‘असहिष्णुता’ बढ़ने के पीछे असली कारण ये तो नहीं?

नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद से अब तक 10 लाख से ज्यादा एनजीओ के विदेशों से फंड लेने पर पाबंदी लगा दी है। ये पाबंदी पूरी जांच पड़ताल के बाद लगाई गई हैं। इन पर हेराफेरी और विदेशों से पैसा लेकर भारत में गैर-कानूनी गतिविधियां चलाने जैसे आरोप साबित हुए हैं। सरकार ने इसकी जानकारी लोकसभा में दी है। इसके मुताबिक पिछले 4 साल में कुल 14 लाख के करीब NGO पर विदेशी फंड लेने पर पाबंदी लगी, इसमें से 10 लाख से भी ज्यादा पाबंदियां अकेले पिछले साल लगाई गईं। दरअसल पिछले साल ये वही वक्त था जब देश में अचानक असहिष्णुता फैलने का हल्ला मचा था। तब भी यह बात सामने आई थी कि जिन NGO का पैसा बंद हुआ है उन्होंने ये सारा तमाशा मोदी सरकार पर दबाव बनाने की नीयत से खड़ा किया था।

एनजीओ के नाम पर चल रहे थे विदेशी धंधे!

दरअसल इनमें कई NGO सिर्फ कागजों में चलते थे और इन्हें विदेशों से लाखों का फंड मिलता था। इन पैसों को ज्यादातर देश-विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जाता था। देश में कहीं भी विकास की कोई परियोजना शुरू होते ही ये तथाकथित समाजसेवी संस्थाएं वहां पहुंच जाती थीं और लोगों को भड़काते थे कि इस परियोजना से वो बर्बाद हो जाएंगे। कुडनकुलम परमाणु बिजली संयंत्र के खिलाफ भड़के आंदोलन में तो यह आरोप तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी लगाया था। विदेशी कंपनियां अपने फायदे के लिए इन NGO को इस्तेमाल करती रही हैं। ऐसा लगता है कि इनका धंधा लगभग पूरी तरह बंद करा दिया गया है। इस साल अब तक सिर्फ एक संस्था की विदेशी फंडिंग बंद की गई है। सरकार ने इन एनजीओ के बहीखातों की FCRA एक्ट के तहत जांच करवाई थी, जिसमें बड़े पैमाने पर धांधली सामने आई थी। अगर सबको जोड़ें तो ये घोटाला अरबों रुपये का बैठेगा। सरकार ने पारदर्शिता बनाए रखने की नीयत से पूरी लिस्ट www.fcraonline.nic.in वेबसाइट पर डाली है।

एनजीओ के धंधे में थे कई बड़ी-बड़ी हस्तियां

इसी साल मई में सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह के एनजीओ लॉयर्स कलेक्टिव के विदेशी फंड हासिल करने पर रोक लगी थी। इंदिरा जयसिंह पर एक्टिविज्म के नाम पर गैरकानूनी गतिविधियां चलाने के आरोप लगते रहे हैं। उन्हें FCRA के उल्लंघन का आरोपी ठहराया गया है। उनके अलावा तीस्ता सेतलवाड़, ग्रीनपीस जैसे एनजीओ की विदेशी फंडिंग में हेराफेरी पाई गई। कुछ एनजीओ बड़े पत्रकारों से भी जुड़े थे। ज्यादातर एनजीओ यह नहीं बता पाए कि उन्हें डोनेशन किसने दिया है और इस रकम को उन्होंने कहां पर किस मद में खर्च किया है। एनजीओ चाहें तो इसके खिलाफ कोर्ट जा सकते हैं, लेकिन बहुत कम ने ऐसा किया है। क्योंकि उन्हें लग रहा है कि कोर्ट कचहरी के चक्कर में उनकी देश-विरोधी करतूतों की पोल और भी खुल जाएगी। कई एनजीओ आदिवासी इलाकों में मानवाधिकार और पर्यावरण के नाम चल रहे थे। इनका काम सिर्फ यही होता था कि देश में शुरू हुए किसी भी विकास कार्य को विवादित बनाकर उसकी रफ्तार कम करवा दी जाए। इनमें से कुछ आदिवासियों और गरीब हिंदुओं को लालच देकर धर्म परिवर्तन जैसे काम भी करवाया करते थे।

खुफिया रिपोर्ट के बाद चला सरकार का डंडा

मोदी सरकार ने सत्ता में आने के फौरन बाद जुलाई में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) से मिली रिपोर्ट के आधार पर इन एनजीओ के फंड्स पर नजर रखनी शुरू की थी। इसके अलावा सरकार ने ग्रीन पीस इंटरनेशनल और क्लाइमेटवर्क्स फाउंडेशन पर भी नजर रखी। साथ ही सरकार ने उनके लिए किसी भी तरह का फंड लेने से पहले गृह मंत्रालय से मंजूरी लेना अनिवार्य कर दिया। आईबी की रिपोर्ट में बाकायदा ऑडिट करके बताया गया है कि बीते कुछ सालों में विकास परियोजनाओं को ठप करवाके इन एनजीओ ने देश की जीडीपी को 2 से 3 फीसदी तक नुकसान पहुंचाया है। देश में लगभग हर बड़े डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के खिलाफ किसी न किसी एनजीओ ने विरोध किया। तमिलनाडु में रूस की मदद से बन रहे कुडनकुलम परमाणु बिजली घर का काम इन्हीं एनजीओ वालों ने लगभग रुकवा ही दिया था। कहा जाता है कि इन एनजीओ को वो कंपनियां फंड कर रही थीं, जो रूस की कंपनी को ठेका दिए जाने से नाराज थीं। इस आंदोलन का नेता एसपी उदयकुमार बाद में आम आदमी पार्टी का सदस्य बन गया और उनके टिकट पर चुनाव भी लड़ा। एनजीओ के धंधे के ज्यादातर जमे-जमाए खिलाड़ी फिलहाल बेरोजगार हैं। कुछ उदयकुमार की तरह राजनीतिक भविष्य तलाश रहे हैं तो कुछ मोदी सरकार के खिलाफ असहिष्णुता की थ्योरी गढ़ने में जुटे हैं।

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