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मीम-भीम एकता पर एक मुस्लिम महिला के चंद सवाल

मुझे बड़ी खुशी होती है उन मुसलमानों को देख कर जो आज कल दलितों की चिंता में दुबले हुऐ जा रहे हैं। जब ये दलितों के लिए ब्राह्मणों से रोटी-बेटी का हक माँगते हैं तो गर्व से भर जाती हूँ कि कितने नेकदिल बंदे हैं। इनकी नेकदिली देख के मन ही मन इतनी खुशी मिलती हैं कि बता नहीं सकती। तो मेरे नेकदिल मुसलमान भाइयों क्या जात-पात और फिरके का भेद इस्लाम में भी नहीं ख़त्म होना चाहिए? तो भैया कसंबी के लिए सैयद से, माहीफरोश के लिए शेख से और तुंतिया के लिए मिर्ज़ा से रोटी-बेटी का हक कब माँग रहे हो? अच्छा छोड़ो कम से कम शियाओं को मुसलमान ही मान लो।

शर्म करो ड्रामेबाजों, पहले अपने गिरेहबान में झाँक के देखो कितने छेद हैं। पहले अपनों को तो हक दिलवा दो ऐ नेकदिल मुसलमानों। हिंदुओं में हजारों जातियाँ मौजूद हैं मगर धर्म के आधार पर लड़ते देखा या सुना हैं उन्हें? सिखों में अकाली और निरंकारी कभी एक दूसरे के खून के प्यासे दिखे हैं तुम्हें?दिगंबर जैन और श्वेतांबर जैन दोनों समुदायों में बहुत ज़बरदस्त मतभेद हैं, दिगंबर मुनि नंगे रहते हैं और श्वेताम्बर सिर से पैर तक श्वेत वस्त्र धारण करते हैं। मगर क्या मजाल है कि अपने प्रवचनों के दौरान एक दूसरे की बुराई करें या उन्हें गालियों से नवाज़ें। ईसाइयों में रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट फ़िरकों के बीच शुरू में कड़वाहट रही मगर कभी उन्हें एक-दूसरे से ये कहते सुना हैं कि फलाँ फिरका ईसाई नहीं है।

पूरी दुनिया में सिर्फ़ मुसलमान ही ऐसी बेवकूफ कौम है जिसके पास लड़ने के हजार बहाने हैं। अगर अलग-अलग फिरके के एक एक मुसलमान को छांटकर एक कमरे में बंद कर दिया जाए। जीने की तमाम सहूलियतें मुहैय्या कराके और एक हफ्ते बाद कमरा खोल कर देखें तो एक भी जिंदा नहीं मिलेगा। आपस में ही लड़कर मर जाएंगे। “तूने अल्लाह पाक को अल्लाह मियाँ कहा ले मर!… तूने दाढ़ी के साथ मूंछें भी रखी हैं ले मर!… तूने पजामे का नाड़ा नाभि के नीचे से बाँधा ले मर!….” अपना घर संभलता नहीं चले हैं दूसरे के घर की आग बुझाने! आखिर अल्लाह तुम पागलों पर अपनी रहमतें क्यों नाज़िल फ़रमाए??

(यह लेख जोया मंसूरी के फेसबुक पेज से साभार है।)

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