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कपिल मिश्रा, क्या इन तीनों को देशद्रोही मानते हो?

deepak-chaubeyकई साल पहले जब गुजरात गए केजरीवाल को तब सीएम रहे नरेंद्र मोदी ने मिलने का भी वक्त नहीं दिया तो मुझे बेहद कोफ्त हुई थी, लगा ये सामान्य शिष्टाचार के खिलाफ है अगर आपको सवालों के जवाब नहीं देना था ना देते, लेकिन भीतर बुलाकर चाय-पानी पूछ कर लौटा देते, इस तरह की घटनाएं लोकतंत्र की शोभा होती हैं जहां विरोधियों से व्यवहार में रुखापन खटकता है। लेकिन आज अचानक से महसूस हुआ कि अगर केजरी एंड कंपनी किसी के दरवाजे पर जाए तो कुर्सी देना दूर कायदे से देह पर ठंडा या गरम पानी फेंक देना चाहिए। ये इसी के लायक हैं।

जिस सरकार के मनहूस मंत्री को इतनी भी तमीज नहीं कि बतौर मेहमान आई और बेहद विषम परिस्थितियों से जूझ रहे किसी राज्य की मुख्यमंत्री से कैसे पेश आते हैं वो नेता कहलाने के लायक है? इस तरह के चोर, उचक्के और लंपटों को संवैधानिक पद का हकदार माना जाए? हाइकोर्ट ने सही किया है कि तुम सबको औकात दिखा दी,जब हाथ में कुछ नहीं है तब तो जीना मुहाल कर रखा है अगर पावर होता तब तो आग लगा देते।

देश के राजनीतिक इतिहास में आज तक किसी राज्य के मंत्री ने सार्वजनक तौर पर किसी मुख्यमंत्री से ऐसे सवाल नहीं किए होंगे। कश्मीर के हालात क्या है पूरे देश को पता है,वहां की मुख्यमंत्री की मुश्किलें भी पता है, जेएनयू पर महबूबा की राय पूछने से पहले पापा केजरी से नहीं पूछे थे कि कन्हैया और उसकी मंडली को आने का कार्ड किस खुशी में भेजा था। अरे करमहीनों पूछना ही था तो किसी कार्यकर्ता या रिपोर्टर को लगा देते, तुम मंत्री होकर इतने बेहूदा कैसे हो सकते हो, इसीलिए कि राशनकार्ड केस तक में भी बचाव करने वाले आशुतोष जैसे कुतर्की टीम में हैं।
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इसे महबूबा मुफ्ती की शालीनता कही जाएगी जिस तरह से उन्होने हालात को हैंडल किया और संतुलित बनी रही, केजरी एंड कंपनी को हिम्मत है तो एक बार जरा ममता बनर्जी से सवाल पूछ कर दिखा दे, अगर अपनी घिसी चप्पल से ही मुंह ना पोंछ दे फिर बताना। लानत है तुम सब पर और सैल्यूट है महबूबा के नाम।
(पत्रकार दीपक चौबे के फेसबुक पेज से साभार)

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