करवा चौथ पर बरखा दत्त के नाम एक ओपन लेटर!

प्रिय बरखा दत्त,
करवा चौथ आ गया है और आपकी तरह मैं इस साल भी व्रत नहीं रखने वाली। मज़े की बात ये है कि मैं इसके खिलाफ नहीं हूँ उल्टा मुझे बहुत अच्छा लगता है कि कैसे सब सज-धज के त्यौहार मनाते हैं। आज तो बाजार में भी खूब चहल-पहल है। मेंहदीवालियों के यहां लाइन लगी है। इतनी भीड़ कि पूछो मत और ब्यूटी पार्लर भी ओवरफ्लो हो रहे हैं।

वैसे टॉपिक तक तो मैं पंहुची ही नहीं। क्या जो करवा चौथ मनाते हैं वो “रिग्रेसिव” (दकियानूसी) होते हैं? आपके हिसाब से तो यही सही है। लेकिन आपको क्या प्रॉब्लम है? क्या पत्नी का पति के लिए एक दिन भूखा रहना? कमाल है, अगर कोई बिना किसी ज़ोर-जबरदस्ती के अपनी मर्ज़ी से ये कर रहा है तो कहाँ से टार्चर हुआ? प्यार जताने के हज़ारों तरीकों में से ये भी एक खूबसूरत तरीका है। अब क्या इसमें भी आपकी मॉरल पुलिसिंग चलेगी? अपनी सास के पैर छूने से? क्या एक दिन अपने पति की माँ के पैर छूने से हम पिछड़ जाते हैं? हमारे पति भी तो हमारे घरवालों के पैर छूते ही हैं न। अच्छा तो पति के पैर छूने से? हम्म… ये हो सकता है, रिश्ता बराबरी का है तो कैसे एक औरत एक मर्द के पैर छू सकती है? वैसे तो ज़्यादातर लोग हँसते-हँसते ये रस्म निभा देते हैं और इसमें कोई बड़ा-छोटा कैसे हो जायेगा? आपको ऐतराज है तो मत छूइए अपने पति और सास के पैर। किसने बोला है? वैसे भी प्यार और समर्पण के रिश्ते में ये बेमतलब की ऊंच-नीच और ज़रूरत से ज़्यादा इंटेलेक्चुअल हो जाना चलता नहीं है। क्योंकि इससे उस लम्हे की ख़ुशी और खूबसूरती दोनों को खा जाता है। हो सकता है आप ये बातें समझ न पाओ। लेकिन जिन्हें ये बातें समझ में आतीं हैं उनकी खिल्ली उड़ाने का आपको किसने अधिकार दे दिया?

मुझे पता है कि अगर आपको मौका मिले तो अगली दलील दोगी कि ये त्यौहार वैसे भी मार्केट और फिल्मों की देन है। तो बहनजी बता दीजिये कौन सा हम वैलेंटाइन की पूजा करके बड़े हुए हैं या फिर हेलोवीन मना के? वैलेंटाइन डे तो अब पूरी तरह से इंडियन हो ही चुका है (वैसे लड़कों से गिफ्ट लेते वक़्त हम रिग्रेससिव नहीं होते) और हेलोवीन भी जल्दी ही हो जाएगा। साल में एक दिन अगर कोई अपना दिन अपने पति के नाम कर दे तो वो पिछड़ा हुआ हो जाता है? ये सोच संभालिये, क्योंकि बेफजूल सोचना बहुत आसान है। एक दिन का व्रत करने में जो हिम्मत और समर्पण चाहिए ज़रा उसे देखिये।
ये हमारा तरीका है थैंक्स कहने का।

वैसे एक तर्क बाकी है कि क्या सिर्फ औरत ने ही ठेका ले रखा है तो कभी मर्दों से भी पूछ के देखिये कि जब वो भगवान के आगे हाथ जोड़ते हैं तो क्या मागते हैं? अपने सर के उड़े बाल या अपने परिवार की ख़ुशी? अगर कुछ करना किसी को ख़ुशी देता है तो उन्हें खुश हो लेने दीजिये ना। भले ही वो हिंदू हो। क्योंकि मुस्लिम महिलाओं के बुर्के पर तो आपकी राय का आज तक मैं इंतजार ही करती रह गई।

उम्मीद है ये चिट्ठी आप तक पहुंच ही जाएगी। हो सके तो सोचिएगा कि प्रोग्रेसिव और लिबरल होने के चक्कर में आपकी सोच कितनी संकरी और दकियानूसी होती चली गई है। … थैंक्यू।

(लेखिका प्रज्ञा बड़थ्वाल ध्यानी मुंबई में रहती हैं और एक विज्ञापन एजेंसी चलाती हैं)

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