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तो इसलिए मोजांबिक की यात्रा पर गए थे पीएम मोदी!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफ्रीकी देशों के दौरे का पहला दिन मोजांबिक में बिताया। हर किसी के मन में यह सवाल है कि आखिर इस गुमनाम से देश को प्रधानमंत्री ने अपनी यात्रा के पहले पड़ाव के तौर पर क्यों चुना? मोदी विरोधियों की राय में तो प्रधानमंत्री वहां पर सैर-सपाटे के लिए गए हैं, लेकिन भारत की डिप्लोमेसी पर नज़र रखने वाले इसे मोदी का मास्टरस्ट्रोक कह रहे हैं। दरअसल ग्लोब में मोजांबिक बेहद अहम जगह पर है। लेकिन बीते 60 साल में भारतीय सरकारें कभी इसकी अहमियत को नहीं समझ पाईं।

भारत के लिए क्यों अहम है मोजांबिक?

मोजांबिक कभी पुर्तगाल का उपनिवेश हुआ करता था। उस दौर में गोवा पर भी पुर्तगालियों का ही कब्जा था। तब मोजांबिक की सरकार गोवा से चला करती थी। मोदी ने मोजांबिक में अपने भाषण के दौरान जब इस बात का जिक्र किया तो देश में बहुत सारे लोगों के लिए यह नई जानकारी थी। दुनिया का नक्शा देखें तो भारत से अफ्रीका होते हुए यूरोप तक का एक सीधा समुद्री रास्ता बनता है। मोजांबिक इसमें एक अहम पड़ाव है। इसके बावजूद आज तक भारत ने मोजांबिक को कभी महत्व नहीं दिया। हालांकि वहां से भारी संख्या में लोग पढ़ाई और इलाज के लिए हर साल भारत आते हैं। भारतीय तेल कंपनियों का वहां पर करीब 6 अरब डॉलर का निवेश भी है। इसके अलावा स्टील और कोयला क्षेत्र की कंपनियों का निवेश मिला लें तो यह निवेश जर्मनी और फ्रांस से भी ज्यादा है।

भारत और मोजांबिक के बीच कारोबारी समुद्री रास्ता सीधा है। इसके अलावा मोजांबिक से होते हुए भारत के लिए यूरोप तक कारोबार का रास्ता खुल जाएगा।
भारत और मोजांबिक के बीच कारोबारी समुद्री रास्ता सीधा है। इसके अलावा मोजांबिक से होते हुए भारत के लिए यूरोप तक कारोबार का रास्ता खुल जाएगा।

भारत को क्या दे सकता है मोजांबिक?

पीएम मोदी की नजर वहां के लिक्विफाइड नेचुलर गैस (एलएनजी) पर है। अभी भारत अपनी जरूरत का 90% एलएनजी कतर से खरीदता है। जो कि काफी महंगा पड़ता है। बदले में भारत वहां पर बेइरा (Beira Port) बंदरगाह को विकसित करेगा। मोजांबिक बंदरगाह वाला देश होने के बावजूद काफी पिछड़ा हुआ है। भारत उसकी तरक्की में मददगार बन रहा है। बदले में वहां से ये अहम फायदे होंगे-

  1.  मोजांबिक भारत को गैस दे सकता है। जिससे खाड़ी देशों पर आश्रितता कम होगी।
  2. भारतीय कंपनियों को वहां पर खनन और इन्फ्रास्ट्रक्चर के काम में अरबों का बिजनेस मिल सकता है।
  3.  हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक मजबूती के लिए मोजांबिक से अच्छे रिश्ते काफी अहम हैं।
  4.  भारतीय मीडिया में मोजांबिक की दाल की बहुत चर्चा है। दरअसल भारत ने करार किया है कि वो दाल के अच्छे बीज देगा और बदले में दाल की पैदावार सस्ती कीमत पर खरीदेगा।

मोजांबिक में भारतीय नौसेना की दखल

वाजपेयी सरकार के वक्त मोजांबिक और भारतीय सेना के रिश्ते मजबूत हुए थे। 2003 में वहां अफ्रीकन यूनियन समिट और 2004 में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठक को भारतीय नौसेना ने ही सुरक्षा प्रदान की थी। लेकिन उसके बाद से इस संबंध को और मजबूत बनाने पर कुछ खास काम नहीं हुआ। मोदी सरकार के आने के बाद अफ्रीकी देशों के लिए भारत की डिप्लोमेसी में मोजांबिक का रुतबा अचानक काफी बढ़ गया। वैसे दोनों देशों के संबंध की यह कहानी 1980 के दशक से शुरू होती है जब भारतीय नौसेना ने मोजांबिक में गृह युद्ध को शांत कराया था। उस वक्त लड़ाकू पोत INS गोदावरी को वहां पर भेजा भी गया था।

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