अब मूंछों पर ताव दे कर जंग नहीं जीती जाती!

 

अरुण पांडेय नोएडा में ज़ी बिज़नेस में कार्यरत हैं।

अरुण पांडेय नोएडा में ज़ी बिज़नेस में कार्यरत हैं।

पहले कोजीकोड फिर मन की बात दोनों में मोदी जी ठीक वैसे ही बोले जैसे किसी देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बोलते हैं। या फिर 1947 से जैसे भारत के प्रधानमंत्री सार्वजनिक मंचों पर बोलते रहे हैं। इसमें हैरानी की क्या बात है। पंडित नेहरू से शास्त्री जी से लेकर इंदिरा, राजीव, और वाजपेयी मनमोहन होते हुए मोदी जी, जिम्मेदार पदों पर ऐसे ही बोला जाता है। मोदी विरोधी और मोदी समर्थक रहे दोनों ही लोग बेकार में उत्तेजित हैं। ठंड रखो ना भाई लोगो, राजकाज ऐसे ही चलता है। पुराने राजा महाराजों की तरह नहीं कि मूंछ तो ताव देते हुए निकल पड़े और सब कुछ लुटाकर जंगलों में मारे मारे घूम रहे हैं। प्रधानमंत्री ऐसे ही तक़रीर करते हैं, दुश्मन को करारा जवाब दिया जाएगा, सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। देश हर मुकाबले के लिए सक्षम और तैयार है। नेहरू जी भी ऐसा ही बोलते थे और वाजपेयी जी भी, तो फिर मोदी जी पर क्यों तंज और कटाक्ष कसे जा रहे हैं। युद्ध खेल नहीं, जान और धन दोनों जाता है।

मोदी जी ने पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात कही थी, ये सच है लेकिन तब वो विपक्ष में थे। उन्हें सेना की तैयारी, आंतरिक क्षमता और आर्थिक परिस्थिति जैसे बहुत से सीक्रेट प्रधानमंत्री बनने के बाद पता चले होंगे। या फिर युद्ध में जाने के लिए कितनी तैयारी करनी है, इसकी जानकारी भी उन्हें अब मिली होगी।

दरअसल सेना और सैनिकों को लेकर हम हिंदुस्तानी शुरू से ही बेहद संवेदनशील होते हैं। कई बार हम जानबूझकर सेना के अफसरों से सवाल जवाब नहीं करते। हमने अभी तक ये नहीं पूछा कि सेना के कैंप में सुरक्षा इतनी कमजोर कैसे थी कि आतंकवादी बेरोकटोक घुसते चले गए? ना पठानकोट में हमने पूछा ना उड़ी में पूछा। क्योंकि ऐसी प्रथा है कि सेना के काम में नुक्ताचीनी नहीं की जाती। इसी तरह की लापरवाही जब पुलिस से होती है तक दैनिक करोलबाग टाइम्स से लेकर दैनिक देशभक्त तक सब पिल पड़ते हैं।

मैंने जब एक शीर्ष संस्था में अपने पत्रकारिता जीवन की शुरूआत की थी तो हमारे उस वक्त के ब्यूरो चीफ ने सबसे पहले यही बताया था कि पत्रकारिता में सब पर उंगली उठा लेना पर भूल के भी सेना पर कभी कोई सवाल नहीं उठाना।
26 जनवरी की परेड वही कवर करते थे, और उसकी पूरी स्टोरी वो 25 जनवरी को ही लिख देते थे। राजपथ में राष्ट्रपति ने शानदार परेड की सलामी ली। पूरी कहानी होती थी, हेलीकॉप्टर ने पुष्प वर्षा की और आखिर में मिग 29 की शानदार करतब ने हजारों लोगों का मन मोह लिया। मैंने कहा एक बार परेड देखने के बाद स्टोरी लिखनी चाहिए, वाकई शानदार परेड रही या नहीं ये तो परेड के बाद ही पता चलेगा। इस पर उन्होंने कहा तुम नए हो, मैं पिछले बीस सालों से 26 जनवरी की परेड कवर कर रहा हूं।

पिछले सालों में तमाम संस्थाओं का सम्मान कम हुआ है, लेकिन अभी भी सेना का बहुत सम्मान है। मैं यही कामना करूंगा कि ये सम्मान बरकरार रहे। सैनिकों में देशभक्ति कूट कूटकर भरी होती है, लेकिन अफसरों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। हमारे सैनिक ठिकाने अभेद्य होने चाहिए, बिना जानकारी परिंदा भी पर ना मार सके। सैनिकों की मौत पूरे देश को हिला देती है, दुर्ग की तरह अभेद्य होने चाहिए हमारे सभी सैनिक ठिकाने। जब मामला कुछ ठंडा पड़े तो इसका ऑडिट भी होना चाहिए कि पहले पठानकोट, फिर उड़ी आखिर सुरक्षा में चूक क्यों हो जाती है?

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