‘माफ कीजिए… मैं बकरीद मुबारक नहीं बोल सकता’

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वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार की फेसबुक वॉल से साभार

वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार की फेसबुक वॉल से साभार

मेरे एक प्रिय मुस्लिम भाई ने शिकायत की कि देश-दुनिया के मुद्दों पर तो आप ख़ूब लिखते हैं, लेकिन हमें बकरीद की शुभकामनाएं तक नहीं दीं। क्या आप मुसलमानों को अपना भाई-बहन नहीं मानते? मुझे लगा कि यह एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब मुझे सार्वजनिक रूप से देना चाहिए, क्योंकि इससे मुझे समाज, सियासत और धर्म में व्याप्त बुराइयों पर चोट करने में मदद मिलेगी।
इस शिकायत में दो सवाल हैं। पहला- मैंने मुस्लिम भाइयों-बहनों को बकरीद की शुभकामनाएं क्यों नहीं दीं? दूसरा- क्या मुसलमानों को मैं अपना भाई-बहन नहीं मानता?

तो मित्रो, पहले दूसरे सवाल का जवाब। मैं कोई शातिर सांप्रदायिक नेता तो हूं नहीं, जो हर ग़लत-सही बात पर आपका “तुष्टीकरण” करने में लगा रहूं। मैं आपका वास्तविक “पुष्टीकरण” चाहता हूं और इसीलिए आपको अक्सर वह कड़वा डोज़ देने से भी नहीं हिचकता, जो एक सच्चे भाई या मित्र को देना चाहिए। मैं आम मुसलमानों को सगे भाई-बहनों की तरह मानता हूं, लेकिन आपके ठेकेदारों से मेरा तगड़ा विरोध है।
एक तबका है, आपके फूहड़-अज्ञानी धर्मगुरुओं का, जो आपको धर्मांध और कट्टर बनाना चाहता है, सोच और संस्कार के स्तर पर चौदहवीं शताब्दी में ढकेलना चाहता है, आपमें हिंसा और नफ़रत के बीज बोना चाहता है, अल्लाह और कुरान का भय दिखाकर बदलती हुई दुनिया के साथ बदलने से आपको रोकना चाहता है। मैं आपके जाकिर जैसे “खलनाइकों” का विरोध करता हूं और आपको गलतफहमी हो जाती है कि मैं मुसलमानों का विरोधी हो चला हूं।

एक दूसरा तबका है, जो आपको इंसान समझता ही नहीं, अपना बपौती वोट बैंक समझता है। आप उसके हाथ से छिटक न जाएं, इसके लिए आपको तरह-तरह से गुमराह करता है, बरगलाता है, डराता है, आपमें असुरक्षा की भावना भरने और आपको सच्चाई से दूर रखने में जुटा रहता है। ये ऐसे शातिर लोग हैं, जो पिछले 70 साल से आपको मूर्ख बना रहे हैं और आप भी इतने समझदार हैं कि बन रहे हैं।
कोई भी व्यक्ति, संस्था, राजनीतिक दल या सरकार, जो आपके आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक विकास के लिए दिल से काम करे, उसे मेरा पूरा समर्थन रहेगा। जब एक प्रधानमंत्री ने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है, तो मैंने इस बात का विरोध नहीं किया कि उसने ऐसा क्यों कहा, बल्कि मैंने इस बात का विरोध किया कि अगर तुम ऐसा कहते हो, तो करते क्यों नहीं? साठ साल से तुमने इन्हें गंदगी, गरीबी और ज़हालत के जहन्नुम में क्यों ढकेल रखा है? सच्चर कमीशन की रिपोर्ट तुमने ठंडे बस्ते में क्यों डाल दी?

इसी तरह, जब एक दूसरे प्रधानमंत्री ने बिहार चुनाव के दौरान भीड़ से कहा कि आपके आरक्षण को “दूसरे सम्प्रदाय” को देने की कोशिश की जा रही है, तो मैंने बिना एक भी मिनट देर किए हुए सवाल खड़ा किया कि देश के प्रधानमंत्री के लिए “पहला संप्रदाय” कौन है और “दूसरा संप्रदाय” कौन है? इसलिए मुझे तो नहीं लगता कि किसी भी दृष्टि से मैं आपका भाई नहीं हूं या आप लोग मेरे भाई-बहन नहीं हैं।

आप लोगों को जो ग़लतफहमी मेरे बारे में होती रहती है, उसकी वजह यह है कि आपके ठेकेदार आम ग़रीब मुसलमानों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े मसले उठाने की बजाय आतंकवादियों (अफज़ल गुरु, याकूब मेमन, बुरहान वानी, इशरत जहां इत्यादि), अपराधियों (सोहराबुद्दीन, शहाबुद्दीन इत्यादि), देशद्रोहियों (जेएनयू), अलगाववादियों और पत्थरबाज़ों (कश्मीर) इत्यादि को आपके रोल मॉडल की तरह पेश करते हैं और देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का ख़तरनाक खेल खेलते हैं। आपको खुश करने के लिए मैं इन लोगों का समर्थन नहीं कर सकता।

जहां तक बकरीद की शुभकामनाएं नहीं देने का सवाल है, तो खुलकर कहूंगा, कि मैंने आपको बकरीद की शुभकामनाएं जान-बूझकर नहीं दीं। इसलिए नहीं दी, क्योंकि मैं धर्म से नहीं, इंसानियत से गाइड होता हूं। मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि धर्म और त्योहारों को लेकर भीड़ की भावनाएं क्या हैं। मुझे इस बात से फ़र्क पड़ता है कि अलग-अलग परंपराएं इंसानियत के पैमाने पर कितनी खरी उतरती हैं।

मेरी राय में बकरीद का त्योहार बुराई, हिंसा, धर्मांधता और कट्टरता का त्योहार बन गया है और आज की तारीख में यह इंसानियत के पैमाने पर खरा नहीं उतरता। इसमें धर्मांध और चटोर लोग अल्लाह के नाम पर बेगुनाह जानवरों की बेतहाशा बलि देते हैं। और मैं पहले भी कई बार कह चुका हूं कि जिस ईश्वर या अल्लाह ने हमें बनाया, उसी ने उन मासूम पशु-पक्षियों को भी बनाया है। उनकी कुर्बानी देकर हम पुण्य के नहीं, पाप के भागी बनते हैं। उनकी कुर्बानी देकर हमें जन्नत नहीं, जहन्नुम मिलेगी। उनकी कुर्बानी देकर हमें हूरें नहीं, कोड़े मिलेंगे।

मैं हिन्दुओं में भी नवरात्र और कुछ अन्य पर्व-त्योहारों के दौरान मासूम जानवरों की बलि का विरोध करता रहा हूं। इस लिहाज से मुझे अपने जैन भाई-बहन बहुत अच्छे लगते हैं और मैं उन्हें सार्वजनिक रूप से सलाम भेजता हूं। जहां कहीं भी, जिस भी धर्म में, जिस भी पर्व-त्योहार में, बेगुनाहों और मासूमों को मारा जाएगा, मैं विरोध में ही खड़ा रहूंगा। चूंकि बकरों, भैंसों और ऊंटों इत्यादि जानवरों को काटना बकरीद का मूल चरित्र बन गया है, इसलिए अब मैं इस त्योहार की शुभकामनाएं आपको नहीं दे सकता। इस त्योहार पर आपको शुभकामनाएं देना, मतलब मासूम जीवों की हत्या का समर्थन करना, मतलब मानवता का विरोध करना।

आप लोगों को ख़ुद सोचना चाहिए कि बकरीद के दिन ढाका की सड़कों पर मासूम जानवरों के ख़ून की जो नदियां बहीं, वह हमारी इंसानियत को शर्मसार करती है कि नहीं? दुनिया के अन्य शहरों में सड़कों तक ख़ून भले न पहुंचा हो, लेकिन इस दिन जितना ख़ून बहाया जाता है, वह इंसानियत का ख़ून नहीं तो और क्या है? माफ़ कीजिए, मैं इंसानियत का ख़ून बहाने के लिए आपको शुभकामनाएं नहीं दे सकता।

इसी तरह, बकरीद की आड़ में धर्मांध और कट्टर लोग किस हद तक गिर सकते हैं, इसका अंदाज़ा ISIS के उस वीडियो से लगाइए, जिसमें उसने मीट हुक से लटकाकर कई आदमियों का भी गला रेत डाला। साफ़ है कि बकरीद का त्योहार आपके लिए बदनामियों का सबब बनता जा रहा है।

मैं तो, बकरीद के पीछे जो कहानी बताई जाती है, उसे भी आज तक हजम नहीं कर पाया। बताया जाता है कि हजरत इब्राहिम से अल्लाह ने अपनी सबसे प्यारी चीज़ की कुर्बानी मांगी और इसके बाद उन्होंने अपने बेटे की बलि देने का फैसला कर लिया। जब वे बलि देने के लिए जा रहे थे, तब रास्ते में जिस व्यक्ति ने उन्हें ऐसा करने से रोका, उसे “शैतान” घोषित कर दिया गया।

जब भी मैं यह कहानी सुनता हूं, मेरी पूरी संवेदना ही हिल जाती है। जो अल्लाह के नाम पर मासूम बच्चे की बलि देने का इरादा कर ले, वह महान? और जो मासूम बच्चों की बलि के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करे, वह शैतान? यह पूरी कहानी ही इंसानियत-विरोधी है। आज की तारीख़ में अगर कोई व्यक्ति हजरत इब्राहिम की तरह अपने बच्चे की बलि देने की तैयारी करे, तो उसे जेल मिलेगी, सज़ा मिलेगी, अपराधी माना जाएगा। इसी तरह, धर्म ने जिसे “शैतान” घोषित कर दिया, आज उसे इंसानियत का देवता, मानवाधिकार कार्यकर्ता, बाल-अधिकार कार्यकर्ता, मानवतावादी इत्यादि कहकर सम्मानित किया जाएगा।

इसलिए, धर्म हमारे जीवन में उतना ही सही है, जब तक हमें वह सही रास्ता दिखाए। जब वह हमें भटकाने लगे, तो उसमें सुधार की ज़रूरत हो जाती है। एक अधर्म-आधारित कहानी को धर्म का मूल बनाकर मासूम जीवों पर ज़ुल्म ढाने और उन्मादी व्यवहार करने को मैं न्याय-सम्मत नहीं मानता। इसलिए, मेरी कामना है कि बकरीद का त्योहार बुरी भावनाओं, बुरे विचारों, नफ़रत और हिंसा की कुर्बानी देने का त्योहार बने, न कि मासूम जीवों की हत्या की पिशाच-लीला बनकर रह जाए।

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