मी लॉर्ड… कब तक जज के बेटे जज बनते रहेंगे?

जिस तरह से नेता का बेटा नेता बनता है, क्या उसी तरह हमारे देश में जज का बेटा जज बनता है? यह सवाल पिछले कुछ समय से लगातार उठ रहा है। न्यायपालिका में भाई-भतीजावाद और कुछ जगहों पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच यह सवाल लगातार बढ़ता जा रहा है। दरअसल चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने 15 अगस्त के मौके पर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोल दिया। उन्होंने देश के प्रधानमंत्री के भाषण पर निराशा जताते हुए यहां तक कह डाला कि नए जजों की भर्ती के काम में केंद्र सरकार अड़ंगा लगा रही है। लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। दरअसल जिन नए जजों की भर्ती हो रही है वो योग्यता के आधार पर न होकर भाई-भतीजावाद और रिश्तेदारी के आधार पर है। केंद्र सरकार इस सिस्टम में बदलाव चाहती है।

खुद वकीलों ने उठाया सिस्टम पर सवाल

देश में अभी हायर ज्यूडिशियरी में जजों की नियुक्ति का कॉलेजियम सिस्टम लागू है। जिसके तहत जजों की ही एक टीम नए जजों को नियुक्त करती है। खुद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इस कोलेजियम के मुखिया होते हैं। जज बनने  के लिए न्यूनतम योग्यता का कोई साफ पैमाना नहीं है। इस सिस्टम में आम लोगों के पास बहुत कम मौके होते हैं कि वो इस पद तक पहुंच सकें। नेशनल लॉयर्स कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी एंड रिफॉर्म्स नाम की वकीलों की संस्था ने एक प्रेस रिलीज जारी करके आरोप लगाया है कि 90 के दशक में कॉलेजियम सिस्टम लागू होने के बाद से नियुक्त 50 फीसदी जज या तो रिश्तेदार या फिर जान-पहचान वाले जूनियर या सीनियर वकील थे।

आरोप लगाया गया है कि जिन प्रतिभाशाली वकीलों का कोई गॉडफादर नहीं है उनके लिए हायर ज्यूडिशियरी में जज बन पाना लगभग असंभव है। संस्था ने इस बारे में चीफ जस्टिस, प्रधानमंत्री और कानून मंत्री तक को अपनी सिफारिशें भेजी हैं। उनका कहना है कि जजों की भर्ती के लिए भी खुली प्रतियोगिता परीक्षा होनी चाहिए, ताकि बेस्ट टैलेंट को चुना जा सके और पक्षपात की गुंजाइश न रहे। इसके बावजूद चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने सीधे प्रधानमंत्री पर आरोप लगाकर न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर दी है। देखिए क्या कहा था चीफ जस्टिस ने।

सवालों में न्यायपालिका का मौजूदा सिस्टम

चीफ जस्टिस के बयान के बाद सोशल मीडिया पर कुछ सवाल उठाए जा रहे हैं। उनमें से कुछ हम आपके सामने रख रहे हैं।

  • देश के प्रधानमंत्री को तो जनता चुनती है और वो उससे कामों का हिसाब लेती है मगर जजों का हिसाब लेने वाला कोई नहीं।
  • पीएम बिना किसी छुट्टी को लगातार काम करते हैं मगर जज लंबी-लंबी छुट्टियां लेते हैं।
  • कोर्ट के किसी फैसले पर कोई उंगली उठा दे तो उसे अवमानना माना जाता है। जैसे लोकतंत्र नहीं अंग्रजों का शासन है।
  • उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन रद्द करने के फैसले भी सवालों के दायरे में हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि दबाव बनाने की नीयत से ऐसा किया गया।
  • राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल बार-बार चीफ जस्टिस का हवाला दे रहे हैं उससे तो दाल में कुछ काला ही नजर आ रहा है।
  • केजरीवाल का भी सीएम के अधिकार वाला मामला सुप्रीम कोर्ट में जाने वाला है। कहीं इसके पीछे यही रणनीति तो नहीं है?

कौन हैं जस्टिस टीएस ठाकुर?

जस्टिस तीरथ सिंह ठाकुर जम्मू कश्मीर के रहने वाले हैं। 2009 में वो सुप्रीम कोर्ट के जज बने। उनके पिता देवी दास ठाकुर असम के गवर्नर और जम्मू कश्मीर के उप मुख्यमंत्री रहे थे। राजनीति में सफल करियर के अलावा देवीदास ठाकुर जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट के जज भी रहे। एक योग्य पिता की योग्य संतान के रूप में जस्टिस टीएस ठाकुर ने फिलहाल भारत के 43वें चीफ जस्टिस का कार्यभार संभाल रखा है।

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