क्या वाकई तीन बीघा जमीन में इंसाफ बिक गया!

Courtesy: aljazeera

पत्रकार शरद राय के फेसबुक पेज से साभार

पत्रकार शरद राय के फेसबुक पेज से साभार

28 जून 1996 को मेरे बड़े भाई मनोज राय की बिहार के बक्सर में दिन के 10 बजे गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। करीब 20 साल और ढाई महीने के बाद बक्सर डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने हत्यारों को निर्दोष बता दिया। हत्यारों को इन 20 सालों में एक दिन भी जेल में नहीं रहना पड़ा। मेरे चाचा श्री रंगनाथ राय की 7 दिसंबर 1994 को दिन के 11 बजे गोली मारकर हत्या कर दी गई थी जिसके चश्मदीद गवाह अकेले मनोज भैया थे। जिस दिन मनोज भैया की हत्या की गई उस दिन उनको कोर्ट में गवाही करनी थी लेकिन उसी दिन सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई ताकि वो गवाही न कर सकें। चाचा के केस में भी जज ने चश्मदीद गवाह न होने का हवाला देते हुए केस में हत्यारों को रिहा कर दिया। मनोज भैया के केस में जज के सामने तीन चश्मदीद गवाह थे, सीआईडी जांच की रिपोर्ट थी, सीआईडी ने भी साफ कर दिया था कि आरोपी हत्या में शामिल हैं, फिर भी हत्यारों को रिहा कर दिया गया। आज रिहाई से ठीक एक महीने पहले हत्यारों ने जज को पैसा देने के लिए अपने घर की तीन बीघे जमीन बेच दी।

हर किसी को पता था कि जज ने पैसा लिया है और रिहा ही करेगा। बक्सर एडीजे अरुण कुमार श्रीवास्तव ने सीआईडी रिपोर्ट और चश्मदीद गवाहों को नकारते हुए पैसे के लिए रिहाई का आदेश दे दिया। किसी केस में वकील-जज मोटिव खोजते हैं, इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता था कि जिस दिन मनोज भैया को गवाही देना था उसी दिन गवाही से एक घंटे पहले हत्या कर दी गई, फिर भी रिहाई। 20 साल से ज्यादा इंतजार करने के बाद मिला क्या, अगर इस न्याय व्यवस्था में भरोसा रखें तो क्यों?

देश का ये एक अनोखा मामला है, जिसके परिवार के लोग मारे जाते हैं और जज कहता है कि नहीं जिसे तुम बता रहे हो वो नहीं मारा है, वो निर्दोष है। आप सब को मैं बताना चाहता हूं कि मनोज भैया के हत्यारों को कभी जेल नहीं जाना पड़ा…..कुछ दिन तक फरार रहे और फिर जेल गए बिना बेल मिल गई। इस तरह का केस पूरे देश में एक भी नहीं होगा। हम 20 साल तक केस लड़ते रहे कि न्याय मिलेगा लेकिन जज ने उन्हें निर्दोष बता दिया। एक 28 साल का लड़का मारा जाता है और तीन चश्मदीद गवाह होने के बावजूद हत्यारों को एक दिन भी जेल में नहीं रहना पड़ा और 20 साल बाद निर्दोष साबित हो गए। आज बक्सर कोर्ट में हर वकील कह रहा है कि जज अरुण कुमार श्रीवास्तव ने पैसा लेकर फैसला दिया है। लेकिन हम असहाय है। मेरे पास वकील से बातचीत का रिकॉर्ड है जिसमें वो जज के बारे में जो बोल रहा है वो मैं लिख भी नहीं सकता हूं। मैं नहीं जानता हूं, आप लोग बताइए, है कोई उपाय….कहां जाएं, किसके पास जाएं?

(पत्रकार शरद राय ने भारतीय न्यायपालिका के साथ अपने इस अनुभव को फेसबुक पर शेयर किया है। अगर उनकी लिखी बातें सच हैं तो ये अदालतों और कानून के राज पर एक बड़ा सवाल है। हमें विश्वास है कि वो इस खराब अनुभव के बावजूद ऊपरी अदालत में अपील करेंगे और उन्हें इंसाफ मिलेगा।)

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