केजरीवाल के ‘विज्ञापन घोटाले’ का पूरा कच्चा चिट्ठा

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार पर करोड़ों के विज्ञापन घोटाले के आरोप लग रहे हैं। कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (सीएजी) के हिसाब-किताब में यह बात सामने आई है कि सरकार की इमेज चमकाने के नाम पर जनता के पैसे पानी की तरह बहाए गए। इसके अलावा अपने लोगों को ठेकों के जरिए फायदा पहुंचाया गया। दिल्ली के एकाउंटेंट जनरल ऑफिस की तरफ से भेजी गई रिपोर्टों में इस बात के संकेत मिल रहे हैं। इस साल 31 मार्च तक कुल 60 करोड़ रुपये से अधिक की बर्बादी की जानकारी सामने आई है। कुछ अंग्रेजी चैनलों ने यह खबर जरूर दिखाई है, लेकिन सारी जानकारी सार्वजनिक होने के बावजूद हिंदी अखबार और चैनल इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं। क्योंकि इस तथाकथित घोटाले का बड़ा हिस्सा उन्हें भी पहुंचा है।

‘विज्ञापन घोटाले’ की अहम बातें

  • दिल्ली सरकार ने 21.62 करोड़ रुपये सत्ताधारी पार्टी (AAP) की इमेज बनाने के लिए गलत तरीके से खर्च किए।
  • दिल्ली के टैक्स पेयर्स के कुल 18.39 करोड़ रुपये दूसरे राज्यों में विज्ञापनों पर खर्च कर दिए गए।
  • दिल्ली सरकार के विज्ञापनों में कई ऐसी बातें भी रहीं, जो इस बारे में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का खुला उल्लंघन थीं।
  • कई ऐसे विज्ञापन भी जारी किए गए जो एक सरकार के लिए बेतुके हैं। ऐसे विज्ञापनों पर 2.15 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
  • शब्दार्थ नाम की प्राइवेट एड एजेंसी को 3.63 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। (आरोप है कि यह विज्ञापन एजेंसी डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के साले की है।)

सरकारी विज्ञापनों में पार्टी का प्रचार

ऑडिटर ने ये सारी जानकारी केजरीवाल सरकार को मई-जून में भेज दी थीं। सीएजी ने भी विज्ञापनों पर खर्च के हिसाब-किताब में कई गड़बड़ियां पाई हैं। रिपोर्ट में एक जगह कहा गया है कि सरकारी विज्ञापनों और 2-2 पर छपवाए गए एडवर्टोरियल में बार-बार आम आदमी पार्टी का जिक्र किया गया है। इसके अलावा सरकार की तरफ से कई झूठे दावे भी किए गए हैं। यह दोनों ही सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइंस के खिलाफ है।

सरकार से ज्यादा व्यक्ति पर फोकस

एक जगह लिखा गया है कि सरकार के 100 दिन पर बिजली के बिलों में कटौती के बारे में 45 सेकेंड का टीवी विज्ञापन दिया गया। बाद में इसमें मुख्यमंत्री केजरीवाल और डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के बयान शामिल कर दिए गए जिससे विज्ञापन 2 मिनट का हो गया। विज्ञापन में कही गई अप्रांसगिक और कानूनी तौर पर गलत बातों को हटा दिया गया होता तो ये विज्ञापन इसके मुकाबले काफी छोटा होता। इस कैंपेन पर 1.74 करोड़ रुपये खर्च हुए जो सरकार की नीतियों से ज्यादा एक व्यक्ति (अरविंद केजरीवाल) को महान बताने के मकसद से बनाए गए थे।

सरकार के 100 दिन पर जारी विज्ञापनों में बड़े पैमाने पर धांधली के संकेत मिल रहे हैं। इसके तहत 14 राज्यों के 26 अखबारों में विज्ञापन परिशिष्ठ छपवाए गए। इसके अलावा 9 नेशनल अखबारों को 15 करोड़ और 11 राज्यों के क्षेत्रीय अखबारों को 6.54 करोड़ रुपये के विज्ञापन बांटे गए। इन विज्ञापनों में ‘दिल्ली सरकार’ की जगह ‘आम आदमी पार्टी की सरकार’ शब्द का इस्तेमाल किया गया। जो कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का खुला उल्लंघन है।

दिल्ली के बाहर विज्ञापनों पर सवाल

सीएजी ने इस बात को भी नोटिस किया है कि इस साल 14 से 17 फरवरी के बीच देश के अलग-अलग शहरों में 8 पेज के रंगीन विज्ञापन परिशिष्ठ छपवाए गए। इस पर सरकारी खजाने से 14.42 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसमें से दिल्ली के अखबारों को दिए गए विज्ञापन सिर्फ 2.49 करोड़ रुपये के थे, बाकी 11.93 करोड़ रुपये देश के उन शहरों के अखबारों को दिए गए, जहां के लोगों को दिल्ली सरकार की उपलब्धियों या योजनाओं के बारे में बताने की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए।

नियमों के मुताबिक दिल्ली सरकार के विज्ञापन दिल्ली के लोगों के लिए होने चाहिए। लेकिन केजरीवाल सरकार ने केरल, पश्चिम बंगाल, गुजरात, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और गोवा तक के अखबारों में विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये बांटे। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में इन विज्ञापनों पर 6.5 करोड़ रुपये खर्च का हिसाब लगाया है। चूंकि यह पैसा दिल्ली के टैक्स पेयर्स का होता है, इसलिए यह दिल्ली में खर्च होना चाहिए।

विज्ञापनों में ‘राजनीति’ पर खर्च क्यों?

केजरीवाल सरकार ने केंद्र सरकार के खिलाफ विज्ञापनों पर भी मोटी रकम खर्च की है। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक यह खर्च भी गलत मद में माना जाएगा। 2.15 करोड़ रुपये के होर्डिंग दिल्ली भर में लगवाए गए जिन पर लिखा गया था ‘वो परेशान करते रहे, हम काम करते रहे’ और ‘भ्रष्टाचारियों की साज़िश के बावजूद, केजरीवाल सरकार ने रचा इतिहास’। ये दोनों बातें सरकार की नीतियों, योजनाओं या उपलब्धियों के पैमाने पर सही नहीं पाई गई हैं। क्योंकि यह किसी सरकार की संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी के दायरे में नहीं आता।

विज्ञापन घोटाले की अहम कड़ी ‘शब्दार्थ’!

ऑडिट के मुताबिक इस विज्ञापन एजेंसी को 3.63 करोड़ रुपये देने का कोई तुक नहीं बनता। क्योंकि इस काम के लिए दिल्ली में पहले से ही डायरेक्टरेट ऑफ इन्फॉर्मेशन एंड पब्लिसिटी (डीआईपी) पहले से है। यह सरकारी एजेंसी है जो सरकार के विज्ञापनों को जारी करती है। ऐसे में किसी निजी एजेंसी को करोड़ों रुपये का भुगतान सीधे-सीधे भ्रष्टाचार के दायरे में आता है। खास तौर से तब जब यह आरोप लग रहे हैं कि यह एजेंसी डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के साले की है।

इस सारी धांधली के सामने आने पर आम आदमी पार्टी और केजरीवाल सरकार के होश उड़े हुए हैं। क्योंकि सीएजी ने फिजूलखर्ची और आर्थिक अनियमितता के दस्तावेजी सबूत भी पेश किए हैं। पार्टी फिलहाल बचाव में सिर्फ यह कह रही है कि उसे ऐसी किसी रिपोर्ट की जानकारी नहीं है और ऐसी कोई रिपोर्ट विधानसभा के आगे नहीं रखी गई है।

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