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दाल सस्ती होने से सदमे में कांग्रेस, ये है नई रणनीति

बिग बाजार में अरहर की दाल 105 रुपये किलो बिक रही है। कई जगहों पर लोकल दुकानों पर दाम 80 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुका है।

अरहर की दाल के दाम 2014 के बराबर होने के साथ ही महंगाई का मुद्दा विपक्ष के हाथ से छिनता दिख रहा है। हालत यह है कि यूपी में अपनी पदयात्रा में राहुल गांधी महंगाई के मुद्दे का जिक्र तक नहीं कर रहे हैं। क्योंकि ज्यादातर जरूरी चीजों के दाम 2014 के लेवल या उससे भी नीचे जा चुके हैं। अरहर दाल की फुटकर कीमत पिछले एक हफ्ते से 100 रुपये के आसपास चल रही है। ऐसे में कांग्रेस समेत बाकी विपक्ष के हाथ से एक बड़ा चुनावी मुद्दा छिन गया है। यूपी चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी सरकार के लिए यह बड़े राहत की बात है, लेकिन सरकार का डर अभी खत्म नहीं हुआ है। यह आशंका जताई जा रही है कि यूपी चुनाव से ठीक पहले खाने-पीने के किसी एक सामान के दाम में भारी उछाल की कोशिश करवाई जा सकती है। ऐसी खबरें हैं कि कांग्रेस के रणनीतिकार इसके लिए देश के बड़े सट्टेबाजों और जमाखोरों की मदद भी ले सकते हैं। देश में भले ही बीजेपी की सरकार है, लेकिन आज भी अफसरशाही और सरकारी एजेंसियों में ऐसे लोगों की भरमार है जो कांग्रेस के इशारे पर काम करते हैं।

मोदी सरकार के डर की क्या है वजह?

वित्त मंत्री अरुण जेटली खुद जरूरी चीजों की बाजार कीमत पर नियमित रूप से रिपोर्ट मंगा रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में उन्होंने इस बारे में कई बैठकें भी की हैं। बुधवार को इस बारे में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह और खाद्य आपूर्ति मंत्री रामविलास पासवान के साथ उनकी बैठक होनी है। जिसमें ज्यादा से ज्यादा दाल खरीदकर बफर स्टॉक बनाने पर बातचीत होनी है। ऐसी रिपोर्ट्स लगातार सरकार को मिल रही हैं कि बंपर पैदावार के बावजूद जमाखोर सक्रिय हैं। ऐसे में सरकार चाहती है कि एजेंसियां सीधे किसान से दाल की पैदावार खरीदें। यह डर है कि कुछ मंडी समितियां और जमाखोर पैदावार का बड़ा हिस्सा खुद हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं, जिससे वो 3-4 महीने के अंदर बाजार में फिर से नकली कमी पैदाकर मुनाफा कमा सकें। यह भी संकेत मिल रहे हैं कि इन सबके पीछे कांग्रेस पार्टी के कुछ बड़े नेता शामिल हैं।

किसानों को ज्यादा बोनस पर विचार

देखा जाता है कि जमाखोर सीधे किसानों के पास जाकर उन्हें सरकारी दाम से ज्यादा कीमत देकर पैदावार खरीद लेते हैं। ऐसे में सरकार दाल किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर बोनस देने का भी ऑफर कर सकती है। साथ ही दाल खरीदने वाली गैर-सरकारी संस्थाओं पर भी नज़र रखी जाएगी। खरीफ की दाल की उपज इस साल के आखिर तक बाजार में आने की उम्मीद है। सरकार को यह भी डर है कि अगर सरकारी एजेंसियां दाल की खरीद में नाकाम रहीं तो इससे कई जगहों पर किसानों को पैदावार को औने-पौने दाम पर बेचने को भी मजबूर होना पड़ सकता है।

मूंग भी एमएसपी पर खरीदी जाएगी

सरकार ने एक बड़ा फैसला यह किया है कि पहली बार मूंग की दाल भी एमएसपी पर सीधे किसानों से खरीदी जाएगी। इसकी खरीद शुरू भी हो चुकी है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में इसकी सबसे ज्यादा पैदावार होती है। 2016 के खरीफ सीजन के लिए मूंग का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य 4,850 रुपये है। इस पर सरकार 425 रुपये बोनस दे रही है। मतलब किसान को उसकी पैदावार पर 5,275 प्रति क्‍विंटल का रेट मिलेगा। इस भाव को 1 अक्‍टूबर से लागू होना था, लेकिन इसे 1 सितंबर से ही लागू कर दिया गया है। क्योंकि मूंग की नई उपज बाजार में आनी शुरू हो चुकी है। केंद्र सरकार ने इसी सीजन में 2 करोड़ टन दाल का बफर स्टॉक बनाने का लक्ष्य रखा है।

आलू, प्याज, चीनी, दूध पर भी नज़र

दालों के अलावा इन चीजों की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी कराने की कोशिश हो सकती है। आम तौर पर सट्टेबाजों की मदद से यह काम किया जाता है। ऐसी अफवाहें उड़ा दी जाती हैं कि आने वाले दिन में फलां चीज के दाम बढ़ सकते हैं। ऐसे में जमाखोर और यहां तक कि आम लोग भी उस चीज को ज्यादा खरीदकर घर में स्टोर करने लगते हैं। इससे बाजार में एक नकली मांग पैदा होती है, जिससे कीमतें अपने आप बढ़ जाती हैं। सरकार के आगे यह चुनौती है कि कैसे इस तरह की कोशिशों से निपटा जाए। क्योंकि एक बार जब दाम बढ़ जाते हैं तो उन्हें वापस पुराने लेवल पर लाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। 1999 में दिल्ली में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कुछ इसी तरह से प्याज की कीमतों में उछाल लाया गया था। उस वक्त कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद कांग्रेस के प्रभाव वाली एजेंसियों ने विदेशों में प्याज बेचना जारी रखा था, जिससे देश में इसकी कमी पैदा हो गई थी। उम्मीद है उस पुरानी साजिश को सरकार आगे भी याद रखेगी।

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