कॉमरेडो चीन में भी है एक कश्मीर, उस पर चुप क्यों?

कश्मीर समस्या पर जिहादियों को जिस तबके का सबसे ज्यादा साथ मिल रहा है वो हैं वामपंथी। जेएनयू के वामपंथी प्रोफेसरों से लेकर मीडिया में छिपे वामपंथियों ने खुलकर कश्मीर और पाकिस्तान के पक्ष में बोलना शुरू कर दिया है। लेकिन इनमें से कोई भी कभी चीन के उइघुर मुसलमानों लोगों के लिए कभी मुंह नहीं खोलता। इसका कारण कहीं यह तो नहीं कि देश के वामपंथियों को चीन से मिलने वाले ‘मोटा माल’ के साथ शर्त भी जुड़ी है कि उन्हें वही बातें करनी हैं जिससे भारत को नुकसान होता हो?

क्या है उइघुर मुसलमानों की समस्या?

पश्चिमी चीन के जिनजियांग प्रांत में करीब 2 करोड़ उइघुर लोगों की आबादी रहती है। ये लोग सुन्नी मुसलमान हैं। बहुसंख्यक हैं, इसलिए वो चीन से आजाद होकर ईस्ट तुर्केिस्तान देश की मांग कर रहे हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे दुनिया में कहीं भी मुस्लिम आबादी अधिक हो जाए तो वो अलग इस्लामी देश बनाने की कोशिश शुरू कर देते हैं। चीन ने इनके सभी धार्मिक और नागरिक अधिकार छीन रखे हैं। यहां तक कि इन्हें रमजान के महीने में भूखे रहने तक की इजाज़त नहीं है। इतना ही नहीं वो दाढ़ी भी नहीं उगा सकते। उइघुर परिवारों को अपने किसी रिश्तेदार को अपने घर ठहराने तक की आजादी नहीं है। जब भी कभी उइघुर लोग अपने अधिकारों के लिए मांग करते हैं, चीन की सेना उन्हें पूरी सख्ती के साथ कुचल देती है। दमन ऐसा कि बाकी दुनिया को इनकी खबर तक नहीं मिल पाती। चीन का कहना है कि उइघुर मुसलमान आतंकी गतिविधियों के साथ जुड़े हुए हैं।

उइघुर लोगों को सरकारी नौकरी नहीं

चीन में जिनजियांग इलाके में भी उइघुर लोगों को सरकारी नौकरी करने का अधिकार नहीं है। चीन सरकार इस इलाके में बाहर के लोगों को बसा रही है ताकि यहां पर मूल उइघुर लोगों को गरीब और पिछड़ा रखा जा सके। इसके अलावा उनके बिजनेस करने पर भी तरह-तरह की रोकटोक हैं।

Uighurs

उइघुरों को मुस्लिम देशों में पनाह नहीं

सबसे मजेदार बात यह है कि उइघुर मुसलमानों को दुनिया का कोई मुस्लिम देश पनाह नहीं देता। उइघुरों के कई नेता फ्रांस में रहकर अपनी कथित आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसी महीने की 11 तारीख को पेरिस में इन लोगों की एक बैठक भी हुई थी। इसकी अगुवाई निर्वासन में रह रही उइघुर कारोबारी राबिया कदीर ने की। इन उइघुर कार्यकर्ताओं पर अक्सर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगते रहे हैं।

सवाल यह है कि कश्मीर के मुद्दे पर भारत को दुनिया भर में बदनाम करने वाले वामपंथी बुद्धिजीवी आखिर उइघुर समस्या पर चीन के खिलाफ मुंह क्यों नहीं खोलते? इसके पीछे शायद बड़ी वजह उनका तनखैया होना है। ऐसे आरोप लगते रहे हैं वामपंथी विचारधारा वाले टीचरों और पत्रकारों को कुछ न कुछ ऐसा फायदा जरूर मिलता है जिसकी वजह से वो भारत में ही रहकर इसकी बुराई करते रहते हैं और चीन के सवालों पर चुप्पी साध लेते हैं। साथ ही सवाल भारतीय मुसलमानों से भी है जो फलस्तीन, म्यांमार और फ्रांस तक के मुसलमानों पर कथित अत्याचार के खिलाफ भारत में सड़कों पर तोड़फोड़ मचाते हैं, लेकिन कभी उइघुर मुसलमानों का नाम तक नहीं लेते।

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