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भारत में रहेंगे बलोच फ्रीडम फाइटर ब्रहमदग बुगटी

अब यह बात साफ हो गई है कि बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई लड़ रहे ब्रहमदग बुगटी भारत में ही रहेंगे। बुगटी ने कुछ दिन पहले ही भारत सरकार से राजनीतिक शरण मांगी थी। अभी वो स्विट्जरलैंड में रह रहे हैं। यह भी संभावना है कि बुगटी भारत में रहकर आजाद बलूचिस्तान की निर्वासित सरकार का गठन भी करेंगे। ठीक वैसे जैसे कि अभी मैक्लोडगंज में स्वतंत्र तिब्बत की निर्वासित सरकार चल रही है। भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बलूचिस्तान के लोगों के मानवाधिकार का मुद्दा उठाता रहेगा। ब्रहमदग बुगटी बलूचिस्तान की आजादी के सबसे बड़े नेता नवाब अकबर बुगटी के पोते हैं, उनकी 2006 में पाकिस्तानी सेना ने हत्या कर दी थी। ब्रहमदग बलोच रिपब्लिक पार्टी के मुखिया हैं। पाकिस्तान ने इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा है। ब्रहमदग बुगटी की उम्र सिर्फ 33 साल है और उन्हें बलोचिस्तान की आजादी की लड़ाई की नई पीढ़ी के नेता के तौर पर देखा जा रहा है।

भारत में ‘राजधानी’ की तलाश जारी

बलोच क्रांतिकारी अगर भारत में रहते हैं तो उन पर खतरा बहुत होगा। यह भी आशंका है कि पाकिस्तान आतंकवादी भेजकर उन पर हमले करवा सकता है। लिहाजा खुफिया एजेंसियां इससे जुड़े सारे बंदोबस्त करने में जुटी हैं। यह भी जानकारी ली जा रही है कि बुगटी के अलावा उनके साथ और कौन-कौन से बलोच नेता भारत आना चाहेंगे। इसके अलावा उन्हें बसाने के लिए उचित जगह पर भी विचार-विमर्श चल रहा है। क्योंकि यह ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां पर वैसा मौसम हो जैसा कि बलोचिस्तान में होता है। ताकि ये लोग बिल्कुल अपने घर जैसा महसूस कर सकें। यह जो भी जगह होगी उसे बलूचिस्तान की अस्थायी राजधानी के तौर पर जाना जाएगा। गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के हवाले से हिंदुस्तान टाइम्स अखबार ने इस खबर की पुष्टि भी की है।

पाकिस्तान को बड़ी टेंशन देने की तैयारी

बलूचिस्तान में बीते कई साल से आजादी की लड़ाई चल रही है, लेकिन अब तक की भारतीय सरकारों ने कभी भी वहां के लोगों की मदद नहीं की। इस दौरान पाकिस्तान पंजाब से लेकर कश्मीर तक में आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा। हां तक कि उसने दाऊद इब्राहिम समेत भारत के कई आतंकवादियों को खुल्लमखुल्ला शरण भी दी। नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद से इस बारे में विदेश नीति में बड़ा बदलाव लाया गया है। बलोच फ्रीडम फाइटर्स के लिए भी यह अच्छा रहेगा कि वो भारत में ही रहें, क्योंकि स्विट्जरलैंड में रहकर गतिविधियां चलाना काफी मुश्किल साबित हो रहा था। भारतीय अधिकारियों और बुगटी के बीच पिछले कुछ दिनों में जिनेवा में कई राउंड बातचीत भी हो चुकी है। अगर भारत में बलूचिस्तान की निर्वासित सरकार बनती है तो इससे दुनिया भर के मंचों पर बलोच लोगों की आवाज और भी ज्यादा मजबूती से उठाने में मदद मिलेगी।

नवाब अकबर बुगटी की तस्वीर, ब्रहमदग बुगटी इनके पोते हैं। 2006 में पाकिस्तानी सेना ने इनकी हत्या कर दी थी।
नवाब अकबर बुगटी की तस्वीर, ब्रहमदग बुगटी इनके पोते हैं। 2006 में पाकिस्तानी सेना ने इनकी हत्या कर दी थी।

क्या है बलोचिस्तान की आजादी का मुद्दा?

1947 में आजादी के वक्त बलूचिस्तान के लोगों ने पाकिस्तान में विलय का विरोध किया था। इसके बावजूद पाकिस्तानी सेना ने हथियारों के दम पर इस इलाके पर कब्जा कर लिया। आजादी के बाद से यहां के लोगों ने कभी पाकिस्तान की हुकूमत को स्वीकार नहीं किया। पाकिस्तानी सेना यहां पर अब तक हजारों बलोच कार्यकर्ताओं की हत्या कर चुकी है। पूरे इलाके में विकास का नामो-निशान नहीं है और प्राकृतिक संसाधनों की भरमार के बावजूद लोग बहुत गरीब हैं। चीन की मदद से पाकिस्तान यहां पर चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर बनवा रहा है। यहां के स्थानीय लोग इसका विरोध कर रहे हैं। लालकिले से प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के बाद से बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई पर पहली बार दुनिया के लोगों का ध्यान जा रहा है। बलोच ट्राइब के लोग बेहद खुद्दार किस्म के माने जाते हैं। मुगल आक्रमणों के दौर में इन लोगों को जबरन मुसलमान बना लिया गया था, लेकिन ज्यादातर बलोच लोग इस बात को स्वीकार करने में शरमाते नहीं हैं कि उनके पूर्वज हिंदू थे। जबकि सिर्फ 2 पीढ़ी पहले तक हिंदू होने के बावजूद ज्यादातर भारतीय मुसलमान इस बात को स्वीकार करने से हिचकिचाते हैं।

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