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सिंधु नदी के पानी के मुद्दे पर एनडीटीवी से 10 सवाल

आशीष कुमार
आशीष कुमार
पाकिस्तान के साथ सिंधु नदी जल समझौता तोड़ने की बात उठते ही मीडिया के एक तबके ने हाय-तौबा मचा दी है। खास तौर पर एनडीटीवी के पत्रकार कुछ इस तरह परेशान हैं मानो इससे उनके घर का पानी बंद हो जाएगा। इस चैनल के कुछ पत्रकार तो दिल्ली से ज्यादा जम्मू कश्मीर में रहते हैं। उन्हें तो पता ही होगा कि राज्य के लोग पानी की किल्लत और बिजली के के संकट से गुजर रहे हैं। इसके बावजूद पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का 80 फीसदी पानी देने के समर्थन में अजीबोगरीब तर्क दिए जा रहे हैं। इन्हें देखते हुए हम एनडीटीवी से कुछ सवाल पूछना चाहते हैं।

1. जम्मू कश्मीर की पानी की बढ़ती जरूरत का आपके पास क्या हल है? भारत की चिंता पहले जम्मू कश्मीर होना चाहिए या पाकिस्तान? आपकी वेबसाइट पर उपलब्ध कार्यक्रमों और लेखों में बताया गया है कि पाकिस्तान ने सिंधु पर बांध बना रखे हैं और उसे पानी की जरूरत है, तो क्या भारत को इसकी जरूरत नहीं है?

2. अगर उत्तराखंड और हिमाचल की नदियों पर बांध बनाकर, लोगों को विस्थापित करके बिजली बनाई जा सकती है तो चिनाब और झेलम पर यह अव्यावहारिक कैसे होगा? ब्रह्मपुत्र जैसी तेज बहाव वाली नदी पर बांध बन सकते हैं तो झेलम, चिनाब पर क्यों नहीं?

3. सितंबर 2014 में आपके दो रिपोर्टरों ने तिब्बत में ब्रह्मपुत्र पर बन रहे जंगमू डैम की यात्रा की थी। यह डैम भारत के लिए बड़ा खतरा माना जाता है। लेकिन आपकी रिपोर्ट में भारत की चिंता के बजाय चीन की दलीलों को ज्यादा जगह क्यों दी गई? जबकि आसानी से समझा जा सकता है कि यह डैम भारत के लिए खतरा है। कहीं इसलिए तो नहीं कि वो यात्रा चीन के पैसे पर थी?

4. एनडीटीवी को यह क्यों लग रहा है कि सिंधु नदी जल संधि टूटते ही भारत नल की टोंटी बंद कर देगा? कॉमन सेंस तो यही कहता है कि पाकिस्तान को पानी मिलता रहेगा। बस भारत को यह छूट मिल जाएगी कि वो अपने नागरिकों की जरूरत के लिए पानी ले सके। फिर आप लोग पाकिस्तान के प्रवक्ता की तरह बर्ताव क्यों कर रहे हैं?

5. हृदयेश जोशी ने अपने लेख में लिखा है कि “सिंधु नदी संधि टूटी तो भारत की छवि खराब हो जाएगी।” दुनिया में संधियां इससे पहले भी तोड़ी गई हैं। अमेरिका, चीन और यूरोप के तमाम देशों ने ऐसा किया है। छवि की चिंता सिर्फ भारत को ही क्यों होनी चाहिए?

6. जब पाकिस्तान ने शिमला संधि को नहीं माना तो भारत सिंधु नदी समझौते को क्यों माने? क्योंकि कूटनीति पारस्परिक आदान-प्रदान से चलती है, न कि ‘जितने भी तू करले सितम, हंस-हंस के सहेंगे हम’ के सिद्धांत पर।

7. 1960 में जब सिंधु नदी संधि हुई तब कश्मीर में आतंकवाद नहीं था। वैसे भी दुनिया की कोई संधि सात जन्मों का बंधन नहीं होती। पाकिस्तान भारत में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है, क्या कारण है कि भारत को ही पतिव्रता नारी की तरह हर यातना सहकर पाकिस्तान की खुशहाली की चिंता करनी चाहिए?

8. आपने एक जगह लिखा है कि संधि टूटने से मानवाधिकार उल्लंघन का दाग लग जाएगा। क्या पाकिस्तान यह दाग पहले से नहीं लगाता रहता है जो अब इस नए दाग से भारत की कमीज मैली हो जाएगी? दरअसल पानी रोकने से भारत पर मानवाधिकार उल्लंघन के दाग धुलेंगे। क्योंकि ऐसा करके भारत आतंकवाद में जल रहे कश्मीर के लोगों को उनका अधिकार देगा।

9. एक जगह यह भी लिखा गया है कि अगर भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु नदी संधि तोड़ी तो नेपाल औऱ बांग्लादेश भारत से जलसंधियां तोड़ देंगे, लेकिन क्या आपको लगता है कि इन देशों से भारत के रिश्ते वैसे ही हैं जैसे पाकिस्तान के साथ? यह बचकानी दलील औसत बुद्धि रखने वाला कोई पत्रकार कैसे दे सकता है?

10. आपने चीन का तर्क दिया है कि वो भारत को परेशान करेगा। जैसा कि आपके पत्रकारों ने खुद चीन जाकर देखा है कि उसने किस तरह भारत की आपत्ति के बावजूद बड़े-बड़े बांध बना रखे हैं? ये बांध भारत के बड़े इलाके के लिए खतरा हैं। अब और क्या बाकी है जो वो कर देगा?

मुझे उम्मीद है कि आप इन सवालों के जवाब देंगे। सीधे न सही कम से कम अपने चैनल और वेबसाइट के जरिए। झूठ-मूठ का प्रोपोगेंडा नहीं फैलाएंगे कि संधि टूटने से जम्मू कश्मीर में बाढ़ आ जाएगी। और प्लीज…. ‘पंछी नदिया पवन के झोंके…’ टाइप का कोई गाना मत बजाइएगा। ज्यादातर लोग आपके मायावी रूप को पहचान चुके हैं। जिनको अब भी लगता है कि एनडीटीवी पत्रकारिता कर रहा है उनका भी भ्रम इस मामले पर आपके रवैये से दूर हो जाएगा।

फिलहाल ये हैं आपके पत्रकारों के दो ट्वीट्स जिन्हें देखकर कोई भी समझ सकता है कि आप निष्पक्ष नहीं हैं। इन दोनों पत्रकारों ने अपने ट्वीट में जो लिखा है उसे सभ्य भाषा में ‘लॉबिंग’ और खराब भाषा में ‘दलाली’ कहते हैं। अब आप सोचिए कि यह आप किसके लिए कर रहे हैं।

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