ऑटोवाले शुक्लाजी की कहानी दिल को छू जाएगी!

इंसानियत से बढ़कर कोई धर्म नहीं है, ये बात मुंबई के एक ऑटोवाले ने बड़ी आसानी से दुनिया को समझा दी। रमीज़ शेख नाम के एक मुस्लिम युवक ने अपने साथ हुई एक घटना फेसबुक पर शेयर की है, जिसे जिसने भी पढ़ा वो वाह-वाह कर उठा। रमीज़ ने पूरी घटना अंग्रेजी में लिखी है। हम उसका हिंदी अनुवाद आपके लिए दे रहे हैं।

26 अगस्त 2016, दोपहर 1:40 बजे: मैं हड़बड़ी में ऑफिस से ऑटो पकड़ने के लिए निकला, मुझे जुमे की नमाज के लिए पहुंचने में देरी हो रही थी। ऑटो में बैठते ही याद आया कि मैं अपना पर्स ऑफिस में ही भूल गया। मैंने ऑटोवाले से रिक्वेस्ट किया कि “प्लीज आप मुझे मस्जिद तक छोड़ दें और 15-20 मिनट बाहर इंतजार कर लें। मुझे वापस भी आना है। वापस आकर मैं जितना किराया हो रहा है उससे कुछ ज्यादा दे दूंगा।” मैंने गौर किया कि ऑटो में गणपति उत्सव के स्टिकर्स चिपके हुए थे। ऑटोवाले ने जवाब दिया “आप भगवान के काम के लिए जा रहे हो, आप टेंशन मत लो, मैं छोड़ देता हूं आपको। लेकिन मैं इंतजार नहीं कर पाऊंगा। मुझे आगे जाना होगा।” मैंने उसका शुक्रिया अदा किया और ऑटो में बैठ गया। (अगर ऐसा नहीं करता तो नमाज़ में नहीं पहुंच पाता।)

मस्जिद के बाहर मुझे उतारने के बाद उस ऑटोवाले ने जो किया उसकी मैंने उम्मीद तक नहीं की थी। उसने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और मुझे देने लगा, ताकि मैं नमाज़ के बाद अपने दफ्तर वापस जा सकूं। उसने कहा कि देखिए मैं आपको वापस छोड़ नहीं पा रहा हूं, इसलिए कुछ पैसे रख लीजिए ताकि आप वापस अपनी जगह पर पहुंच सकें। वो लगातार कह रहा था कि पैसे लेने में शरमाइये मत। अब मैं उसे शुक्रिया भी नहीं कह पा रहा था।

मिलिए शुक्लाजी से (जिसकी तस्वीर मैंने इस पोस्ट के साथ लगाई है)… कई लोगों के लिए यह चौंकाने वाली बात होगी। एक गणपति भक्त, ऑटोवाला जिसके सिर पर लंबा तिलक लगा हुआ है वो चाहता है कि दूसरे मजहब का इंसान तसल्ली से अपने अपने भगवान के आगे प्रार्थना कर सके।

फेसबुक पर हो गई सवालों की बौछार!

रमीज़ शेख की इस फेसबुक पोस्ट को यह खबर लिखे जाने तक 7000 से ज्यादा लोग शेयर कर चुके थे। अलग-अलग जगहों पर कॉपी को जोड़ें तो लाखों लोग इस पोस्ट को पढ़ चुके हैं। उन्होंने अपनी इसी पोस्ट के साथ इस बात के लिए लोगों का शुक्रिया भी अदा किया है। कई लोगों ने रमीज़ से पूछा कि क्या उन्होंने वापसी के लिए पैसे लिए? क्योंकि दूसरा ऑटो अपने दफ्तर के बाहर रुकवाकर उसे पैसे दिया जा सकता था। इन सवालों के जवाब में रमीज ने बताया है कि “मैंने पैसे नहीं लिए। लेकिन वो बात इतनी अहम नहीं है। ज्यादा बड़ी बात यह है कि शुक्लाजी ने जिस तरह से पैसे ऑफर किए उस बात का कोई मोल नहीं है।”

रमीज़ शेख ने बताया है कि “मैंने ऑटोवाले शुक्लाजी का मोबाइल नंबर ले लिया था और शाम को फेसबुक पेज लिखने से पहले मैंने उनको किराया चुका दिया। हालांकि वो पैसे लेने में आनाकानी करते रहे।” शाम को जब रमीज़ ने उन्हें पैसे देने के लिए फोन किया तो वो कुछ इस तरह बर्ताव कर रहे थे कि भई इतना परेशान होने की जरूरत क्या है। आपको बिना पैसे लिए कहीं छोड़ दिया तो इसमें इतनी बड़ी बात क्या है? रमीज़ का कहना है कि मुझे यही लगता रहा कि उनकी दरियादिली के मुकाबले जो पैसे दिए हैं वो बेहद कम हैं। इसलिए मैंने ये फेसबुक पोस्ट लिखने का फैसला किया। दूसरी वजह यह भी है कि सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा नफरत उगली जाती है। इसलिए जरूरी है कि ऐसी पॉजिटिव बातें भी शेयर की जाएं।
(रमीज़ शेख के फेसबुक पेज से साभार)

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