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ऐसे हुई आतंकी बुरहान को ‘हीरो’ बनाने की कोशिश

आतंकवादी बुरहान वानी के समर्थन में मीडिया का एक तबका जिस तरह से खुलकर सामने आया है वो बिल्कुल भी हैरानी में डालने वाला नहीं है। देश के तमाम दिग्गज पत्रकारों और तथाकथित बड़े अंग्रेजी अखबारों ने जिस तरह से एक आतंकवादी के लिए हमदर्दी जताई और उसे हीरो साबित करने की कोशिश की उससे लोगों के मन में यह बात घर करने लगी है कि दाल में कुछ न कुछ काला तो जरूर है। हम उन पत्रकारों और अखबारों की लिस्ट लेकर आए हैं बुरहान वानी की मौत के बाद से मातम मना रहे हैं।

1. इंडियन एक्सप्रेस

कभी निडर पत्रकारिता के लिए पहचाना जाने वाला इंडियन एक्सप्रेस अखबार इन दिनों मानो देशविरोधी ताकतों का अड्डा बना हुआ है। इस अखबार ने अपने फेसबुक कवर पेज पर बुरहान की यह फोटो पोस्ट की। जाहिर है यह फोटो बुरहान के लिए सम्मान में लगाई गई। सवाल यह है कि भले ही एक आतंकवादी के समर्थन में इतने लोग जुटे हों, क्या मीडिया की कोई जिम्मेदारी नहीं है? इससे पहले भी जब याकूब मेमन को फांसी दी गई थी तो इस अखबार ने हेडलाइन छापी थी कि “And They Hanged Yakub”, मतलब उन्होंने याकूब को फांसी दे दी। इस हेडलाइन को पढ़कर ऐसा लगता है मानो यह किसी पाकिस्तानी अखबार में छपा हो। सवाल यह है कि इसमें किसे “They” कहा गया है? क्या इंडियन एक्सप्रेस इस देश का अखबार नहीं है?

IE FB Cover

IE Yakub

2. राजदीप सरदेसाई

बुरहान को मार गिराए जाने के फौरन बाद ही ये बेचैन हो उठे थे। उन्होंने बुरहान के नाम पर ट्विटर पर मानो झड़ी सी लगा दी। यहां तक तो ठीक था, लेकिन एक ट्वीट में उन्होंने बुरहान की तुलना शहीद भगत सिंह से कर डाली। आगे-पीछे उन्होंने बहुत कुछ ऐसा लिखने की कोशिश की, जिससे साबित हो सके कि वो एक आतंकवादी की वकालत नहीं कर रहे, लेकिन सच छिपाना आसान नहीं होता। सवाल यह है कि एक आतंकवादी की तुलना भगत सिंह से करके क्या साबित करने की कोशिश वो कर रहे हैं?

3. बरखा दत्त

अपनी प्रतिक्रिया में इन्होंने बैलेंस बनाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन चालाकी पकड़ में आ ही जाती है। पहले ट्वीट में ही बरखा दत्त ने बुरहान वानी को स्कूल हेडमास्टर का बेटा बताया। सोशल मीडिया पर लोगों को यह समझते देर नहीं लगी कि देश की ये तथाकथित बड़ी पत्रकार एक आतंकवादी के लिए मन में सॉफ्ट फीलिंग रखती हैं। बुरहान के पिता का एक इंटव्यू भी सामने आया है, जिसमें वो कह रहा है कि उसका बेटा जो कर रहा है बिल्कुल ठीक कर रहा है। जिस पिता का जिक्र करके बरखा दत्त ने सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की वो खुद ही एक कट्टरपंथी है, जो कहता है कि बेटा बाद में, इस्लाम पहले। सवाल यह है कि एक आतंकवादी को हेडमास्टर का बेटा बताकर वो क्या साबित करना चाहती थीं?

4. हिंदुस्तान टाइम्स

कांग्रेस पार्टी का करीबी माने जाने वाला यह अखबार बुरहान केस में शुरू से ही एक खास लाइन लेकर चल रहा है। उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर में हिंसा की आशंका जताकर पहले ही आग में घी डालने का काम किया था। इस अखबार ने ट्विटर पर बाकायदा पोल करवाया कि “क्या बुरहान की मौत से कश्मीर में माहौल खराब होगा?” सवाल यह है कि क्या किसी आतंकवादी को सिर्फ इसलिए न मारा जाए, क्योंकि उससे माहौल खराब हो जाएगा?

5. राहुल कंवल

इन्होंने एक बचकाना सा ट्वीट किया कि बेरोजगारी की वजह से कश्मीर में बुरहान जैसे लोग आतंकवादी बन जाते हैं। अगर बेरोजगारी की बात करें तो देश में कई दूसरे राज्यों के हालात कश्मीर से भी बुरे हैं। क्या उन जगहों के नौजवान हथियार उठा लेते हैं? इस सवाल का जवाब शायद राहुल कंवल को नहीं सूझा और उन्होंने चुप रहना ही बेहतर समझा। खैर इस बेवकूफी भरी राय के लिए सोशल मीडिया पर राहुल कंवल हंसी का पात्र बने रहे।

6. विक्रम चंद्रा

एनडीटीवी के विक्रम चंद्रा ने तो बुरहान वानी को बेकसूर ठहराने की कोशिश की। सवाल यह है कि जो आतंकवादी कश्मीर घाटी का मोस्ट वांटेड बन चुका हो, जिसके सिर पर 10 लाख का ईनाम हो। उसे मासूम ठहराने की यह कोशिश क्यों की जा रही है। नीचे आप देख सकते हैं कि कैसे विक्रम चंद्रा ने यह जताने की कोशिश की कि उसने कोई आतंकवादी हमला नहीं किया।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ इन्हीं पत्रकारों को बुरहान वानी पर प्यार आया है। कई और पत्रकारों ने खुलकर एक आतंकवादी के पक्ष में ट्वीट किया है। ट्विटर पर थोड़े-बहुत लोग उन्हें जवाब देकर अपना गुस्सा कम कर लेते हैं। लेकिन सवाल है कि देश के लोग आखिर कब तक ऐसे पत्रकारों को बर्दाश्त करते रहेंगे जो उन आतंकवादियों के लिए हमदर्दी रखते हैं जो दूसरों की जान लेते हैं।

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