ज़ाकिर नाईक पर पाबंदी से क्या मिलेगा?

रुचि त्रिवेदी

रुचि त्रिवेदी

लोग कह रहे हैं कि ज़ाकिर नाईक को बैन कर दो… उसकी प्रेरणा से मुस्लिम आतंकी बन रहे हैं। मैंने जाकिर के ढेरों विडियो देख डाले। हर बात ऐसी जो किसी नॉनमुस्लिम के गले में कांटे सी चुभेगी। एक मूर्खतापूर्ण और आत्ममुग्ध मज़हब इस्लाम की तकरीरें जैसी होनी चाहिए, वैसी ही बिलकुल वो करता है। मुझे इसमें जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ।

मैं कहती हूँ कि दुनिया भर के देशों ने ओशो को भी बैन किया था, क्योंकि वो सभी धर्मों की विवेचना करते थे। जबकि उन्होंने तो कभी अपने धर्म की प्रशंसा में किसी दूरे धर्म को निशाना नहीं बनाया। अपने खुद के धर्म समेत सभी धर्मों पर सिर्फ सम्यक विवेचना की। लेकिन क्या ओशो की विचारधारा को कोई रोक सका? नहीं। क्योंकि जब लोग किसी को फॉलो करते हैं तो इसलिए नहीं कि उसके बोलने से उनमें कोई प्रभाव पैदा होता है, बल्कि इसलिए कि उसी विषय के बीज उनमें पहले से मौजूद होते हैं जो सामने वाले वक्ता के प्रभाव से अनुकूल माहौल और मिट्टी पा जाते हैं, जिनमे वो फूट सकें और विकसित हो सकें।

आपके अंदर आध्यात्म का, जिज्ञासा का, विवेचना का, प्रश्न का और उत्तर खोजने का कीड़ा पहले से मौजूद होता है जिसे अनुकूल खुराक मिलते ही वह जीवित हो उठता है।

ज़ाकिर नाईक की विचारधारा को भी बहने से कोई रोक नहीं सकेगा। जानते हैं क्यों? क्योंकि इस्लाम के हर मानने वाले के अंदर जिहाद का, काफिरों पर मुसलमानों की फतह का, दुनिया को अल्लाह ताला की रोशनी से जगमगाने का कीड़ा मौजूद है। जो ज़ाकिर जैसे लोगों की कुरआन सम्मत तकरीरों से माकूल माहौल पाकर विकराल स्वरूप धारण कर लेता है।

यूरोपीय देश मोदी जी को समझाते थे कि आपके यहाँ आतंकवाद नहीं, लॉ एंड ऑर्डर की समस्या है। लेकिन मैं फिर भी कहूँगी और बार-बार कहूँगी कि आतंकवाद कोई समस्या नहीं, असल समस्या इस्लाम है।

(यह पोस्ट लेखिका की फेसबुक वॉल से साभार ली गई है।)

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