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हिंदुओं के खिलाफ ‘द हिंदू’ के जिहादियों की साजिश

मीडिया में बैठे जिहादी पत्रकार और संपादक किस तरह हिंदू धर्म को बदनाम करने की साजिश करते हैं, इसका एक नमूना सामने आया है। द हिंदू अखबार ने आज एक खबर छापी है, जिसमें बताया गया है कि “मथुरा में हिंदुत्ववादियों ने नास्तिकों की एक बैठक पर हमला करके उसे रद्द करने के लिए मजबूर करवा दिया।“ जब हमने इस खबर की सच्चाई जांचने की कोशिश की तो सारी हकीकत सामने आ गई। यह भी पता चला कि खबर को लिखने वाला मोहम्मद अली नाम का पत्रकार वामपंथी संगठनों से जुड़ा रहा है और वो निजी तौर पर कट्टर मुसलमान है।

पब्लिसिटी के लिए सभी धर्मों का अपमान

स्वामी बालेंदु नाम के एक व्यक्ति ने वृंदावन में ‘ऐंवें मस्ती विद नास्तिक फ्रेंड्स’ नाम से दो दिन का यह सम्मेलन आयोजित किया था। इससे पहले मथुरा के लोकल अखबारों में बालेंदु ने अपने नाम से लेख छपवाया जिसमें हिंदू, मुस्लिम समेत सभी धर्मों के ग्रंथ अंधविश्वास फैलाते हैं और इनमें झूठ के सिवा कुछ भी नहीं है। बालेंदु ने इस लेख में सभी धर्मों के खिलाफ कुछ ऐसी बातें भी लिखी, जिससे लोगों की भावनाओं को भड़काया जा सके। ऐसा लगता है कि ऐसा सम्मेलन को लेकर विवाद पैदा करके पब्लिसिटी हासिल करने की नीयत से किया गया। ये लेख पढ़ने के बाद ही लोगों को इस सम्मेलन के बाद पता चला और लोगों ने विरोध शुरू कर दिया।

हिंदुओं नहीं, मुसलमानों ने किया था हमला!

अमर उजाला और नई दुनिया ने अपनी रिपोर्ट्स में लिखा है कि हिंदू संगठनों ने सिर्फ विरोध प्रदर्शन और पुतला जलाने का काम किया था। जबकि मुस्लिम संगठनों की तरफ से उस होटल पर पत्थरबाजी की गई जिसमें कार्यक्रम हो रहा था। यहां तक कि एक प्रदर्शनकारी ने तो होटल पर तेल छिड़ककर आग लगाने की भी कोशिश की थी। बात बढ़ती देख प्रशासन ने बालेंदु स्वामी से बात की और उसे लिखित माफी मांगने को कहा। प्रशासन के दबाव में ही सम्मेलन रद्द किया गया था। ऐसे में सवाल यह है कि द हिंदू अखबार के जिहादी पत्रकार मोहम्मद अली ने सिर्फ हिंदुओं को किस आधार पर कसूरवार ठहराया। अगर हिंदू संगठन वहां पर बालेंदु के खिलाफ अहिंसक प्रदर्शन कर रहे थे तो क्या यह उनका अधिकार नहीं है?

लोकल अखबारों ने छापी है सही खबर

अमर उजाला अखबार ने मथुरा दरवाजा जामा मस्जिद के इमाम मोहम्मद उमर कादरी का बयान छापा है जिसमें उन्होंने कहा है कि “बालेंदु का दिमाग खराब हो गया है। उसने अखबार में जो कुछ लिखा है उससे देश भर में गुस्सा फैल सकता है।” इसी खबर में स्थानीय गुरुद्वारे के मैनेजर का बयान छापा है जिसमें उन्होंने बालेंदु के बयान पर नाराजगी जताई है। नई दुनिया अखबार ने खबर छापी है कि मुस्लिम संगठनों ने स्थानीय प्रशासन को ज्ञापन सौंप कर चेतावनी दी है कि नास्तिकता के नाम पर अगर इस्लाम का अपमान किया गया तो वो बर्दाश्त नहीं करेंगे।

लेकिन अखबार ने यह खबर छापी:

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क्या यह महज इत्तेफाक हो सकता है कि रिपोर्ट में हिंसा फैलाने वाले मुस्लिम समूहों का नाम भूल से छूट गया हो? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि कम्युनिस्ट अखबार के तौर पर पहचाने जाने वाले इस अखबार के संपादक खुल्लमखुल्ला हिंदुओं के खिलाफ दुष्प्रचार में जुटे हैं।

जिहादियों की कठपुतली है बालेंदु स्वामी!

उधर रिपोर्टर की दलील है कि उसने खुद देखा है कि प्रदर्शन करने वालों में सिर्फ हिंदू संगठनों के लोग थे। लेकिन इस रिपोर्टर के अलावा एक भी मीडिया संस्थान इस दावे को सही नहीं मान रहा। यहां तक कि इंडियन एक्सप्रेस ने भी प्रदर्शन और हिंसा में मुस्लिम संगठनों के शामिल होने की बात रिपोर्ट की है। कुछ लोकल अखबारों ने तो उस लड़के की पहचान तक बताई है जिसने होटल पर पत्थर फेंके थे। ये हैरत की बात है कि बालेंदु स्वामी के संगठन ने अपनी एफआईआर में किसी मुस्लिम संगठन का नाम नहीं लिखा है, जबकि पुलिस के रोजनामचे में ढेरों मुस्लिम नेताओं के वहां मौजूद होने की बात कही गई है। इस बात से यह शक भी पैदा होता है कि नास्तिकता के नाम पर राजनीति कर रहा बालेंदु स्वामी कहीं मुस्लिम कट्टरपंथियों की ही कोई कठपुतली तो नहीं है।

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