान’ साबित करने के लिए रखा गया था। जबकि इसकी कहानी में कोई खास जरूरत नहीं थी। उन्होंने इस फिल्म की यूनिट से जुड़े एक व्यक्ति के हवाले से बताया कि पाकिस्तानी के इस रोल को जरूरत से ज्यादा जगह देने के पीछे कोई अदृश्य दबाव भी था।

दाऊद के एहसानों तले दबे हैं कुछ फिल्मकार!

हमारे एक सूत्र का कहना था कि अब तक पाकिस्तानी कलाकारों की वकालत में जो लोग खुलकर सामने आए हैं, वो सारे वही हैं जिन पर डी-कंपनी के एहसान रहे हैं। ये एहसान सिर्फ फिल्म के फाइनेंस तक ही सीमित नहीं है। किसी फिल्म की रिलीज डेट टलवाने से लेकर आपसी झगड़ों में मध्यस्थता तक के एहसान डी-कंपनी के गुर्गे करते रहे हैं। हालांकि बीते 8-10 सालों में यह काफी हद तक बंद हो चुका है। लेकिन जिन पर पुराने एहसान हैं वो आज भी लुके-छिपे तौर पर ही सही डी-कंपनी के इशारे पर बयानबाजी करते रहते हैं।

टेक्निकल कामों में भी पाकिस्तानी भरे पड़े!

एक्टिंग के अलावा प्रोडक्शन और दूसरे टेक्निकल कामों में भी पाकिस्तानियों की तादाद अचानक कई गुना बढ़ी है। इनमें कैमरामैन से लेकर एडिटर तक शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर तो खुद को भारतीय बताकर काम करते रहते हैं। यह सवाल कई लोग पूछ रहे हैं कि जब आम भारतीय टेक्निकल प्रोफेशनल्स को फिल्म इंडस्ट्री में घुसना इतना मुश्किल होता है तो इन पाकिस्तानियों को कौन यहां पर काम दिला रहा है? जबकि ये पाकिस्तानी भारत में वर्क वीज़ा पर नहीं, बल्कि टूरिस्ट वीजा पर आते हैं।

डिस्क्लेमर: हमारे सूत्रों ने जो बातें बताईं उसमें फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई बड़े लोगों के नाम भी शामिल थे। लेकिन हम इन्हें पब्लिश नहीं कर रहे हैं। क्योंकि इन आरोपों के पक्ष में कोई सबूत अभी हमें नहीं मिल पाया है। साथ ही हमने ज्यादातर उन्हीं बातों को इस रिपोर्ट में शामिल किया है, जिन्हें एक से ज्यादा लोगों ने सही माना है।

कृपया लेख कॉपी-पेस्ट न करें। कई लोग पोस्ट कॉपी करके फेसबुक और व्हाट्सएप पर शेयर कर देते हैं, जिससे वेबसाइट की आमदनी काफी कम हो गई है। राष्ट्रवाद की विचारधारा पर आधारित यह वेबसाइट बंद हो जाएगी तो क्या आपको खुशी होगी? कृपया खबरों का लिंक शेयर करें।
एक अपील: न्यूज़लूज़ के जरिए हम राष्ट्रवादी पत्रकारिता को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इस वेबसाइट पर होने वाला खर्च बहुत ज्यादा है और हमारी आमदनी काफी कम। हम अपने काम को जारी रख सकें इसके लिए हमें आर्थिक मदद की जरूरत है। ये हमारे लिए ऑक्सीजन का काम करेगी। डोनेट करने के लिए क्लिक करें:
Donate with

Polls

क्या अमेठी में इस बार राहुल गांधी की हार तय है?

View Results

Loading ... Loading ...