मोदी के राज में मुसलमानों को पहले से ज्यादा फंड

यह फाइल तस्वीर 2014 लोकसभा चुनाव के वक्त की है।

नरेंद्र मोदी सरकार भले ही मुस्लिम विरोधी होने के आरोप लगाए जाते हों, लेकिन आंकड़े कुछ और ही गवाही दे रहे हैं। इसके मुताबिक एनडीए सरकार अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए यूपीए सरकार के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा पैसे दे रही है। अल्पंख्यकों के कल्याण के लिए काम करने वाले एनजीओ और दूसरी संस्थाओं के जरिए यह रकम दी जा रही है। इसे अल्पसंख्यक छात्रों को सिविल सर्विसेज से लेकर दूसरी सरकारी नौकरियों और रोजगार के लिए मुफ्त कोचिंग और दूसरी सुविधाएं देने पर खर्च किया जा रहा है।

अल्पसंख्यकों को रोजगार और शिक्षा पर फोकस

  • 2013-14 के साल में अल्पसंख्यक छात्रों को नौकरियों और पढ़ाई के लिए मुफ्त कोचिंग देने वाली 96 संस्थाओं या एनजीओ को करीब 1900 लाख रुपये बांटे गए थे। इस दौरान केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी।
  • 2014-15 में मोदी सरकार के आने के बाद यह फंड बढ़कर 3000 लाख रुपये हो गया। यह रकम 96 संस्थाओं को दी गई।
  • 2015-16 में इसमें एक बार फिर भारी बढ़ोतरी की गई और 4500 लाख रुपये कर दिया गया।

गैर-बीजेपी राज्यों को सबसे ज्यादा फायदा

उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की अल्पसंख्यक संस्थाओं ने इस योजना का सबसे ज्यादा फायदा उठाया। यूपी के 16 एनजीओ को 2013-14 में 443 लाख रुपये दिए गए थे, जो कि साल 2015-16 में बढ़कर 560 लाख रुपये हो गए। केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक विकास मंत्रालय की इन योजनाओं को नाम दिया गया ‘सीखो और कमाओ’ और ‘नई रोशनी’। लाखों की संख्या में गरीब तबके के अल्पसंख्यक छात्रों ने इस योजना का फायदा उठाया है। वैसे तो अल्पसंख्यक वर्ग में सिख, ईसाई और कई दूसरे धर्म भी शामिल हैं। लेकिन इन योजनाओं का सबसे ज्यादा फायदा मुस्लिम तबके ने ही उठाया है।

मुसलमान अभी देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं। उनमें भी साक्षरता का प्रतिशत बाकी वर्गों के मुकाबले कम है। एक बड़ी मुस्लिम आबादी आज भी गरीबी की रेखा के नीचे है। सरकार की नीयत इस तबके को शिक्षा और रोजगार की मुख्यधारा में लाकर देश की भलाई के लिए इस्तेमाल करने की है। इसे अच्छी शुरुआत ही कहेंगे क्योंकि पहली बार अल्पसंख्यक तबकों के बारे में वोट बैंक की तरह नहीं सोचा जा रहा है।

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