तब सर्जिकल स्ट्राइक में जिम्मेदारी से क्यों भागे मनमोहन?

रविवार को एक अंग्रेजी अखबार में खबर छपी कि सेना ने 2008 और 2011 में भी सर्जिकल स्ट्राइक किया था। इस खबर के आने के बाद से कांग्रेस काफी उत्साह में है। उसे लग रहा है कि इस खबर को दिखाकर वो साबित कर देगी कि मोदी इकलौते नहीं है, इससे पहले मनमोहन सिंह ने भी पाकिस्तानी कब्जे वाले इलाकों में घुसकर हमले करवाए थे। लेकिन असलियत में यह खबर कांग्रेस सरकार के निकम्मेपन की बड़ी मिसाल है। इन दोनों फौजी ऑपरेशन के जो दस्तावेज सामने आए हैं, उनमें साफ-साफ लिखा है कि उस वक्त की केंद्र सरकार ने इनके लिए सेना को इजाज़त नहीं दी थी। बल्कि सेना ने खुद अपने जवानों का बदला लेने के लिए ये हमले किए थे। साफ है कि मनमोहन सरकार हमले की स्थिति में किसी भी तरह का जोखिम अपने सिर लेने को तैयार नहीं थी। 2011 में हुए हमले का नाम सेना ने ही अपनी तरफ से ऑपरेशन जिंजर रखा था।

जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थी मनमोहन सरकार!

यह शर्मनाक बात है कि सेना को अपना बदला लेने के लिए केंद्र सरकार से कोई सपोर्ट न मिले। 2008 और 2011, दोनों ही कार्रवाइयों में केंद्र सरकार ने सेना का साथ नहीं दिया।

जून 2008 में केल सेक्टर में पाकिस्तानी बॉर्डर एक्शन टीम (बीएटी) ने गोरखा राइफल के एक जवान का गला काट दिया था। ये जवान पैट्रोलिंग के दौरान रास्ता भटक गया था। बाद में उसका शव बिना सिर के बरामद हुआ। इस घटना से भारतीय सैनिकों का खून खौल उठा था और उन्होंने बिना केंद्र सरकार की इजाजत के चार पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काट दिए थे। इस हमले में 8 पाकिस्तानी जवान मारे गए थे।

30 जुलाई 2011 को कुपवाड़ा की गूगलधर चोटी पर भारतीय सेना की पोस्ट पर बीएटी ने हमला किया। इस हमले में 5 भारतीय जवान मौके पर शहीद हो गए थे। बीएटी दो भारतीय जवान हवलदार जयपाल सिंह अधिकारी और लांस नायक देवेंंद्र सिंह के सिर काटकर अपने साथ ले गई थी। इसके बाद भारतीय सेना ने भी जवाबी हमले में 8 पाकिस्तानी जवानों को मार गिराया था। इसे ‘ऑपरेशन जिंजर’ नाम दिया गया। बदले की आग में जल रहे भारतीय जवान अपने साथ तीन पाकिस्तानियों के सिर काटकर भारत लाए थे। उस ऑपरेशन को 4 पैरा-स्पेशल फ़ोर्स के जवानों ने अंजाम दिया था। हमले के बाद भारतीय सेना की टेक्निकल सपोर्ट डिवीजन ने मरे हुए पाकिस्तानी सैनिकों के शरीर में आईईडी लगाकर उन्हें एक जगह पर डाल दिया था। जब उन्हें लेने पाकिस्तानी जवान पहुंचे तो वहां पर लैंडमाइन ब्लास्ट करवाकर और कई पाकिस्तानी जवानों को शिकार बनाया गया था।

8 जनवरी 2013 को दो भारतीय जवानों हेमराज और सुधाकर की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। पाक सैनिकों के साथ आए लश्कर और जैश के 15 आतंकवादी सीमा पर तैनात जवान हेमराज और सुधाकर सिंह का सिर काटकर अपने साथ ले गए थे। लगभग दो हफ्ते बाद भारतीय सेना ने भारी फायरिंग करके पाकिस्तान की एक पोस्ट को बर्बाद कर दिया। इस हमले में 6 से ज्यादा पाकिस्तानी जवान मारे गए थे। हालांकि वो सर्जिकल ऑपरेशन नहीं था।

जिम्मेदारी लेने से डर रहे थे मनमोहन सिंह?

यह बात बिल्कुल सही है कि सेना हमेशा से खुद पर हुए हमलों का बदला लेती रही है। लेकिन पहले सरकार का सपोर्ट न मिलने के कारण सेना छोटे पैमाने पर खुद ही कार्रवाई करती थी। जबकि इस बार पीएम नरेंद्र मोदी ने खुद पूरी सर्जिकल स्ट्राइक की रणनीति बनाई और उसकी निगरानी की। अगर फौजी कार्रवाई के दौरान कुछ गड़बड़ होती तो मोदी उसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार थे, जबकि मनमोहन सिंह इसके लिए कभी राजी नहीं हुए। मनमोहन सरकार को लगता था कि अगर कुछ गड़बड़ हो गई तो वो इसके लिए कुछ फौजी अफसरों को दोषी बताकर पल्ला झाड़ सकेंगे। पहले से अलग इस बार हमले की जिम्मेदारी लेने की रणनीति भी इसलिए बनी क्योंकि अब तक जब भी पाक सैनिक मारे जाते रहे, वहां की सेना चुप मारकर बैठ गई। पाक सेना को डर रहता है कि अगर इतनी बड़ी तादाद में सैनिकों के मरने की खबर बाहर चली गई तो खुद उस पर सवाल उठने लगेंगे।

ऑपरेशन जिंजर से जुड़े दस्तावेज आप नीचे देख सकते हैं।

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फिलहाल इस खबर पर कांग्रेस का उत्साह देखने लायक है। यहां तक कि उसके समर्थक दो बड़े पत्रकारों ने भी कोई सवाल पूछने के बजाय यह जताना शुरू कर दिया कि मनमोहन सिंह के वक्त भी सर्जिकल स्ट्राइक हुआ था।

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